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दुनिया

कौन रोकेगा पाकिस्तान में ड्रोन हमला

पाकिस्तान के नए प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के सामने चुनौतियां तो कई हैं लेकिन जानकारों की माने तो उनमें सबसे बड़ी चुनौती है अमेरिका को ड्रोन हमले बंद करने के लिए रजामंद करना.

मई में चुनावों के दौरान नवाज शरीफ ने अपने समर्थकों से वादा किया कि वो अपने देश में अमेरिका को ड्रोन से हमला नहीं करने देंगे. उनके प्रमुख प्रमुख विरोधी इमरान खान ने तो यहां तक कहा दिया कि अगर वो सत्ता में आए तो सेना से अमेरिकी ड्रोन विमानों को निशाना बनाने का आदेश देंगे. इमरान की पार्टी पाकिस्तान के चुनावों में तीसरी सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी है.

अब दोनों नेताओं के सामने दुविधा है. शरीफ इस्लामाबाद में केंद्रीय सरकार का नेतृत्व कर रहे हैं जबकि खान की पार्टी उत्तर पश्चिमी खैबर पख्तूनख्वाह में सत्ता संभाल रही है. अफगानिस्तान से लगने वाले इसी इलाके में प्रमुख रूप से ड्रोन हमले होते हैं. उनके समर्थकों की मांग है कि वो अपना वादा पूरा करें. क्या सचमुच ये दोनों ड्रोन हमला रोकने के लिए अमेरिका पर दबाव बना सकते हैं.

प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने के अगले ही दिन सात जून को अमेरिका ने उत्तरी वजीरिस्तान के कबायली इलाके में ड्रोन से हमला किया जिसमें सात लोग मारे गए. दो दिन पहले ही अमेरिका ने तालिबान के दूसरे सबसे बड़े वली उर रहमान को भी इसी तरह के हमले में मार दिया. रहमान पर 2009 में अफगानिस्तान के अमेरिकी सैनिक छावनी पर हमले में शामिल होने का आरोप है. इस हमले में सीआईए के साथ काम कर रहे सात अमेरिकी मारे गए थे.

अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा ने 2009 में राष्ट्रपति बनने के साथ ही पाकिस्तान में ड्रोन हमले तेज कर दिए हैं. ओबामा प्रशासन मानता है कि मानवरहित ये विमान पाकिस्तान के सरहदी पहाड़ी इलाकों में छिपे अल कायदा और तालिबान के लड़ाकों को निशाना बनाने के लिए ज्यादा कारगर हैं. समाचार एजेंसी एएफपी के मुताबिक 2009 में अमेरिका ने पाकिस्तान में 45 हमले किए थे. इसी साल ओबामा राष्ट्रपति बने इसके बाद 2010 में इन हमलों की तादाद 101 पर पहुंच गई हालांकि 2011 में यह घट कर 64 तक आई.

ओबामा अमेरिका को विदेश से होने वाले संभावित आतंकवादी हमलों से बचाने के लिए लगातार इन हमलों को उचित बताते रहे हैं. अमेरिकी थिंक टैंक न्यू अमेरिका फाउंडेशन का कहना है कि पिछले आठ सालों में अमेरिकी ड्रोन हमलों में मरने वाले लोगों की तादाद 1,715 से 2,680 के बीच है. इनमें से बहुत से लोग आम नागरिक हैं.

संप्रभुता का उल्लंघन

शुक्रवार के हमलों के बाद शरीफ सरकार ने पाकिस्तान में तैनात वरिष्ठ अमेरिकी राजनयिक रिचर्ड होएगलैंड को बुला कर इन हमलों को रोकने के लिए कहा. विदेश मंत्रालय ने बयान जारी कर इन हमलों की निंदा की. इन शिकायतों के बावजूद अभी यह साफ नहीं है कि विरोध सिर्फ बयानों तक ही सिमटे रहेंगे या कोई कार्रवाई भी होगी. अगर कार्रवाई नहीं हुई तो शरीफ इस समस्या से कैसे निबटेंगे. यह बड़ा सवाल है कि एक तरफ पाकिस्तान को सबसे बड़ी सैनिक सहायता देने वाला अमेरिका है दूसरी तरफ शरीफ के समर्थक हैं जिन्होंने वोट दे कर उन्हें अपना नेता बनाया है और जो अमेरिकी हमले से खासे नाराज हैं. दोनों के बीच संतुलन कैसे बनाएंगे शरीफ? इमरान खान की पार्टी तो अब कहने लगी है कि ड्रोन हमलों से निपटना केंद्र सरकार के विशेषाधिकार के दायरे में है. शरीफ के सहयोगी भी दबी जुबान में कह रहे हैं कि इन मामलों से पाकिस्तानी सेना ही निबट सकती है. उनका दावा है कि शरीफ के पास इतनी ताकत नहीं कि अमेरिका को रोक सकें.

