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दुनिया

कोरिया युद्ध को हुए 60 साल, तनाव पूर्ववत

दूसरे विश्वयुद्ध के बाद दुनिया दो खेमों में बंट गयी थी--अमेरिका वाले पश्चिमी और सोवियत संघ वाले पूर्वी खेमे में. शीतयुद्ध कहलाने वाला दोनो का प्रचारयुद्ध 1950 में कोरिया प्रायद्वीप पर पहली बार गरम युद्ध में बदल गया.

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सौउल का युद्ध-संग्रहालय

उत्तर कोरिया ने इस युद्ध की साठवीं वर्षगांठ पड़ते ही दक्षिण कोरिया और अमेरिका को एक बार फिर सैनिक बलप्रयोग की चेतावनी दी है. दोनो पर आरोप लगाया है कि उन्होंने दोनो कोरिया के बीच के विसैन्यीकृत गांव पानमुन्जोम में शनिवार, 26 जून को, सुबह 7 बज कर 25 मिनट पर हथियार पहुँचाये.

60 वर्ष पूर्व, 25 जून, 1950 के दिन, उत्तर कोरिया ने ही इसी तरह के दिखावटी आरोप लगाते हुए दक्षिण कोरिया पर अचानक आक्रमण कर दिया था. कुछ ही दिनों के भीतर उसने राजधानी सौउल सहित दक्षिण कोरिया के अधिकांश भाग पर क़ब्ज़ा कर लिया. उसका क़ब्ज़ा शायद बना ही रहता, यदि अमेरिका और 15 और देशों ने मिल कर क़रीब दस लाख सैनिक नहीं जुटाये होते और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के एक प्रस्ताव की आड़ लेकर उत्तर कोरिया और उसके साथियों को उस सीमा तक पीछे न धकेल दिया होता, जो कोरिया प्रायद्वीप के विभाजन के समय खींची गयी थी.

विभाजन का इतिहास

कोरिया प्रायद्वीप 1894 से ही जापानी दबदबे में आ गया था. 1910 में जापान ने उसे अपना हिस्सा बना लिया. 1939 से 1945 तक चले द्वितीय विश्व युद्ध के समय जर्मनी और जापान घनिष्ठ साथी थे. युद्ध दोनो

Flash-Galerie Korea Krieg 1950 1953

पानमुन्जोम के पास उत्तर कोरिया का ऊंचा झंडा

की भारी पराजय के साथ समाप्त हुआ. मुख्य विजेता शक्तियों अमेरिका और तत्कालीन सोवियत संघ (आज के रूस) ने कोरिया को जापान से छीन कर जर्मनी की ही तरह उस का भी विभाजन कर दिया.

कोरिया प्रायद्वीप पर यह विभाजन रेखा थी 38 अंश अक्षांश. इस अक्षांश के उत्तर का हिस्सा रूस और चीन की पसंद के अनुसार एक कम्युनिस्ट देश बना और बोलचाल की भाषा में उत्तर कोरिया कहलाया. दक्षिण का हिस्सा अमेरिका और उसके मित्र देशों की इच्छानुसार एक पूँजीवादी देश बना और दक्षिण कोरिया कहलाया.

दोनो कोरिया अपने-अपने शुभचिंतकों पर आश्रित थे और किसी हद तक केवल शतरंजी मोहरे थे. उन्हें लड़ा रहे थे एक तरफ़ रूस और चीन, और दूसरी तरफ़ अमेरिका और उसके यूरोपीय साथी.

संयुक्त राष्ट्र के नाम पर पहला युद्ध

कोरिया युद्ध पांच ही वर्ष पहले बने संयुक्त राष्ट्र संघ की विधिवत अनुमति से चला पहला युद्ध था जो तीन साल चला था और जिसने 35 लाख प्राणों की बलि ली थी.

सोवियत संघ (रूस) और चीन के समर्थन के बल पर उत्तर कोरिया ने 1950 में जब दक्षिण कोरिया को रौंद डाला, उस समय सुरक्षा परिषद की उस स्थायी सीट पर, जिस पर आज चीन बैठता है, उसका प्रबल विरोधी ताइवान बैठा करता था (ताइवान को हटा कर यह सीट चीन को 25 अक्टूबर 1971 को दी गयी थी). चीन और सोवियत संघ की उस समय खूब बनती थी. इसलिए, चीन के साथ एकजुटता दिखाने के चक्कर में सोवियत संघ सुरक्षा परिषद की बैठकों का बहिष्कार कर रहा था. बहिष्कार करने के कारण ही वह किसी अमेरिकी प्रस्ताव को गिराने के लिए अपने वीटो अधिकार का उपयोग भी नहीं कर सका.

