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दुनिया

कोयले और तेल से विदा लेंगे जी-7 देश

26 घंटे में दुनिया की हर समस्या पर बातचीत. जर्मनी के श्लॉस एलमाउ में जी-7 बैठक का कार्यक्रम बेहद व्यस्त था. लोगों को इस सम्मेलन से बहुत उम्मीद नहीं थी लेकिन अंत में विश्व नेताओं ने पर्यावरण सुरक्षा पर तगड़ा संदेश दिया.

दुनिया की समस्याएं 21 पन्नों पर. पश्चिम के औद्योगिक देशों के सात प्रमुख नेताओं की बैठक की समापन घोषणा इतनी लंबी थी. उसमें विश्व अर्थव्यवस्था से लेकर विकास सहयोग और आतंकवाद के खिलाफ संघर्ष तक की, यूक्रेन संकट से लेकर जलवायु परिवर्तन तक की चर्चा है. यहां मेजबान अंगेला मैर्केल अपने मेहमानों से तथाकथित दो डिग्री के लक्ष्य के लिए स्पष्ट वायदा करवा पायीं.

कोयला युग का अंत

जी-7 के देश इस शताब्दी के अंत तक अपने देशों में प्राकृतिक ईंधन वाले युग की समाप्ति पर सहमत हुए ताकि पृथ्वी का तापमान औद्योगिक काल के तापमान से 2 डिग्री से ज्यादा न बढ़े. इस लक्ष्य पर कोपेनहेगेन के जलवायु सम्मेलन में सहमति हुई थी, लेकिन इस पर अमल का फैसला नहीं हो पाया था. अब पश्चिम के बड़े देश मिसाल कायम करना चाहते हैं, पेरिस में इस साल होने वाले जलवायु सम्मेलन को सफल बनाने के मकसद से भी. वहां कई विफल कोशिशों के बाद नई पर्यावरण संधि तय की जाएगी. जर्मन चांसलर के लिए साफ है कि, "हमें इसके लिए विश्वव्यापी कार्बन उत्सर्जन में गहन कमी की जरूरत है, इसलिए हमने तय किया है कि सदी के अंत तक विश्व अर्थव्यवस्था को कार्बन मुक्त करने की जरूरत है."

जी-7 के नेता इस बात पर सहमत हैं कि वैश्विक पर्यावरण लक्ष्यों को पूरा करने के लिए कांचघर गैसों में भारी कमी होनी चाहिए. इसलिए प्रमुख औद्योगिक देश 2050 तक कार्बन गैसों के उत्सर्जन में 2010 की तुलना में 40 से 70 फीसदी की कटौती के विश्व पर्यावरण परिषद के सुझावों का समर्थन करते हैं.

पर्यावरण संरक्षक खुश

इस अप्रत्याशित फैसले का पर्यावरण संरक्षण संगठनों ने एकमत से स्वागत किया है. डब्ल्यूडब्ल्यूएफ ने इसे पर्यावरण बहस को हवा की संज्ञा दी है तो ऑक्सफैम ने इसे आगे की ओर एक कदम बताया है. ग्रीनवॉच के क्रिस्टॉफ बाल्स ने भी उम्मीद जताते हुए कहा है, "कुल मिलाकर इसका मतलब है कि जी-7 ने प्राकृतिक ईंधन से नाता तोड़ने के मुद्दे को वैश्विक एजेंडे पर डाल दिया है. यह पेरिस के जलवायु सम्मेलन की बातचीत को गंभीर रूप से प्रभावित करेगा."

स्वाभाविक रूप से एलमाउ का दस्तावेज इरादे की घोषणा है. विश्वसनीयता की परीक्षा अब कई स्तर पर होगी. क्रिस्टॉफ बाल्स के अनुसार, "आने वाले दिनों में ही चांसलर मैर्केल पर जर्मनी में कोयले के इस्तेमाल पर जरूरी फैसले के मामले में दबाव होगा." दूसरे देशों के लिए परीक्षा की घड़ी पेरिस सम्मेलन के समय होगी. एलमाउ में जो फैसला लिया गया है पेरिस में उसे बाध्यकारी नियमों में पिरोना होगा.

सामाजिक मानकों की जिम्मेदारी

एक दूसरे मुद्दे पर भी चांसलर मैर्केल पर्यावरण जैसा ही स्पष्ट संकेत देना चाहती थीं. वह सप्लाई चेन में विश्व भर में एक जैसे सामाजिक स्तर का समर्थन कर रही थीं. उन्होंने शिखर सम्मेलन से पहले ही कहा था कि इस मामले में प्रमुख देशों की जिम्मेदारी है. यूरोपीय व्यापार को मिलाकर जी-7 के देशों का व्यापार विश्व व्यापार का आधा है. चांसलर ने कहा, "बांग्लादेश में राणा प्लाजा की भयानक तस्वीरें हमारी आंखों के सामने हैं." उन्होंने इस बात पर खुशी जताई कि पीड़ितों के परिवारों के लिए 3 करोड़ डॉलर उपलब्ध कराने का वायदा पूरा हुआ है.

इसके अलावा जी-7 के देश एक विजन जीरो फंड बनाना चाहते हैं जिससे उन लोगों को मदद मिलेगी जो उद्योग में सामाजिक मानकों को लागू करने का वचन देते हैं. ऑक्सफैम के यॉर्न कालिंस्की जैसे आलोचकों की शिकायत है कि फंड के लिए कौन धन देगा यह अभी तक साफ नहीं है. वे कहते हैं, "उद्योग की स्वेच्छा पर आधारित पहलों में हमारा अनुभव अच्छा नहीं रहा है." इसलिए वे कानूनी प्रावधानों की मांग करते हैं.

रूस को साफ संदेश

पश्चिमी देशों ने रूस की ओर एकजुट होने का संदेश भेजा है. जरूरत पड़ने पर जी-7 के देश प्रतिबंधों को और सख्त बनाने के लिए तैयार हैं. प्रतिबंधों को हटाए जाने की संभावना को यूक्रेन पर मिंस्क संधि के अमल के साथ जोड़ दिया गया है. चांसलर का कहना है कि इसे छोड़कर सम्मेलन में नेताओं ने रूस से ज्यादा दूसरे संकटक्षेत्रों के बारे में बात की.

श्लॉस एलमाउ पर सुबह की धुंध की तरह ग्रीस संकट का भी साया था. उस पर भी बहुत कम चर्चा हुई. चांसलर ने बताया कि गैर यूरोपीय नेताओं ने उसके बारे में सवाल पूछे और चर्चा यहीं तक रही. लेकिन उन्होंने साफ किया कि कर्जदाताओं के साथ सहमत होने का वक्त खत्म हो रहा है. बातचीत का अगला मौका अगले हफ्ते यूरोपीय संघ और लैटिन अमेरिका का शिखर सम्मेलन होगा.

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