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मंथन

कैसे होती है विस्फोटकों की पहचान

मुंबई में बम धमाकों की घटना हो या लंदन के ट्रेन और बस स्टेशनों पर हुए हमले, पूर्व से पश्चिम तक आतंकी नेटवर्क का बड़ा हथियार हैं बम धमाके. वैज्ञानिक इन विस्फोटकों के बारे में पहले ही पता लगाने की कोशिश में जुटे हैं.

क्या इस तरह के बम धमाकों को रोका जा सकता है, क्या ऐसी मशीनें बन सकती हैं, जो विस्फोटकों के बारे में पता लगा लें और उससे होने वाले खतरे के बारे में भी? जर्मनी में फ्राउनहोफर संस्थान का इंस्टीट्यूट फॉर केमिकल टेकनीक इसी पर शोध कर रहा है.

जैसे जैसे तकनीक समृद्ध होती जा रही है, उसका दुरुपयोग करने वालों की संख्या भी बढ़ती जा रही है. जर्मनी में हाल ही में सामने आई घटनाओं से पता चलता है कि घरों में अवैध तरीके से बम बनाने वाले कट्टरपंथी बढ़े हैं. बड़े बड़े शहरों में इनका पता कैसे चले, इसके लिए फ्राउनहोफर संस्थान में उपकरण विकसित किए जा रहे हैं.

हाई टेक मशीनें

विस्फोटक विशेषज्ञ डिर्क रोएसलिंग बताते हैं, "जब पुलिस वाले किसी घटनास्थल पर पहुंचते हैं और उन्हें दो थैलियों में रखे सफेद पावडर मिलते हैं, तो वे कैसे पता लगाएं कि कौन सा पावडर कितना खतरनाक है और वह किस चीज से बना है. अगर इनका पता मशीन से चलने लगे तो बहुत आसानी हो जाएगी."

ऐसा संभव हो सके इसके लिए बहुत जरूरी है कि उपकरण ज्यादातर विस्फोटकों का डाटा पहचान सकें. धमाकों में इस्तेमाल किए जा रहे केमिकल तेजी से बदल रहे हैं और लगातार नए, खतरनाक केमिकल मिक्स सामने आ रहे हैं. अभी तक ऐसा होता रहा है कि विस्फोटकों में इस्तेमाल केमिकल से पता लग जाता था कि कौन से आतंकी संगठनों का यह काम है. लेकिन इसमें भी लगातार बदलाव आ रहे हैं.

इसलिए टेस्ट किए जा रहे छोटे छोटे उपकरण यह बता सकते हैं कि विस्फोटक में क्या क्या शामिल है और उससे कितना खतरा है. यह जानकारी मिलने के बाद पुलिस तेजी से एक्शन ले सकती है. और कई लोगों की जान बच सकती है. डिर्क रोएसलिंग के मुताबिक, "हर विस्फोटक से खतरा है. पहला कदम है पहचान तय करना. यानी हमारे पास ऐसे उपकरण हैं, जो विस्फोटक पदार्थ की सटीक पहचान बता सकते हैं."

एम्फेसिस प्रोजेक्ट

सिर्फ वैज्ञानिक ही इन नए विस्फोटक पदार्थों और मिक्स का पता नहीं लगा रहे, आतंकी भी इसमें जुटे हुए हैं. फ्राउनहोफर संस्थान में यूरोपीय संघ के नए प्रोजेक्ट की शुरुआत हुई है. इसमें कोशिश की जा रही है कि घरों से निकलने वाले पानी में खतरनाक केमिकलों का पता चल जाए. संस्थान के मोरिट्ज हाइल बताते हैं, "यह ईयू के प्रोजेक्ट एम्फेसिस का प्रायोगिक परीक्षण है. इस प्रोजेक्ट से शहरों में बम बनाने की अवैध जगहों का पता लगाने की कोशिश की जा रही है. मूल विचार है कि बड़े इलाकों की पूरी तरह से जांच नहीं हो सकती."

इसलिए अलग अलग तकनीकों की मदद से एक सेंसर नेटवर्क बनाने की कोशिश की जा रही है. अगर किसी नाली में विस्फोटकों का सुराग मिले तो यह अवैध बम बनने का संकेत देता है. हवा और जमीन के नमूनों का इस्तेमाल भी बेहतर है.

भविष्य में इस तरह का नेटवर्क संदिग्ध पदार्थों के ठोस संकेत मिलने पर अलार्म बजा देगा. इसके बाद पुलिस तुरंत कार्रवाई कर सकती है और लैब में टेस्ट से पता चल सकता है कि संदिग्ध पदार्थ कहां से आया. अभी यह प्रोजेक्ट शुरुआती दौर में है. लेकिन लक्ष्य साफ है, धमाके से पहले ही विस्फोटकों का पता लगाना.

रिपोर्टः ए हारडोर्फ/आभा मोंढे
संपादनः ईशा भाटिया

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