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दुनिया

क्या पाकिस्तान उत्तर कोरिया के रास्ते पर है?

उड़ी हमले के बाद पाकिस्तान की मुश्किलें बढ़ रही हैं. वहां की सरकार अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अलग थलग पड़ जाने की बातों से इनकार करती है, लेकिन पाकिस्तानी पत्रकार और विश्लेषक खालिद हमीद फारूकी की राय इससे अलग है.

पाकिस्तान हमेशा इस बात से इनकार करता रहा है कि वो आतंकवाद के मुद्दे पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अलग-थलग पड़ गया है. पिछले महीने ही विदेश मामलों पर पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के सहायक तारिक फातमी ब्रसेल्स आए, तो मैंने उनसे पूछा, "एक धारणा बन रही है कि पाकिस्तान अलग-थलग पड़ रहा है, क्या ये सही है?” तो उन्होंने कहा कि ये बस एक धारणा ही है.

मैंने उन्हें बताया कि धारणा ही तो राजनीति की हकीकत होती है. लेकिन आपको विश्लेषण करना होगा कि अलग-थलग कोई कैसे पड़ता है और ये क्या होता है. पहले भी कई देश अलग-थलग पड़े हैं. इस वक्त जैसे उत्तर कोरिया अलग-थलग पड़ा है. यहां तक कैसे कोई देश पहुंचता है? हम सबने देखा कि उत्तर कोरिया किस तरह अलग थलग पड़ा है. ये प्रक्रिया राजनीति से शुरू होती है. पहले आप सियासी तौर पर अलग-थलग पड़ते हैं और उसके बाद सामाजिक तौर पर और तीसरे चरण में आपको सैन्य तौर पर आपको अलग-थलग किया जाता है.

देखिए उत्तर कोरिया की अजीब जिंदगी

पाकिस्तान अलग-थलग पड़ने के पहले चरण में दाखिल हो गया है. हमने देखा कि पाकिस्तान के साथ सार्क में क्या हुआ. उसके सभी पड़ोसी देशों ने इस्लामाबाद में होने वाले सम्मेलन में आने से इनकार कर दिया. ये पाकिस्तान के अलग-थलग पड़ने का बहुत बड़ा सबूत है. उसके बाद यूरोपीय संघ के साथ पाकिस्तान की जो बातचीत हुई है, उसके बारे में अंदरूनी सूत्रों का कहना है कि पाकिस्तान को आतंकवाद और अल्पसंख्यकों के मामले में खबरदार किया है और इस बारे में हालात सुधारने को कहा गया है. इसी तरह अन्य पश्चिमी देशों में भी पाकिस्तान धीरे धीरे अलग थलग पड़ता जा रहा है.

यूरोपीय संघ में पाकिस्तान को कभी वो मुकाम नहीं मिल पाया जो भारत को है. इसकी एक वजह है भारत में लोकतांत्रिक स्थिरता. मानवाधिकारों के हनन के मामले वहां भी सामने आते हैं, बावजूद इसके भारत को एक विश्वसनीय लोकतंत्र समझा जाता है. इसीलिए भारत को यूरोप में एक तरह से सम्मान की नजर से देखा जाता है.

देखिए पाकिस्तान में दहशत के दस साल

पाकिस्तान में समय-समय पर आने वाली सैन्य सरकारों के कारण भी यूरोप में उसकी छवि को धक्का लगा है. आज भी यूरोप में लोग यही मानते हैं कि पाकिस्तान में सेना का दबदबा है और सत्ता पूरी तरह से चुनी हुई सरकार के हाथ में नहीं है. जब तक आप अपनी चुनी हुई संस्थाओं को मजबूत और विश्वनीय नहीं बनाएंगे, तब तक आपकी छवि बेहतर नहीं हो सकती है. इससे पश्चिमी देशों में ये सोच बन गई है कि पाकिस्तान में एक लोकतांत्रिक परंपरा वाला देश नहीं है.

(खालिद हमीद फारूकी वरिष्ठ पाकिस्तानी पत्रकार और विश्लेषक हैं और लंबे समय से यूरोपीय संघ के मुख्यालय ब्रसेल्स में रह रहे हैं.)

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