हो हल्ले से दूर

पाकिस्तान के राजनीतिक विश्लेषक अयमाल खान का मानना है कि कोई पाकिस्तानी सरकार ड्रोन हमलों को नहीं रोक सकती. डीडब्ल्यू से बातचीत में खान ने कहा, "अमेरिकी ड्रोन को रोकना या उन पर हमला करने का सीधा मतलब है अमेरिका के खिलाफ जंग का एलान. मुझे नहीं लगता कि कोई पाकिस्तानी नेता ऐसा कर सकता है." इसके साथ ही खान ने यह भी दावा किया कि अमेरिका और पाकिस्तान की सरकारों और सेनाओं के बीच ड्रोन हमले के मामले में "सहमति" है और यह पाकिस्तान की इच्छा से ही किये जा रहे हैं. हालांकि ज्यादातर पाकिस्तानी विश्लेषकों का मानना है कि पाकिस्तानी राजनेताओं के पास सुरक्षा और रणनीतिक साझीदारी के मामलों में ज्यादा ताकत नहीं होती और जाहिर है कि इनमें फैसले सेना की मर्जी से होते हैं. खान का कहना है,"जरूरी यह है कि शरीफ संसद के साथ ही रक्षा और विदेश मंत्रालय को ताकतवर बना कर रणनीतिक फैसलों पर नियंत्रण हासिल करें. उन्हें ड्रोन हमले के विकल्प के रूप में विस्तृत आतंकवाद विरोधी नीतियां भी बनानी चाहिए."

ड्रोन हमले का असर

पाकिस्तान में ड्रोन हमलों के समर्थक भी हैं. कई पाकिस्तानी जानकार मानते हैं कि कबायली इलाकों में चरमपंथियों के गढ़ को ध्वस्त करने में ड्रोन काफी सफल रहा है. कराची के अली के चिश्ती सुरक्षा और राजनीतिक मामलों के जानकार हैं. डीडब्ल्यू से बातचीत में उन्होंने कहा, "ड्रोन की रणनीति अल कायदा और तालिबान को छोड़ बाकियों के लिए बेहद कारगर रही है." अली का मानना है कि ड्रोन हमलों ने चरमपंथियों को उनकी गतिविधियां सीमित करने पर विवश किया है.

पाकिस्तान सरकार भी ड्रोन हमले का विरोध भले कर रही हो लेकिन वह अमेरिका से इस तकनीक की मांग भी कर रही है. जानकार मानते हैं कि अमेरिका यह तकनीक पाकिस्तान को नहीं देगा क्योंकि उसे इस तकनीक के फिर चीन तक पहुंचने का अंदेशा है. इसके साथ ही एक डर यह भी है कि तकनीक देने के बाद अमेरिका को इलाके में अल कायदा और तालिबान के खिलाफ हमले के लिए पाकिस्तान पर निर्भर होना पड़ेगा. सिर्फ इतना ही नहीं अमेरिका को इस बात की भी चिंता है कि पाकिस्तान इनका इस्तेमाल अपने चिर प्रतिद्वंद्वी भारत के खिलाफ करे. जाहिर है कि पाकिस्तान को ड्रोन देने में जोखिम ज्यादा है और अमेरिका इसकी बजाय खुद ही हमला कर आलोचना झेलने को ज्यादा बेहतर मानता दिख रहा है.

रिपोर्टः शामिल शम्स/एनआर

संपादनः आभा मोंढे

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