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दुनिया

कौन संभालेगा कयानी की विरासत

पाकिस्तान में लोकतांत्रिक सरकार के दिन बढ़ने के साथ ही सैन्य तानाशाही का रिवाज धुंधलाने की बातें होने लगी है. इस बीच अब तक ताकतवर साबित हुई सेना का अगला प्रमुख कौन होगा इस पर कयास लगने लगे हैं.

परमाणु हथियार वाले देश के बारे में इस बात पर कोई मतभेद नहीं कि जनरल अशफाक कयानी सबसे ताकवर इंसान हैं. छह साल के कार्यकाल के बाद नवंबर में कयानी रिटायर होंगे और ऐसे में प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के सामने एक बड़ी चुनौती है देश का अगला सैन्य प्रमुख चुनने की. ब्रिटेन से 1947 में आजादी मिलने के बाद आधे से ज्यादा वक्त पाकिस्तान में सेना का ही शासन रहा है. यहां तक कि नागरिक सरकारों के दौर में भी देश की रक्षा और विदेश नीति में सेना की मर्जी चलती रही.

प्रधानमंत्री नवाज शरीफ का कहना है कि वह सेना को राजनीति से अलग करना चाहते हैं. रक्षा और विदेश मंत्रालय अपने पास रख कर उन्होंने सेना को इन जिम्मेदारियों से मुक्त करने में अपना दृढ़ निश्चय भी दिखाने की कोशिश की है. हालांकि ऐसे संवेदनशील वक्त में सेना अपनी पकड़ छोड़ेगी ऐसा लगता नहीं. पश्चिमी देशों की सेना अफगानिस्तान से निकलने की तैयारी कर रही है और पाकिस्तान वहां अपना प्रभाव बढ़ा कर अपने चिर प्रतिद्वंद्वी भारत को वहां बढ़ने से रोकने की फिराक में है. शरीफ के लिए ऐसे वक्त में विदेश नीति तय करना इतना आसान नहीं है. भारत के साथ संबंध सुधारने की कवायद कश्मीर में हिंसा के कारण कमजोर पड़ी है. दोनों देशों की सेनाएं एक दूसरे पर गोलियों और आरोपों की बौछार कर रही हैं.

जनरल कयानी के दौर में पाकिस्तान की सेना राजनीति में बहुत कम उलझी. इन सब से कयानी की छवि एक ऐसे दृढ़ नेता के रूप में उभरी है जो राजनीति पर सेना की पकड़ को ढीली करना चाहता है और सार्वजनिक रूप से लोकतंत्र को समर्थन दे रहा है. नवाज शरीफ के लिए कयानी का उत्तराधिकारी ढूंढना बेहद मुश्किल चुनौती है. सेना के एक रिटायर्ड वरिष्ट अधिकारी ने समाचार एजेंसी रॉयटर्स से कहा, "ना सिर्फ नवाज यह चाहते हैं कि कोई ऐसा हो जिस पर वे भरोसा कर सकें और वह सेना की राजनीति में भूमिका को खत्म करे बल्कि सेना भी चाहती है कि कोई ऐसा हो जो नवाज के साथ काम कर सके."

Pakistan General Ashfaq Pervaiz mit soldaten im Swat Tal

2010 में उनका कार्यकाल 3 साल के लिए बढ़ाया गया था.

इस बारे में कयास लगाए जा रहे हैं लेकिन सार्वजनिक रूप से कोई कुछ नहीं कह रहा. निजी बातचीत में सेना के अधिकारी, राजनेता और राजनयिक कई संभावित नामों पर चर्चा कर रहे हैं. जिन लोगों के नाम लिए जा रहे हैं इनमें मौजूदा चीफ ऑफ जनरल स्टाफ लेफ्टिनेंट जनरल राशिद महमूद, लेफ्टिनेंट जनरल तारिक खान जो अमेरिका के साथ रिश्तों के मामले में काफी सख्त माने जाते हैं और लेफ्टिनेंट जनरल हारून असलम जो कयानी के बाद सबसे वरिष्ठ हैं. कुछ लोगों का तो यह भी कहना है कि जनरल कयानी तीन साल और इस पद पर बने रह सकते हैं. 2010 में उनका कार्यकाल 3 साल के लिए बढ़ाया गया था.

कुछ तय नहीं

चेन स्मोकर कयानी को मुस्कुराते हुए बहुत कम ही लोगों ने देखा है और उन्हें पाकिस्तानी राजनीति का खामोश जनरल कहा जाता है. पाकिस्तान में लोकतंत्र के समर्थन में दिए उनके सार्वजनिक बयानों के कारण पश्चिमी देशों में उन्हें सम्मान मिला है. मई चुनाव से ठीक पहले कयानी ने कहा था कि एक खराब लोकतंत्र भी सबसे बुरी तरह की तानाशाही से बेहतर है. हालांकि उनके बयानों से भी यह चेतावनी नहीं छिपती कि लोकतंत्र के लिए सेना का समर्थन हमेशा के लिए नहीं है.

Pakistanischer Armeechef Ashfaq Kayani

नवाज शरीफ प्रशासन के एक सूत्र ने कहा, "हर कोई मानता है कि कयानी के दौर में सेना बदल गई है और हम उसके लोकतांत्रिक मूल्यों पर भरोसा कर सकते हैं लेकिन एक नर्म सैन्य नेतृत्व का यह मतलब नहीं कि विरासत हमेशा कायम रहेगी. नागरिकों को बहुत मेहनत करनी होगी जिससे कि हर कोई अपनी सीमा जाने." कयानी के नीचे काम करने वाले कुछ जनरलों ने सेना के नरम रुख पर अंदरखाने नाखुशी जताई है. नए सेना प्रमुख को नागरिकों पर दबदबा दिखाने के दबाव का भी सामना करना पड़ सकता है. ऐसे में सेना शरीफ के साथ उलझ भी सकती है और तब शायद 1999 वाली स्थिति वापस आ सकती है. उस वक्त शरीफ ने एक साल पहले ही परवेज मुशर्रफ को सेना प्रमुख नियुक्त किया था.

पिछले साल सुप्रीम कोर्ट ने सेना को कड़ी फटकार लगाते हुए कहा कि वह राजनीति में दखल देना बंद करे. इससे लोगों की नजर में सेना का महत्व कुछ कम हुआ है. ओसामा बिन लादेन को मारने के खुफिया अमेरिकी ऑपरेशन ने भी सेना की छवि को नुकसान पहुंचाया. आम पाकिस्तानी इसे देश की संप्रभुता पर हमला और सेना की इसे रोक पाने में नाकामी के तौर पर देखता है.

तकनीकी रूप से कयानी को तीन उम्मीदवारों के नाम तय कर शरीफ के पास मंजूरी के लिए भेजना है. वास्तव में शरीफ के पास ज्यादा विकल्प नहीं लेकिन फिर भी वो यह कोशिश तो जरूर करेंगे कि संतुलन रहे.

एनआर/एमजे (रॉयटर्स)

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