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ब्लॉग

क्या पुरानी गलतियों से सबक लेंगे प्रचंड

नेपाल में माओवादी एक बार फिर सत्ता में आ गए हैं. माओवादी नेता पुष्प कमल दहल उर्फ प्रचंड ऐसे समय में प्रधानमंत्री बने हैं जब भारत के साथ नेपाल के संबंध बहुत अच्छे नहीं हैं. क्या नई सरकार के आने से हालात बदलेंगे?

लोकतंत्र बहाल होने के बाद से नेपाल में राजनीतिक अस्थिरता का दौर चल रहा है और इसका पता इसी बात से चल जाता है कि पिछले आठ सालों में प्रधानमंत्री बनने वाले प्रचंड आठवें व्यक्ति हैं. निवर्तमान प्रधानमंत्री के पी ओली भी बस नौ माह ही प्रधानमंत्री रह सके. देखना यह होगा कि किसी समय नेपाल में हथियारबंद क्रांति के नेता प्रचंड प्रधानमंत्री के निरंतर डगमगाते हुए सिंहासन पर कितने समय तक टिक पाते हैं. फिलहाल उन्हें नेपाली कांग्रेस और मधेसी संगठनों का समर्थन मिल गया है. अब उनके सामने चुनौती यह होगी कि कैसे अपनी पार्टी के कार्यक्रम से न डिगते हुए इन दोनों की उम्मीदों को पूरा किया जाए ताकि उनकी गद्दी स्थिर रह सके और नेपाल में राजनीतिक अस्थिरता समाप्त हो. यह एक जाहिर सी बात है कि कोई भी देश राजनीतिक अस्थिरता होते हुए आर्थिक विकास नहीं कर सकता.

नेपाल की राजनीति और भारतीय राजनीति के बीच बहुत गहरे और जटिल संबंध हैं. एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में नेपाल को अपनी राष्ट्रीय अस्मिता और स्वाभिमान का बहुत गहराई के साथ एहसास है और वह इन बिन्दुओं पर बहुत संवेदनशील भी है, लेकिन इसी के साथ इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि नेपाल की राजनीति भारतीय प्रभाव से कभी भी मुक्त नहीं रह पायी है. 1940 और 1950 के दशक में भारत के अनेक प्रमुख समाजवादी नेता, साहित्यकार और कार्यकर्ता नेपाल में राणाशाही के खिलाफ छिड़े संघर्ष में ले रहे थे, खासकर वे जिनका संबंध पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार के साथ था. क्योंकि भारत और नेपाल के बीच खुली सीमा है और आने-जाने के लिए पासपोर्ट और वीसा की जरूरत नहीं है, इसलिए नेपाली राजनीतिक नेता और कार्यकर्ता भी भारत में शरण लेते रहे हैं. राजशाही के दिनों में तो उनकी शिकायत ही यह रहती थी कि भारत नेपाल की लोकतांत्रिक ताकतों की खुलकर मदद क्यों नहीं करता. लेकिन अब उनकी शिकायत यह है कि भारत नेपाल के मामलों में दखलंदाजी कर रहा है. के पी ओली की सरकार में उप प्रधानमंत्री के पद पर आसीन चित्र बहादुर के सी ने तो भारत पर यह आरोप तक लगा डाला था कि वह ओली की सरकार को अस्थिर करने की कोशिश कर रहा है.

दरअसल एक बड़ी समस्या यह भी है कि जिन्हें मधेसी कहा जाता है वे तराई के इलाके में रहने वाले भारतवंशी लोग हैं जिनके सीमा पर के भारतीय क्षेत्र में रहने वालों के साथ हर स्तर पर बहुत गहरे सामाजिक-संस्कृति-आर्थिक संबंध हैं. इन मधेसियों को शिकायत है कि लोकतांत्रिक नेपाल ने अपने लिए जो संविधान बनाया उसमें उनके साथ न्याय नहीं किया गया. इसीलिए अभी तक इस संविधान को अंतिम रूप नहीं दिया जा सका है. अंतिम रूप तभी दिया जा सकेगा जब इसमें मधेसियों की आकांक्षाओं के अनुरूप आवश्यक संशोधन किए जाएं. पहाड़ों में जनाधार वाली पार्टियां इस मुद्दे पर जबानी जमाखर्च तो करती हैं लेकिन कोई कारगर ठोस कदम उठाने के लिए तैयार नहीं दिखतीं.

प्रधानमंत्री के पी ओली के कार्यकाल के दौरान नेपाल और भारत के बीच बेहद कटुता पैदा हो गई थी. उनकी सरकार ने चीन के साथ एक विवादास्पद समझौता किया, राष्ट्रपति विद्यादेवी भण्डारी की भारत यात्रा स्थगित की, भारत में नेपाल के राजदूत दीप कुमार उपाध्याय को भारत-समर्थक कह कर वापस बुलाया, और भारत पर सरकार गिराने और प्रचंड का समर्थन करने का आरोप लगाया. यूं आठ साल पहले प्रधानमंत्री बनने के बाद प्रचंड ने भी भारतविरोधी रुख ही अपनाया था, लेकिन अब माना जा रहा है प्रचंड ने पुरानी गलतियों से सीखा है और वे अन्य नेपाली राजनीतिक दलों और भारत के साथ बिलकुल नए तरीके से बर्ताव करेंगे. देखना दिलचस्प होगा कि नेपाली राजनीति का ऊंट अभी भी खड़ा ही रहता है या बैठने के मूड में है. और, अगर वह बैठता है तो किस करवट?

ब्लॉग: कुलदीप कुमार

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