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मनोरंजन

कॉमिक्स फिगर के साथ मधुशाला की ओर

जापान में कॉमिक्स की एक ऐतिहासिक परंपरा है मांगा. अब मांगा की नई कहानी "स्वर्गीय बूंद" के चलते जापान में अचानक फ्रेंच वाइन की बिक्री बढ़ गई है. उनकी कीमतें भी बढ़ रही हैं.

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मांगा फिगर के जरिए वाइन की धुन

दरअसल इस मांगा पर एक टीवी सीरियल भी बनाया गया है, जिसमें दिखाया गया है कि बाजार में वाइन की कौन सी किस्में मिलती हैं. यह सीरियल आने के बाद जापान और कोरिया में वाइन पीने की धुन सवार हो गई है और कुछ एक वाइन बनाने वाले नए स्टार बन गए हैं.

इस कहानी में वाइन के जानदार एक व्यक्ति का बेटा यह साबित करना चाहता है कि अपने भाई के मुकाबले वह अपने पिता के वाइन कलेक्शन का ज्यादा हकदार है. लेकिन अपने भाई की तरह उसने पिता से अंगूर की खेती, उसकी किस्मों और उसके इलाकों

Deutschland Manga Messe in Bonn

जर्मनी में मांगा कॉमिक्स का उत्सव

के बारे में सीखा नहीं है. लेकिन उसमें सूंघने की अद्भुत क्षमता है. इसके सहारे वह अपने पिता के कलेक्शन में से उन 12 किस्मों को ढूंढ़ निकालता है, जिन्हें उसके पिता 12 धर्मप्रचारक कहते हैं, और उसके बाद वह 13वीं किस्म, जिसे स्वर्गीय बूंद का नाम दिया गया था.

सत्तर लाख लोगों ने इस सीरियल के फाइनल एपिसोड को देखा और यह खबर भी किसी तरह छप गई कि स्वर्गीय बूंद दरअसल सन 2003 की शात्यु ले पुई वाइन थी.

हजारों किलोमीटर दूर फ्रांस के बोर्दो इलाके में पास्काल आमोरो थोड़ी मात्रा में शात्यु ले पुई वाइन बनाते थे. अगले दिन उन्हें ई मेल, फैक्स और टेलीफोन से 150 आर्डर मिले. बात उनकी समझ से परे थी. फिर जापान के उनके एजेंट ने बताया कि उनकी वाइन स्वर्गीय बूंद के रूप में चुनी गई है.

शात्यु ले पुई वाइन के उत्पादक के रूप में पास्काल आमोरो आराम से पैसे कमा सकते थे. लेकिन उन्हें यह बात पसंद नहीं आई कि जिस वाइन की बोतल वह 18 यूरो में बेचते थे, उसे हांगकांग में एक हजार यूरो में बेचा जा रहा है. एक खानदानी वाइन निर्माता के तौर पर उन्होंने सोचा कि उनके नियमित ग्राहकों का क्या होगा.

शात्यु ले पुई अब बाजार में नहीं मिलेगी. पास्काल आमोरो ने उसे बेचना बंद कर दिया है.

लेकिन मांगा सीरियल बनाने वाले हाल में उनके गांव में आए थे, आमोरो परिवार ने उनके स्वागत के लिए 1917 की वाइन की बोतलें खोली. यादगार के रूप में वे खाली बोतल साथ ले गए. शायद उन्हें भी हजारों डॉलर में बेचा जा सकता है.

रिपोर्ट: जॉन लोरेनसन/उज्ज्वल भट्टाचार्य

संपादन: ए कुमार

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