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दुनिया

क्या फिर संगीत का गढ़ बनेगा गोवा?

गोवा भारतीय और पश्चिमी संगीत के संगम की प्रयोगशाला रहा है. अब कई लोग फिर से संगीत में गोवा का रुतबा बहाल करने की कोशिशों में लगे हैं

गोवा का संगीत से गहरा नाता है. लोक, पॉप और जैज बैंड, क्लबों और होटलों में बजते संगीत से शहर की पहचान जुड़ी हुई है. हजारों पर्यटक यहां के बीच और संगीत का लुत्फ़ उठाने के लिए दूर दूर से आते हैं.

हिन्दुस्तानी संगीत की सैकड़ों साल पुरानी परंपरा के साथ ही पुर्तगाली प्रभाव के चलते गोवा में पश्चिमी संगीत ने जड़ें जमाई हैं. किसी ना किसी रूप में संगीत गोवा के जीवन का हिस्सा बना हुआ है. यहां के लोक संगीत में भी हिन्दुस्तानी और पाश्चात्य संगीत का मेल देखने को मिलता है. गोवा के संगीत ने बॉलीवुड में भी खास पहचान बनायी है. हालांकि पिछले कुछ सालों से यह पहचान धूमिल पड़ने लगी है.

बॉलीवुड में गोवा के संगीतकार

गोवा के लोग पारंपरिक तौर पर रम पीने वाले लोग रहे हैं लेकिन नशा उन्हें संगीत का ही रहा है. शुरूआती दिनों में फिल्म संगीत के अधिकतम वादक गोवा से आए थे. अंतोनियो जेवियर वाज, फ्रैंक फर्नांड, दत्ताराम बाबुराव नाईक, क्रिस पेरी, एंथोनी गोंजाल्विस, अल्फ्रेड रोज, इनॉक डेनियल और सेबास्टियन जैसे नाम प्रसिद्ध रहे हैं. फिल्मी धुनें पश्चिम संगीत की लिपि में लिखी जाती हैं और गोवा के वादक इसमें निपुण रहे हैं. ऐसा नहीं कि सिर्फ पश्चिमी संगीत के चलते ही गोवा के कलाकारों ने मुंबई का रुख किया बल्कि तबला, घूमत, कसाले, मडलेम, शहनाई, सुर्त, तस्सो, और तम्बूरा जैसे वाद्य यंत्रों के जानकारों ने भी बॉलीवुड में अपना योगदान दिया. दत्ता नाईक तीन दशकों तक बॉलीवुड में सक्रिय रहे, हारमोनियम बजाने में माहिर दत्ता नाईक ने साहिर लुधियानवी के गीतों को कर्णप्रिय संगीत देकर लोकप्रिय बनाया. इसके अलावा शंकर जयकिशन की टीम में काम करने वाले दत्ताराम वाडकर ने भी बॉलीवुड में अपनी पहचान बनायी.

लोकप्रिय कलाकार एंथोनी गोजांल्विस को अमिताभ बच्चन के मशहूर गीत ‘माय नेम इज एंथोनी गोंजाल्विस' ने अमर बना दिया था. संगीतकार लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल की जोड़ी ने अपने संगीत उस्ताद गोंजाल्विस को यह गीत समर्पित किया था, जिन्हें इसकी बारीकियां खुद गोंजाल्विस ने ही सिखाई थीं.

जैज संगीत का दौर

जैज संगीत पर आधारित बॉलीवुड गीतों ने 1950 और 1960 के दशक में खूब धूम मचायी. इसका श्रेय भी गोवा के संगीत कलाकारों और वादकों को दिया जा सकता है. उस दौर में फ्रैंक फर्नांड, सेबेस्टियन डिसूजा और एंथोनी गोंजाल्विस ने पाश्चात्य संगीत के अपने ज्ञान से हिंदी फिल्मी संगीत को नयी उंचाइयां दी. संगीतकार सी. रामचंद्र, शंकर जयकिशन, ओ पी नय्यर, लक्ष्मीकांत प्यारेलाल और आरडी बर्मन ने अपनी फिल्मों में जैज संगीत का बखूबी इस्तेमाल किया.

गोवा में कला अकादमी से जुड़े रुपेश गवास कहते हैं कि पचास या साठ के दशक में फिल्मों में जितने भी क्लब गाने होते थे वे सभी जैज गाने ही होते थे. इसी दौर में गोवा के कई जैज संगीतकार मुंबई आकर अपनी कला का प्रदर्शन करने लगे. इस कला में उनका एक प्रकार से दबदबा कायम हो गया. संगीतकार प्यारेलाल के पिता ने गोवा के इस एकाधिकार को तोड़ने के लिए मुंबई में अपना स्कूल खोला और उनके अथक प्रयास के बाद कालांतर में उनके शागिर्द संगीत में छा गए.

कम होती पूछ

जाने-माने संगीतकार और गायक रेमो फ़र्नांडीस ने गोवा का झंडा बुलंद रखा है. उन्होंने बॉलीवुड में भी काम किया है. गोवा से निकल कर म्यूजिक अरेंजर एंड्रू फेर्रो बॉलीवुड में अपनी पहचान बनाने में जुटे हैं. हालांकि गोवा के लोगों की योग्यता-प्रतिभा की अब उतनी पूछ परख नहीं है. सेक्सोफोनिस्ट श्याम राज कहते हैं कि इलेक्ट्रॉनिक कीबोर्ड के आने के बाद से गोअन प्रतिभा को अब वैसा मौका नहीं मिल पा रहा है जो अस्सी के दशक तक मिलता था. बॉलीवुड संगीत की विशेषता यह है कि समय और लोगों के मूड के हिसाब से स्वयं को बदल लेता है. जहां साठ के दशक में जैज संगीत को अपनाने में देर नहीं की तो अब इसको छोड़ने से भी उसे गुरेज नहीं रहा.

इसका सीधा नुकसान गोवा के कलाकारों को हुआ. मुंबई में दस साल बिताने के बाद गोवा लौट चुके रॉय मेंजेस अफसोस जताते हुए कहते हैं, "गोअन कलाकार बॉलीवुड में हमेशा से ही उपेक्षित रहे हैं. हमारे संगीत की लोकप्रियता के चलते जो थोड़ा बहुत सम्मान कलाकारों मिलता था अब वह भी नहीं रहा." इतालवी मूल के संगीतकार सैंटीयागो लुसार्दी पिछले लगभग तीन सालों से गोवा में पश्चिमी संगीत को फिर से लोकप्रिय बनाने में जुटे हुए है. सैंटीयागो का कहना है कि खुद गोवा में पाश्चात्य संगीत पहले जैसी स्थिति में नहीं है. वह कहते हैं, "अगर गोवा फिर से विश्व स्तर के संगीतकार देने लगे तो बॉलीवुड को भी गोवा का रुख करना ही पड़ेगा."

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