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दुनिया

कौन जीतेगा जंगलों पर हक की लड़ाई

वन संसाधनों पर आदिवासी अधिकार सुनिश्चित कर, महाराष्ट्र देश का पहला राज्य बन गया है. लेकिन कुछ कदम आगे चलकर ये सफलता ठिठक जाती है. क्योंकि थोड़े से हिस्से में ये अधिकार देकर, बाकी जंगल पर सरकार अपना ही नियंत्रण चाहती है.

Weltsozialforum in Bombay (AP)

एक नजर में तो महाराष्ट्र सरकार का ये काम एक चमकदार उपलब्धि की तरह लगता है कि कानून बन जाने के बावजूद जहां तमाम राज्य उसे लागू करने में फिसड्डी हैं, वहां उसने कम से कम कोई राह तो खोली है. लेकिन ये खुशी जल्द ही काफुर हो जाती है जब पता चलता है कि अधिकांश क्षेत्र, वन विभाग के नियंत्रण में ही रहेगा. इस तरह महाराष्ट्र की सफलता की कहानी एक कदम आगे बढ़ाकर, उसे पीछे खींच लेने जैसी लगती है जिसमें जंगलों के मूल निवासियों के अधिकार एक सीमित क्षेत्र तक बने रह पाते हैं, उससे आगे विभाग और कानून और सख्ती के बाड़े हैं.

पहले इस अधिकार, इसकी उपयोगिता और महाराष्ट्र के उदाहरण को समझ लें. राज्य के उस गढ़चिरौली जिले के कुछ गांवों में ये सामुदायिक अधिकार लागू हैं जो अपने जनांदोलनों के लिए मशहूर रहा है. मध्य भारत का लाल कॉरीडोर कहे जाने वाले नक्सली प्रभाव क्षेत्र का भी ये एक प्रमुख भूभाग रहा है. "कम्युनिटी फॉरेस्ट राइट्स लर्निंग ऐंड एडवोकेसी” नाम की एक संस्था ने, वनवासी अधिकारों से जुड़े कानून के क्रियान्वयन की सच्चाई जानने के लिए देशव्यापी अध्ययन किया था. सामुदायिक संगठनों, सिविल सोसायटी के नुमाइंदों, शोधकर्ताओं, अध्येताओं, और विशेषज्ञों के इस समूह ने अपनी रिपोर्ट पिछले दिनों जारी की जिसमें बताया गया कि कानून के प्रावधानों को लागू करने में महाराष्ट्र अव्वल है और केरल का नंबर दूसरा है. इस कानून को बने दस साल से ज़्यादा हो चुके हैं. रिपोर्ट के मुताबिक महाराष्ट्र ने गढ़चिरौली के 66 फीसदी वनक्षेत्र में ये अधिकार दिए हैं. यानी अपने कुल वन क्षेत्र के 15 फीसदी भूभाग पर ही सामुदायिक वन संसाधन अधिकारों को मंजूरी दी है. अब अगर गढ़चिरौली को हटा दें तो महाराष्ट्र का प्रदर्शन भी उतना ही दयनीय नजर आएगा जितना कि दूसरे राज्यों का.

अनुसूचित जनजाति और पारंपरिक वनवासी कानून, दिसंबर 2006 में पास हुआ था. इस ऐतिहासिक कानून के जरिए ग्राम्य सीमाओं के अन्तर्गत, वन भूमि और वहां के संसाधनों पर हर तरह का नियंत्रण, पारंपरिक रूप से जंगल में ही रहने वाले आदिवासियों-किसानों का दिया गया है. इससे पहले इस जमीन पर वन विभाग का कब्जा होता था. आदिवासी निजी और सामुदायिक स्तर पर अपने जंगल के संरक्षण का मालिकाना हक हासिल कर सकते हैं. छोटी मोटी वन उपज को बेच सकते हैं जैसे तेंदुपत्ता या बांस आदि. जो कानून बनने से पहले एक गैरकानूनी था. लेकिन राज्य सरकारें इस कानून को खुले हृदय से लागू करने से कतराती आ रही हैं. केवल सात राज्यों में ही ये अधिकार लागू हो पाया है. आदिवासियों के लिए उपलब्ध किए जा सकने वाले वनक्षेत्र का 15 फीसदी महाराष्ट्र, 14 फीसदी केरल, 9 फीसदी गुजरात, 5 फीसदी ओडीशा, 2 फीसदी झारखंड, 1 फीसदी कर्नाटक में दिया जा सका है. देश भर में कुल तीन फीसदी वनक्षेत्र पर ही ये अधिकार मंजूर किए गये हैं.

आदिवासी आंदोलनों की बदौलत ही गढ़चिरौली अपने कुछ अधिकार हासिल कर पाया है. गढ़चिरौली जिले के मेंढा लेखा और मारडा ही वे दो गांव हैं जहां पूरे देश में सबसे पहले सामुदायिक वन संसाधन अधिकार अमल में आए थे. इन जैसे और भी गांव जब धीरे धीरे अपने अधिकारों को लेकर एकजुट हो रहे हैं और वन उपज से किंचित लाभ हासिल करने की स्थिति में आ रहे हैं, तो उधर राज्य सरकार मानो अपनी कामयाबी पर अपने ही इरादों का ग्रहण लगाने पर तुली है.

भारतीय वन कानून के जरिए सामुदायिक उपयोग के लिए दी जाने वाली जमीनों को वापस सरकारी नियंत्रण में लाने की तजवीज की जा रही है. इसके लिए हथियार की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है ग्राम्य वन अधिकार जो सामुदायिक वन अधिकार से अलग होता है. वन अधिकारों पर जारी रिपोर्ट के मुताबिक ग्राम सभाओं की सहमति के बगैर, राज्य वन विकास निगम को वन भूमि लीज पर दी जा रही है. सामुदायिक वन अधिकार परिधि में सरकारी वन प्रतिनिधि सेंध लगा रहे हैं. इस तरह राज्य सरकार अपने ही एक दायित्व को कुचल रही है. जबकि होना ये चाहिए था कि वो गढ़चिरौली के गांवों की मिसाल को राज्य स्तर पर ले जाती और देश में एक नयी नजीर बनती. अन्य राज्य भी कुछ सचेत कुछ सक्रिय होते.

लेकिन कॉरपोरेटी भूमंडलीकरण और मुक्त बाजार की भीषण कामना में एक समृद्ध वन क्षेत्र, निवेश और मुनाफे के एक उतने ही सघन विस्तार के तौर पर शिनाख्त पा चुका है, लिहाजा आदिवासियों के हकहकूक आधे अधूरे ढंग से जारी कर, सरकारें जैसा अपना बोझ कम कर रही हैं. नैतिकता का भी दायित्व का भी और शासन का भी. शासन की ये अनिच्छा, मूल निवासियों के पक्ष में नहीं बल्कि उस विराट वाणिज्यिक बिरादरी के पक्ष में लगती है जो प्रकट-अप्रकट तौर पर सरकारी नीतियों को प्रभावित करती रही है. इसी दौरान कुछ जनपक्षीय कानून बनते तो हैं लेकिन उन पर साए मंडराते रहते हैं- वे खुली हवा में सांस नहीं ले पाते. 

ब्लॉगः शिवप्रसाद जोशी

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