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दुनिया

कोलकाता फ्लाईओवर हादसे के बाद अब राजनीति शुरू

पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता में एक निर्माणाधीन फ्लाईओवर ढहने से 25 लोगों की मौत हो गयी है और 80 से ज्यादा घायल हैं. घटना ने विकास योजनाओं में जड़ें जमा चुके भ्रष्टाचार को उजागर कर दिया है.

इस हादसे के बाद ठोस कदम उठाने की बजाय अब सत्तारुढ़ तृणमूल कांग्रेस से लेकर विपक्षी राजनीतिक दल तक सबने इस पर राजनीति शुरू कर दी है. सब इसके लिए एक दूसरे को कसूरवार ठहराने में जुटे हैं. इस बीच, सरकार ने इस मामले की जांच के लिए दो उच्च-स्तरीय समितियों का गठन किया है. पुलिस की एक टीम कंपनी के अधिकारियों की गिरफ्तारी के लिए हैदराबाद जा रही है.

हादसा

यह हादसा महानगर के व्यस्ततम इलाकों में से एक रवींद्र सरणी केके टैगोर स्ट्रीट चौराहे पर दोपहर के समय हुआ. यह कारोबारी इलाका घनी आबादी वाला है. उस फ्लाईओवर के नीचे कार व टैक्सियों की पार्किंग होती थी. दर्जनों हॉकर भी उसके नीचे स्टॉल लगाते थे. स्थानीय लोगों का सवाल है कि आखिर सरकार ने इस इलाके में ऐसे किसी फ्लाईओवर के लिए इजाजत कैसे दे दी.

इस फ्लाईओवर से खासकर नजदीकी इमारतों की दूरी तीन से चार फीट तक ही थी. ऐसे में इसके बनने के बाद भी हमेशा हादसे की गुंजाइश बनी रहती. इस हादसे के बाद इलाके के लोगों में सदमे में हैं. वहां रहने वाली 70 वर्षीय गिरिजा देवी कहती हैं, "ब्रिज के गिरने की जोरदार आवाज अब भी कानों में गूंज रही है."

काली सूची वाली कंपनी

इस फ्लाईओवर के निर्माण के लिए हैदराबाद की जिस कंपनी को ठेका दिया गया उसकी साख भी सवालों के घेरे में है. रेलवे समेत कई संस्थानों ने पहले से ही उस कंपनी को काली सूची में डाल रखा था. ऐसे में उसे ठेका मिलना तत्कालीन लेफ्टफ्रंट सरकार व उसके अधिकारियों पर भी सवाल खड़े करता है.

करीब सवा दो किलोमीटर लंबे इस फ्लाईओवर का निर्माण बीते सात वर्षों से चल रहा था. लेकिन अब तक इसका 900 मीटर लंबा हिस्सा ही तैयार हो सका था. विशेषज्ञों का कहना है कि इसकी डिजाइन में खामी और इसे पूरा करने का राजनीतिक दबाव ही इस हादसे की वजह बन गया. जो हिस्सा ढहा उसकी एक दिन पहले ही ढलाई की गई थी.

भगवान की मर्जी

इस फ्लाईओवर के पूरा होने की तारीख कम से कम पांच बार बढ़ाई जा चुकी थी. ऐसी रिपोर्टें हैं कि इसे बनाने के लिए लोहे की जिस बीम का इस्तेमाल किया जा रहा था उसके निर्माण में भी लापरवाही बरती गई थी. लेकिन इसे बनाने वाली कंपनी आईवीआरसीएल के एक अधिकारी का दावा है कि यह "भगवान की मर्जी" थी.

इस कंपनी पर 10 हजार करोड़ का कर्ज है और बीते साल उसका शुद्ध नुकसान दो हजार करोड़ रुपये था. जब मौजूदा फ्लाईओवर का ठेका उसे सौंपा गया तब इसे 164 करोड़ की लागत से 18 महीनों में बन कर तैयार होना था. लेकिन सात साल में यह काम आधा भी नहीं हो सका है और लागत कई गुनी बढ़ चुकी है.

सरकार का रवैया

हादसे की सूचना मिलते ही चुनावी दौरे को बीच में छोड़ कर लौटीं मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने भी अपने मंत्रिमंडलीय सहयोगियों के साथ मौके का दौरा किया. उन्होंने इस हादसे में मरने वालों के परिजनों को पांच-पांच लाख और घायलों को तीन-तीन लाख रुपये का मुआवजा देने का एलान किया है.

ममता ने कहा कि वाममोर्चा सरकार के कार्यकाल में इस फ्लाईओवर का टेंडर पास किया गया था और यह काम हैदराबाद स्थित उक्त कंपनी को सौंपा गया. उन्होंने आरोप लगाया है कि बार-बार मांगने के बावजूद कंपनी ने फ्लाईओवर का प्लान सरकार को नहीं सौंपा था. मुख्यमंत्री ने दोषी अधिकारियों और इस परियजोना से जुड़े लोगों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई का भरोसा दिया है.

वहीं केंद्र सरकार ने राज्य से इस हादसे पर रिपोर्ट मांगी है. दूसरी ओर, राज्य सरकार ने इसकी जांच के लिए दो उच्च-स्तरीय समितियों का गठन किया है. पुलिस ने इस हादसे का संज्ञान लेते हुए संबंधित कंपनी के खिलाफ तीन अलग-अलग एफआईआर दर्ज किए हैं. इनमें हत्या का मामला भी शामिल है. अब पुलिस की एक टीम जल्दी ही अधिकारियों की गिरफ्तारी के लिए हैदराबाद जाने वाली है.

सीबीआइ जांच की मांग

इस बीच, विधानसभा चुनावों को ध्यान में रखते हुए इस हादसे पर राजनीतिक रंग चढ़ने लगा है. सीपीएम, कांग्रेस और बीजेपी ने जहां इस हादसे की उच्च-स्तरीय जांच कराने की मांग उठाई है वहीं मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने यह कहते हुए इसकी जिम्मेदारी लेने से इंकार कर दिया है कि इस फ्लाईओवर का निर्माण कार्य वाममोर्चा सरकार के कार्यकाल में शुरू हुआ था.

विपक्ष का आरोप है कि उक्त फ्लाईओवर का निर्माण बिना समुचित योजना के घनी आबादी उक्त इलाके में तमाम नियमों को ताक पर रख कर किया जा रहा था. माकपा सांसद मोहम्मद सलीमा ने कहा कि इस हादसे की उच्च-स्तरीय जांच कराई जानी चाहिए. उन्होंने आरोप लगाया है कि बचाव कार्य भी ठीक से नहीं शुरू किया गया. बीजेपी नेता मुख्तार अब्बास नकवी ने इस हादसे की जांच सीबीआइ से कराने की मांग की है ताकि दोषियों की पहचान की जा सके.

विपक्षी राजनीतिक दलों के रुख को ध्यान में रखते हुए अब आगामी विधानसभा चुनावों में इस हादसे का एक प्रमुख मुद्दा बनना तय है. राज्य में छह चरणों में होने वाले चुनाव के पहले चरण में चार अप्रैल को मतदान होना है.

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