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ब्लॉग

क्या जरूरत राज्यपाल की

दो साल पहले नरेंद्र मोदी ने कांग्रेसी केंद्र सरकार पर राज्य सरकारों के साथ ब्रिटिश वायसरायों की तरह बर्ताव करने का आरोप लगाया था. अब उनकी सरकार पर कई राज्यों के मुख्यमंत्री यही आरोप लगा रहे हैं.

नरेंद्र मोदी की सरकार के सौ दिनों का हिसाब बताता है कि इस अवधि में पूर्ववर्ती सरकार द्वारा नियुक्त केवल एक राज्यपाल मारग्रेट अल्वा को ही अपना कार्यकाल पूरा करने दिया गया. गुजरात की राज्यपाल कमला बेनीवाल का पहले मिजोरम तबादला किया गया और फिर कार्यकाल समाप्त होने से दो माह पहले ही उन्हें बर्खास्त कर दिया गया. उनके अतिरिक्त पुडुचेरी के राज्यपाल वीरेंद्र कटारिया को भी बर्खास्त किया गया. आठ अन्य राज्यपालों के तबादले करके या गृह मंत्रालय की ओर से मशविरा देकर उनके लिए ऐसी स्थिति पैदा कर दी गई कि उनके सामने स्वयं ही इस्तीफा देने के सिवा कोई सम्मानजनक विकल्प नहीं बचा. लेकिन उत्तराखंड के राज्यपाल अजीज कुरैशी ने केंद्र सरकार के दबाव के आगे झुकने से इन्कार कर दिया और सर्वोच्च न्यायालय की शरण ली.

यही नहीं, उन राज्यों के मुख्यमंत्री भी प्रधानमंत्री से नाराज हैं जहां अन्य पार्टियों की सरकारें सत्ता में हैं. उन जनसभाओं में जहां मंच पर नरेंद्र मोदी भी उपस्थित थे, हरियाणा, महाराष्ट्र और झारखंड के मुख्यमंत्रियों को भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ताओं की जबर्दस्त हूटिंग का सामना करना पड़ा और प्रधानमंत्री मूक दर्शक बने देखते रहे. इसके बाद कांग्रेस नेता अंबिका सोनी ने घोषणा की कि उनकी पार्टी के मुख्यमंत्री भविष्य में प्रधानमंत्री के साथ मंच साझा नहीं करेंगे. उधर तेलंगाना के मुख्यमंत्री के. चन्द्रशेखर राव भी केन्द्र सरकार से सख्त नाराज हैं क्योंकि उन्हें आदेश दिया गया है कि राजधानी हैदराबाद का प्रशासन वे राज्यपाल को सौंप दें. उनका आरोप है कि केंद्र सरकार संविधान द्वारा प्रदत्त संघीय ढांचे का पालन नहीं कर रही है. इस सारे घटनाक्रम से एक बार फिर राज्यपाल की संस्था और उसकी जरूरत पर बहस शुरू हो गई है.

दरअसल हकीकत यह है कि भारत एक संघ है, और इसमें संघीय व्यवस्था लागू नहीं है. अधिक अधिकार प्राप्त करने के लिए राज्य सरकारें और अक्सर केंद्र में सत्तारूढ़ सरकार का विरोध कर रहे राजनीतिक दल इस व्यवस्था में संघीय ढांचे के दर्शन कर लेते हैं, लेकिन वास्तविकता इसके विपरीत है. राज्यपाल केन्द्रीय गृह मंत्रालय के निर्देशों पर काम करते रहे हैं. राजनीतिक कारणों से विधानसभा में बहुमत प्राप्त राज्य सरकारों को बर्खास्त करने का काम केंद्र सरकार के निर्देश पर राज्यपाल करते आए हैं. संविधान इस विषय पर भी मौन है कि किस तरह के व्यक्ति को राज्यपाल नियुक्त किया जाए.