सोवियत संघ की चूक

तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति हैरी ट्रूमैन ने इस का भरपूर लाभ उठाया. कोरिया युद्ध शुरू होने के एक

Karte Korea nach dem Krieg Flash-Galerie

विभाजन रेखा

महीने बाद उन्होंने सुरक्षा परिषद से वह प्रस्ताव नंबर 85 पास करवा लिया, जिस के अधीन अमेरिका और उसके कई मित्र देशों को संयुक्त राष्ट्र के झंडे तले कोरिया में अपने सैनिक भेजने का अधिकार मिल गया. भारत ने भी उस समय अपनी एक मेडिकल कोर कोरिया भेजी थी.

सबसे अधिक सैनिक अमेरिका के थे. अमेरिकी सेनाओं के कंमाडर जनरल डगलस मैकआर्थर ने उत्तर कोरिया और उसका साथ दे रहे देशों के जल्द ही छक्के छुड़ा दिये. पूरा दक्षिण कोरिया लगभग ख़ाली करवा लिया.

चीन लड़ाई में कूदा

लेकिन, जैसे ही संयुक्त राष्ट्र सैनिक चीनी सीमा के पास पहुँचे, चीन खुल कर लड़ाई में कूद पड़ा. स्वंयसेवी बताते हुए उसने लाखों लड़ाके मैदान में उतार दिये. संयुक्त राष्ट्र सैनिकों को पीछे हटना पड़ा. तब मैकआर्थर ने राष्ट्रपति ट्रूमैन से कहा कि उन्हें चीन पर परमाणु बम गिराने का अधिकार दिया जाये. ट्रूमैन यह हिम्मत नहीं कर पाये. ट्रूमैन की जगह जब ड्वाइट आइज़नहावर राष्ट्रपति बने, तब उन्होंने युद्धविराम का निर्णय किया. और इस तरह, 27 जुलाई 1953 को, दोनो कोरिया की सीमा पर के एक स्थान पानमुन्जोम में युद्धविराम का समझौता हुआ और लड़ाई रुकी. आज भी युद्धविराम ही है, युद्ध-स्थिति का विधिवत अंत नहीं हुआ है.

युद्ध-स्थिति का अंत अभी भी नहीं

युद्धविराम होने तक 40 हज़ार संयुक्त राष्ट्र सैनिक, जोकि 90 प्रतिशत अमेरिकी सैनिक थे, मारे जा चुके थे. उत्तर कोरिया और उसके साथी देशों के संभवतः 10 लाख तक सैनिक मारे गये. मारे गये असैनिक नागरिकों की संख्या 20 लाख आँकी जाती है. आज भी कई हज़ार अमेरिकी सैनिक दक्षिण कोरिया में तैनात हैं, ताकि उत्तर कोरिया अचानक फिर कोई आक्रमण करने का दुस्साहस न करे.

दूसरी ओर, भारी आर्थिक कठिनाइयों और संभवतः आंशिक भुखमरी के बावजूद उत्तर कोरिया ने भी 12 लाख सैनिकों वाली भारत के बराबर की संसार की एक सबसे बड़ी सेना पाल रखी है.

युद्धविराम के बाद से 240 किलोमीटर लंबा और चार किलोमीटर चौड़ा एक विसैन्यीकृत क्षेत्र दोनो कोरिया को अलग करता है. तटपार पीत सागर में 38 अंश अक्षांश रेखा के समानांतर 200 किलोमीटर लंबी एक जलसीमा है, जिसे उत्तर कोरिया ने कभी स्वीकार नहीं किया. वहां दोनों की नौसेनाओं के बीच अक्सर झड़प हो जाती है.

दोनों के बीच की सीमा सामान्य नागरिकों के लिए हमेशा से बंद रही. कोई डाक सेवा नहीं है, कोई टेलीफ़ोन सेवा नहीं है. विभाजित जर्मनी वाले दिनों की तरह दोनो तरफ के लाखों परिवार छह दशकों से कटे फटे हैं. जर्मनी तो इस बीच एक हो गया, कोरिया का एकीकरण अभी भी एक दिवास्वप्न ही है.

रिपोर्ट- राम यादव

संपादन- उज्ज्वल भट्टाचार्य

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