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ब्लॉग

कौन तय करेगा कि क्या है बलात्कार

महिलाओं के खिलाफ हिंसा रोकने के लिए दुनिया भर में वैवाहिक बलात्कार को भी निशाने पर लिया जा रहा है. लेकिन भारत सरकार गरीबी, अशिक्षा और धार्मिक आस्थाओं के कारण इस पर अमल करने को तैयार नहीं.

‘वैदिकी हिंसा, हिंसा न भवति' इस बात से भी कुछ ऐसी ही ध्वनि आ रही है कि अगर कोई दूसरा व्यक्ति महिला की इच्छा के बिना उससे संभोग करता है तो वो बलात्कार है और अपराध है लेकिन अगर खुद का पति ऐसा करता है तो वो बलात्कार नहीं है. महिला और बाल विकास मंत्री मेनका गांधी ने संसद में कहा है कि वैवाहिक संबंधों में जबरन संभोग या बलात्कार कोई समस्या नहीं हो सकती है. ये वही मेनका गांधी हैं जिन्होंने पिछले साल कहा था कि वैवाहिक बलात्कार भी उसी तरह का अपराध है जैसे कि महिलाओं के साथ होनेवाली दूसरी तरह की हिंसा और अपराध हैं. क्योंकि पति ऐसा करके अपनी ताकत और बल से महिला पर अपनी हुकूमत जमाना चाहता है. अब अपनी बात से पलटते हुए उनका कहना है कि भारत में व्याप्त गरीबी, निरक्षरता, विवाह से जुड़े सामाजिक मूल्य, परंपराएं और मान्यताओं को देखते हुए वैवाहिक बलात्कार को अपराध नहीं घोषित किया जा सकता. ये पूरी तरह से एक पश्चिमी अवधारणा है और भारतीय समाज में विवाह की संस्था को जिस तरह की पवित्रता हासिल है उसे देखते हुए यहां वैवाहिक बलात्कार की बात करना अप्रासंगिक है.

महिला अधिकारों के लिए काम कर रहे संगठन और आंदोलनकारी इस तर्क को पिछड़ा मानते हुए इसे एक सिरे से खारिज करते हैं. उनकी दलील है कि घरेलू हिंसा की तरह ये भी एक ऐसी समस्या है जो विकराल तो है लेकिन इसपर बात करना एक टैबू है. ध्यान देने की बात है कि महिलाओं के साथ भेदभाव उन्मूलन के लिये बनी संयुक्त राष्ट्र की समिति ने भारत के संदर्भ में सिफारिश की है कि वैवाहिक बलात्कार को दंडनीय अपराध घोषित किया जाए. संयुक्त राष्ट्र पॉपुलेशन फंड के मुताबिक भारत में 75 प्रतिशत विवाहित महिलाओं को पति के जबरन संभोग का सामना करना पड़ता है और वे वैवाहिक बलात्कार का शिकार हैं. न्यायमूर्ति जेएस वर्मा समिति ने भी ऐसे वैवाहिक बलात्कार को दंडनीय अपराध घोषित किए जाने का सुझाव दिया है. मशहूर वकील इंदिरा जयसिंह ने भी सुप्रीम कोर्ट को दी गई अपनी रिपोर्ट में कहा है कि वैवाहिक बलात्कार को भारतीय दंड संहिता की धारा 376 में बलात्कार की श्रेणी में रखा जाए न कि 377 के तहत अप्राकृतिक यौन संबंध की श्रेणी में. उन्होंने अपील की है कि पति द्वारा पत्नी के साथ बलात्कार के लिए कठोर से कठोर सजा का भी प्रावधान किया जाए.

दरअसल बलात्कार पितृसत्तात्मक उत्पीड़न और शोषण की निशानी है और यहीं ये सवाल भी उठता है कि क्या सेक्सुअलिटी की मुक्ति और औपचारिक विवाह संबंधों से आजादी से महिलाओं की आजादी संभव है. लेकिन वैवाहिक बलात्कार से पहले विवाह नामक संस्था पर बहस जरूरी है. आधुनिक आर्थिक और पेशेवर जीवन के दबाव ने नौजवान महिलाओं और पुरूषों को ये अधिकार दिया है कि वो सहजीवन या लिव इन रिलेशनशिप में रह सकते हैं. केवल समान रूप से आजाद महिला और पुरूष ही एक गैर दमनकारी और मुक्त यौन संबंधों का आधार बना सकते हैं. सवाल ये है कि इसे कैसे हासिल किया जाए. क्या सिर्फ राजनैतिक प्रस्ताव या कानून बना देने से ये संभव हो जाएगा. इसका एक ही जवाब हो सकता है- नहीं.

इसके लिये राजनैतिक प्रस्तावों या कानून से ज्यादा जरूरी है महिला सशक्तिकरण. जब एक महिला वैवाहिक जीवन में यौन संबंधों को स्वीकारती है तो वो समाज में स्वीकृत है भले ही वो अनिच्छा और अनमने ढंग से ऐसा कर रही हो. लेकिन अगर वो विवाह संबंधों के बाहर जाकर ऐसा करने का प्रयास करती है तो इसे अनैतिक और अपराध माना जाता है. ये सामंतवादी नजरिया है जो स्त्री को संपत्ति की दृष्टि से देखता है. हमें ये समझना होगा कि समाज में व्याप्त इस सामंतवादी पुरातनपंथी नजरिये को एक झटके में नहीं बदला जा सकता है.

ब्लॉग: शिवप्रसाद जोशी

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