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विज्ञान

कोलेस्ट्रॉल का मारा ब्रिटेन

इंग्लिश ब्रेकफास्ट दुनिया भर में मशहूर है. सुबह के इस नाश्ते में तले हुए सॉसेज होते हैं, बीन्स यानि सफेद लोबिया और खूब सारे अंडे. कुल मिला कर वो सब जिससे कोलेस्ट्रॉल बढ़ सकता है.

यही वजह है कि ब्रिटेन में कोलेस्ट्रॉल की दवा लेने वालों की बहुत बड़ी तादाद है. पूरे यूरोप में कोलेस्ट्रॉल की दवा सबसे ज्यादा ब्रिटेन में ही बिकती है. और हो भी क्यों ना, फिश एंड चिप्स यानि तली हुई मछली और तले हुए आलू खाने का शौक भी सबसे ज्यादा ब्रिटेन के लोगों को ही होता है. और साथ में पी जाती है खूब सारी बीयर भी. इस तरह का खान पान दिल के लिए काफी बुरा है. इसी वजह से ब्रिटेन में 70 लाख लोग कोलेस्ट्रॉल की दवा ले रहे हैं. लेकिन अब यह बहस छिड़ गयी है कि क्या वाकई ये दवाएं असरदार होती हैं और क्या इन पर निर्भर करने से दूसरे नुकसान नहीं होते.

दिल के दौरे का डर

53 वर्ष के एलिन डेनियल दो साल से कोलेस्ट्रॉल की गोलियां ले रहे हैं. वे बताते हैं कि उनके पिता की 62 की उम्र में दिल का दौरा पड़ने से मौत हो गयी. इसलिए जब वे अपने रुटीन चेक अप के लिए डॉक्टर के पास गए और उनका कोलेस्ट्रॉल थोड़ा बढ़ा हुआ मिला तो डॉक्टर ने उन्हें फौरन गोलियां शुरू करने की सलाह दी, "मुझे लगा इसमें हर्ज ही क्या है."

डेनियल की ही तरह ब्रिटेन में लाखों लोग कोलेस्ट्रॉल की गोलियां ले रहे हैं. एक दशक पहले ये दवाएं केवल उन लोगों को दी जाती थीं जिन्हें दिल का दौरा पड़ने का कम से कम 30 फीसदी खतरा हो. अब 20 प्रतिशत रिस्क वालों को भी यह दवा दी जाती है और माना जा रहा है कि जल्द ही 10 प्रतिशत खतरे पर भी गोलियों का सेवन करने की सलाह दी जाएगी. अगर ऐसा हुआ तो ब्रिटेन में कोलेस्ट्रॉल की दवा लेने वालों की संख्या 70 लाख से बढ़ कर एक करोड़ बीस लाख हो जाएगी.

गोली लेने में क्या हर्ज

ओईसीडी के आंकड़ों के अनुसार ब्रिटेन की एक चौथाई आबादी मोटापे का शिकार है. यूरोप के सभी देशों में ब्रिटेन में यह समस्या सबसे ज्यादा है और सभी विकसित देशों की सूची में वह सातवें स्थान पर है. हालांकि यहां के लोग कसरत करने और दौड़ भाग में काफी विश्वास रखते हैं, लेकिन इसके बावजूद दिल के दौरे पड़ने वाले लोगों की संख्या बढ़ती जा रही है.

ऐसे में कई लोगों की दलील है कि अंडा, मक्खन, चीज और मांस पीढ़ियों से खाया जा रहा है. इसलिए स्थानीय खानपान में खामियां ढूंढना गलत है. डेनियल की ही तरह ज्यादातर लोगों का मानना है कि जो मन में आए वो खाएं और साथ में गोली लेते रहे, "हर दिन एक गोली लेने में कोई मेहनत तो नहीं लगती न!"

रिपोर्ट: ईशा भाटिया (एएफपी)

संपादन: आभा मोंढे

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