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ब्लॉग

कोर्ट में गंगा की सुनवाई के तीस साल

गंगा की सफाई पर सुप्रीम कोर्ट ने अभूतपूर्व तल्खी के साथ भारत सरकार को फटकार लगाई है और जवाब मांगे हैं. तीस साल से इसकी सुनवाई कोर्ट में चल रही है. सरकार ने रटेरटाए जवाब दिए तो कोर्ट ने उसकी बोलती बंद कर दी.

सुप्रीम कोर्ट में चल रहे सबसे लंबी अवधि के मामलों में गंगा भी एक मामला है. 1985 में मशहूर पर्यावरणवादी और मानवाधिकार वकील एमसी मेहता ने यह वाद 1985 मे दाखिल किया था. उस समय जब राजीव गांधी प्रधानमंत्री हुआ करते थे और गंगा की सफाई को लेकर दीर्घ अवधि का गंगा एक्शन प्लान बनाया जा रहा था. तबसे कई सरकारें आई गईं, कई प्रधानमंत्री आए गए. श्रद्धा भी बेशुमार बढ़ी है, आबादी भी, वोटर भी और गंगा की गंदगी भी. अब एनडीए सरकार, उसके प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी "नमामि गंगे" करते हुए सत्तासीन हैं और गंगा की सफाई का झंडा एक बार फिर बुलंदी से लहरा रहा है.

पिछले 30 साल से गंगा का सफाई अभियान जारी है और इसमें करीब दो हजार करोड़ रुपये बहाए जा चुके हैं. फिर भी गंगा मैली क्यों होती जा रही है? गंगा में प्रदूषण से निपटने की जिम्मेदारी उन पांच राज्यों के प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों की है जिनकी सीमाओं से होते हुए गंगा बहती है. ये राज्य है उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल. प्रदूषण नियंत्रण का एक केंद्रीय बोर्ड भी है. इन बोर्डों को तो सुप्रीम कोर्ट ने पूरी तरह नाकाम और बरबाद बताया है. अगर ये बोर्ड जरा भी हरकत में रहते और औद्योगिक कचरा गंगा में गिरने न देते तो तीस फीसदी गंगा तो ऐसे ही अब तक साफ हो जाती. लेकिन गंगा में ही नहीं, गंगा के किनारों पर सत्ता-प्रतिष्ठानों और मुनाफे के ठिकानों में गंदगी और भ्रष्टाचार के ढेर जमा हैं. कोर्ट को भी यह कहने में कोई हिचक नहीं थी.

आस्थावादियों और पर्यावरणवादियों से लेकर विकासवादियों की बहसों के बीच, मोक्षदायिनी कही जाने वाली गंगा अपनी वास्तविक मुक्ति की तलाश करती रही है. गंगा की निर्मलता और अविरलता का जो आंदोलन गंगा के उद्गम से लेकर बद्रीनाथ केदारनाथ घाटियों तक चलाया गया है, नदी के मैदान में उतरते ही यानि हरिद्वार से उसकी सूरत बदल जाती है और ताज्जुब है कि वहां ऐसा कोई आंदोलन नजर नहीं आता. हरिद्वार और उससे आगे यूपी के मैदानों में गंगा भयानक प्रदूषित होकर बह रही है. सरकारी रिपोर्टें ही बताती हैं कि संतों की नगरी कहे जाने वाले हरिद्वार में तो हर रोज करीब पांच लाख मिलियन लीटर मलजल गंगा में जा रहा है.

गोमुख से लेकर गंगा सागर तक, गंगा के ढाई हजार किलोमीटर के सफर में, एक अनुमान के मुताबिक एक अरब लीटर सीवेज उसमें मिल जाता है. जाहिर है कि इतनी गंदगी का असर गंगा के पानी की गुणवत्ता पर भी पड़ता है. उसमें डिजॉल्व ऑक्सीजन की मात्रा छह मिलीग्राम प्रति लीटर से कम नहीं होनी चाहिए. दूसरा सूचकांक बायोलॉजिकल ऑक्सीजन डिमांड का है. इसे सामान्य रूप से तीन से अधिक नहीं होना चाहिए. लेकिन हरिद्वार और उससे आगे गुणवत्ता के ये आकंड़े चिंताजनक पाए गये हैं. गंगा में सीवरेज, घरेलू और औद्योगिक कचरा ही दुश्मन नहीं है. उसके किनारों पर होने वाला खनन भी एक माफिया की तरह फैला हुआ है. जलस्तर में कमी, सूखे और बाढ़ जैसे हालात गंगा के अविरल प्रवाह को अवरुद्ध कर रहे हैं.

ऐसे विकट हालात के बीच अकेले केंद्र और उसकी मशीनरी का काम, जनभागीदारी और सामुदायिक चेतना के बिना अधूरा ही माना जाएगा. कानून बना लेना ही काफी नहीं है. श्रद्धा और आस्था की कट्टरता रोकनी होगी. गंगा राष्ट्रीय नदी है किसी एक समुदाय या किसी एक धर्म की बपौती नहीं. वह अपने संसाधनों से देश के लाखों करोड़ों लोगों का भरणपोषण भी करती है. देश की आबादी के 40 करोड़ लोग तो उसके किनारों पर ही बसते हैं. गंगा सिर्फ आचमन या शव बहाने या 'मोक्ष प्राप्ति' का मार्ग नहीं है, वह जीवनदायिनी नदी है. देश के एक बहुत बड़े हिस्से की पारिस्थितिकी और पर्यावरण के निर्माण में उसका बुनियादी योगदान है.

आखिर जर्मनी की राइन और ब्रिटेन की टेम्स जैसी नदियों का इतिहास और उन नदियों के कायापलट की कहानी भी तो हमारे ही सामने है. फिर भारत जैसे देश में आखिर ये काम क्योंकर पीढ़ी दर पीढ़ी और दशक दर दशक खिंचता आ रहा है? कहीं तो कोई गड़बड़ है, कोर्ट ने भी तो यही पूछा. गंगा को लेकर अहम और टकराव टालने होंगे. केंद्र के फंड का न्यायसंगत और ईमानदार इस्तेमाल राज्य स्तर पर सुनिश्चित किया जाना होगा. राज्य सरकारें जिन एजेंसियों को इस काम में लगाती हैं उनकी विश्वसनीयता भी परखी जानी चाहिए. एक मुकम्मल राष्ट्रीय समन्वय की जरूरत है. लेकिन क्या ऐसा हो पाएगा? ऐसा न हो कि आने वाली पीढ़ी के पास गंगा की कमोबेश वैसी ही तस्वीर रह जाए जैसी आज यमुना की दिल्ली में दिखती है.

ब्लॉगः शिवप्रसाद जोशी

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