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ब्लॉग

कोविंद को उतारनी होगी अपनी आरएसएस वाली वर्दी

रामनाथ कोविंद को भारत का 14वां राष्ट्रपति चुन लिया गया है. देश के मौजूदा हालात में एक दलित के राष्ट्रपति पद तक पहुंचने के क्या मायने हैं, बता रहे हैं कुलदीप कुमार.

ऐसा पहली बार हो रहा है जब प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति, दोनों पदों पर ऐसे व्यक्ति होंगे जिनका संबंध राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से है. और 19 अगस्त को आने दीजिए, संभवतः उपराष्ट्रपति पद पर भी एम वेंकैया नायडू रूप में संघ से संबंधित व्यक्ति ही विराजमान होगा.

भारत में असली सत्ता प्रधानमंत्री के हाथ में होती है. फिर भी सैद्धांतिक रूप से राष्ट्रपति ही संविधान का संरक्षक और सरकार का नैतिक मार्गदर्शक होता है. राजनीतिक अनिश्चितता और अस्थिरता के समय राष्ट्रपति की भूमिका बहुत अहम हो जाती है. वह तय करता है कि केंद्र में किसको सरकार बनाने के लिए आमंत्रित किया जायेगा. राष्ट्रपति विधेयकों को पुनुर्विचार के लिए वापस संसद के पास भेज सकता है.

रामनाथ कोविंद का संबंध उत्तर प्रदेश के कानपुर से है, जहां एक साधारण परिवार में उनका जन्म हुआ. उनका ताल्लुक एक दलित जाति कोली है, हालांकि अपने समुदाय के सामाजिक और आर्थिक उत्थान के लिए उन्होंने कोई खास योगदान नहीं दिया है. 2010 में भारतीय जनता पार्टी का राष्ट्रीय प्रवक्ता बनाये जाने पर भी वह कोई खास छाप नहीं छोड़ पाये थे. उस समय भारतीय जनता पार्टी विपक्ष में थी.

वैसे पेशे से वकील होने के नाते वह एक अच्छे वक्ता हैं. माना जा रहा है कि बतौर राष्ट्रपति उनका कार्यकाल सुगम ही रहेगा. एक राजनेता के तौर पर कोविंद को बहुत प्रभावशाली नहीं कहा जा सकता और शायद इसीलिए वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए कोई समस्या भी पैदा नहीं करेंगे. इस समय जब भारत में दलित राजनीति मजबूत हो रही है, तो एक दलित के राष्ट्रपति चुने जाने से यह संदेश जायेगा कि भारतीय जनता पार्टी उनकी चिंता करती है.

कोविंद की उम्मीदवारी ने विपक्ष की एकता को भी खंडित किया. जनता दल (यूनाइटेड) के अध्यक्ष और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने तुरंत कोविंद को अपने समर्थन की घोषणा की. इसके बाद कई ऐसे नेता भी उनके समर्थन में आये जो आम तौर पर बीजेपी के नेतृत्व वाले एनडीए के विरोधी माने जाते हैं. इससे एनडीए विरोधी ताकतों को एक मंच पर लाने की कोशिशों को धक्का पहुंचा है.

हालांकि कोविंद ने कहा है कि बतौर राष्ट्रपति वह निष्पक्ष तरीके से अपनी जिम्मेदारी निभायेंगे. लेकिन जब जब धर्मनिरपेक्षता पर बात होगी तो संविधान के संरक्षक के तौर पर उनकी परीक्षा होगी. इससे पहले केआर नारायणन जैसे उनके पूर्ववर्ती सरकार को बराबर यह याद दिलाने से पीछे नहीं हटे कि उनकी जिम्मेदारी आम आदमी का ध्यान रखना है और यह सुनिश्चित करना है कि अल्पसंख्यक समुदाय असुरक्षित महसूस न करे.

देखना होगा कि क्या कोविंद इस तरह का साहस दिखा पाते हैं और भारत के गरीब और वंचित तबकों के हितों की रक्षा के लिए अपने पद का इस्तेमाल कर पायेंगे या नहीं. ऐसा करने के लिए उन्हें अपनी आरएसएस की वर्दी उतारनी होगी और भारत के राष्ट्रपति के तौर पर मिली अपनी जिम्मेदारी को पूरी तरह अंगीकार करना होगा. अगर वह ऐसा कर पाते हैं तो उनका कार्यकाल वाकई यादगार हो सकता है.

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