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ताना बाना

कौन हैं शियावबो, बीजिंग वालों को नहीं है पता

चीन में मानवाधिकार और लोकतंत्र के लिए संघर्ष करने वाले और शांति का नोबेल पुरस्कार जीतने वाले लियु शियावबो की भले ही अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सराहना हो रही हो लेकिन राजधानी बीजिंग में लोग उनके बारे में बहुत कम जानते हैं.

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सड़क पर चलते किसी व्यक्ति से अगर पूछा जाए कि नोबेल शांति पुरस्कार विजेता शियावबो के बारे में वो क्या सोचते हैं तो जवाब मिलता है, "कौन शियावबो." शियावबो का नाम सुनने पर लोगों की यह प्रतिक्रिया दिखाती है कि 1989 में थ्येनानमन चौराहे पर लोकतंत्र समर्थित प्रदर्शनकारियों के खिलाफ सरकार की कड़ी कार्रवाई की याद मिटाने की चीन सरकार की कोशिश कितनी प्रभावी रही हैं. इसी घटना के बाद शियावबो का जीवन बदल गया.

बीजिंग में एक व्यवसायी मा जुनपेंग से जब शियावबो के बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा, "मुझे लगता तो है कि इस बारे में मैंने कुछ टेलीविजन पर देखा लेकिन मैं पक्के तौर पर कुछ नहीं कह सकता."

जब जुनपेंग को बताया कि चीन में राजनीतिक आजादी के लिए 1989 से संघर्षरत शियावबो को नोबेल पुरस्कार दिया गया है तो उन्होंने कंधे झटकते हुए कहा, "ऐसे व्यक्ति को सम्मानित करना तर्कसंगत नहीं है. 1989 के विरोध प्रदर्शनों के बाद काफी चीजें बदल गई हैं. लोगों के विचारों में बदलाव आया है. चीन बदल गया है. शियाओबो जैसे लोग अप्रासंगिक हो गए हैं."

कानून का उल्लंघन करने और लोकतंत्र के समर्थन में एक चार्टर तैयार करने के लिए लिऊ शियावबो को पिछले साल क्रिसमस पर 11 साल के लिए जेल भेज दिया गया. इस चार्टर में चीन में लोकतांत्रिक सुधारों की मांग की गई है.

थ्येनानमन चौराहे पर हुए विरोध प्रदर्शनों में हिस्सा लेने के चलते शियावबो को पहले भी 20 महीने की सजा सुनाई जा चुकी है. शियावबो ने अपनी पत्नी लिऊ शिया को बताया है कि प्रदर्शनकारियों को सख्ती से सैनिकों ने कुचला था और उस समय जिन लोगों की मौत हुई, नोबेल शांति पुरस्कार उनके लिए श्रृद्धांजलि है.

रिपोर्ट: एजेंसियां/एस गौड़

संपादन; ए कुमार

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