अक्सर ऐसे राजनीतिक नेताओं को राज्यपाल बनाया जाता है जो चुनाव हार जाते हैं लेकिन जिन्हें फिर भी ऊंचे पद और उसके साथ जुड़ी सुख-सुविधाओं से पुरस्कृत करके संतुष्ट रखना केंद्र में सत्तारूढ़ पार्टी की मजबूरी होती है. ऐसे राज्यपालों से यूं भी निष्पक्ष आचरण की उम्मीद नहीं की जाती. विडम्बना यह है कि जब कोई राजनीतिक दल विपक्ष में होता है, तब वह राजनीतिक व्यक्तियों को राज्यपाल बनाए जाने या राजनीतिक कारणों से राज्यपालों को हटाये जाने का विरोध करता है, जैसा इन दिनों कांग्रेस कर रही है. लेकिन केंद्र में सत्तारूढ़ होने के बाद वह भी अपने नेताओं या विश्वासप्राप्त रिटायर्ड नौकरशाहों और सेनाधिकारियों को राज्यपाल बनाता है और पहले से चले आ रहे राज्यपालों को हटाता है. ये सभी परम्पराएं कांग्रेस ने ही शुरू की थीं जिनका आज वह विरोध कर रही है.

संविधान में राज्यपाल को अधिकार दिया गया है कि वह मुख्यमंत्री नियुक्त करे, यह तय करे कि राज्य सरकार को विधानसभा में बहुमत हासिल है या नहीं, मुख्यमंत्री को बर्खास्त करे, विधानसभा को भंग करे, राष्ट्रपति शासन लगाने की सिफारिश करे और विधानसभा द्वारा पारित विधेयक को राष्ट्रपति के पास विचार के लिए भेजे. अक्सर राष्ट्रपति और राज्यपाल के पद और उनकी भूमिकाओं की तुलना की जाती है और यह समझा जाता है कि जो भूमिका केंद्र में राष्ट्रपति की है, वही राज्य में राज्यपाल की है. लेकिन वास्तव में ऐसा है नहीं.

यह सही है कि राष्ट्रपति को मिलाकर ही संसद पूरी होती है और राज्यपाल को मिलाकर विधानमंडल बनता है, लेकिन जहां राष्ट्रपति का चुनाव जनता द्वारा चुने गए सांसद और विधायक करते हैं, वहीं राज्यपाल की नियुक्ति केंद्र सरकार करती है. उसे राज्य की जनता द्वारा चुनी गई विधानसभा द्वारा पारित किसी भी विधेयक को अपनी स्वीकृति न देने और विचारार्थ राष्ट्रपति के पास भेजने का अलोकतान्त्रिक अधिकार मिला हुआ है. यानि वह विधानसभा में प्रतिबिम्बित जनता की इच्छा की अवमानना कर सकता है.

सरकारिया आयोग ने सिफारिश की थी कि किसी विशिष्ट और प्रख्यात व्यक्ति को ही राज्यपाल नियुक्त किया जाए. वह ऐसा व्यक्ति हो जो कुछ समय से राजनीतिक रूप से सक्रिय न रहा हो, सामान्य परिस्थितियों में उसे कार्यकाल पूरा करने दिया जाए और केवल तभी हटाया जाए जब इसके लिए बहुत ठोस कारण हों, उसे ये कारण बताए जाएं और अपना पक्ष रखने दिया जाए. अवकाशप्राप्ति के बाद वह व्यक्ति राजनीति में फिर से सक्रिय न हो और न कोई पद स्वीकार करे. बरसों से इन सिफारिशों पर धूल जमा हो रही है लेकिन कोई भी सरकार इन्हें मानने को राजी नहीं. क्योंकि हर पार्टी केंद्र में सत्तारूढ़ होने के बाद राज्यपाल को अपने एजेंट के रूप में इस्तेमाल करना चाहती है.

ब्लॉग: कुलदीप कुमार

संपादन: महेश झा

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