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डीडब्ल्यू अड्डा

कैसे सुलझेंगी लड़कियों की ये मुश्किलें?

जी20 लड़कियों के लिए ई स्किल की बात कह रहा है. ई स्किल के साथ सबसे बड़ी चर्चा होती है इन्फ्रास्ट्रक्चर की, लेकिन भारत की दलित, आदिवासी और पिछड़े वर्ग की मुश्किलें इन्फ्रास्ट्रक्चर से ज्यादा बड़ी हैं.

"आप जमीन और जंगल के अधिकार मत दीजिए और आप आदिवासी लड़कियों की विकास की बात करते रहिए. " पूर्वा भारद्वाज इस बात को बहुत झिड़की भरे लहजे में कहती हैं."

मुद्दा है जी20 का वह लक्ष्य जिसके तहत सभी लड़कियों के लिए ई स्किल के नारे के साथ-साथ इस बात पर भी जोर है कि सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़ी लड़कियों को कैसे साथ लाया जाए. उनकी पढ़ाई को कैसे बेहतर बनाया जाए.

लगभग 20 साल से शिक्षा के क्षेत्र में काम कर रही पूर्वा कहती हैं, "एक आदिवासी लड़की जिस माहौल में है तो ऐसा नहीं है कि सिर्फ स्कूल आना उसकी जिंदगी में है. वो जिस घर में रह रही है, उस घर में और आस पास क्या माहौल है ये सारी चीजें उसकी शिक्षा और शिक्षा की गुणवत्ता को प्रभावित करेंगी. इसलिए सिर्फ इन्फ्रास्ट्रक्चर के बारे में बात करना फायदेमंद नहीं है."

इन्फ्रास्ट्रक्चर की बात बार-बार इसीलिए आ जाती है कि जब भी भारत की स्कूली शिक्षा को बेहतर करने की बात होती है, या तकनीकी चीजों की बात होती है सबसे ज्यादा शिकायतें इन्फ्रास्ट्रक्चर की होती हैं. लेकिन बात जब दलित, आदिवासी, पिछड़े वर्ग और अल्पसंख्यकों की हों तो उनकी परेशानियां इन्फ्रास्ट्रक्चर से ज्यादा गंभीर हैं.

आदिवासी इलाकों में बड़ी जनसंख्या आज भी विस्थापन जैसी समस्याओँ से जूझ रही है. जिन लोगों के सिर पर रहने की छत और खाने का जुगाड़ न हो उनके लिए इन्फ्रास्ट्रक्चर शायद प्राथमिक मुद्दा नहीं है.

इसी बात पर पूर्वा कहती हैं, "जो भी विकास की बात करता है वह पूरी तरह से इन्फ्रास्ट्रक्चर और जो सहूलियतें हैं उनमें पैसा पंप करने की बात करता है, लेकिन आप उसके साथ उसके जो बाकी अधिकार है उनकी बात नहीं करते. मान लीजिए कि दंगा प्रभावित इलाका है, वहां आप पचास स्कूल खोल लीजिए वहां आप सब कुछ कर दीजिए लेकिन यदि ये स्थिति ही नहीं है कि सामान्य विश्वास का माहौल हो और दो समुदाय मिल कर आपस में बात कर सकें, वहां आप स्कूल आलीशान स्कूल खड़ा कर लीजिए लेकिन उससे क्या हासिल होगा? उससे कुछ भी हासिल नहीं होगा" 

राजस्थान की स्कूली शिक्षा पर काम कर रहे एक रिसर्चर अभिषेक कुमार कहते हैं, "इन लोगों की अलग समस्याएं हैं. यहां ये बच्चे सिर्फ पहली या दूसरी पीढ़ी हैं जो स्कूल पहुंच रही है. इनके मां बाप के लिए शिक्षा का मतलब है कि बच्चे स्कूल जा रहे हैं. और इसमें दिक्कत यह आती है कि मां बाप शिक्षा की इस पूरी प्रकिया में किसी भी तरह से शामिल नहीं हो पाते हैं. "

यह बहुत बड़ी मुश्किल है क्योंकि छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र के आदिवासी बच्चों के लिए बनाए गए स्कूलों से लगातार इस तरह की खबरें सामने आती हैं जिनमें लड़कियों के साथ शोषण की बात होती है. उस स्थिति में लड़कियों के लिए परिस्थिति भयानक होती है क्योंकि वे अपने माता पिता से स्कूल के बारे में इतनी जानकारी साझा ही नहीं कर पाती कि वे इस तरह की बातों के बारे में बता पाएं.

इन लड़कियों के सामने उम्मीदें कम और चुनौतियां ज्यादा दिखाई पड़ती हैं. माता पिता शिक्षा के नाम पर उन्हें सिर्फ इस आस में स्कूल भेजने को तैयार हैं कि कम से कम उनके खाने और रहने की व्यवस्था हो पाएगी. दूसरी तरफ स्कूल में होने वाले शोषण के खतरे जो लगातार उन पर आसपास मंडराते रहते हैं.

इसके बाद सबसे बड़ी समस्या यह कि सरकार के इन्फ्रास्ट्रक्चर पर काफी पैसा खर्च करने के बावजूद कोई उल्लेखनीय नतीजे सामने नहीं आते. क्योंकि बच्चों को सलाह देने के लिए कोई भी नहीं है. उनके विषय, रोजगार और उनकी मुश्किलों की बात करने के लिए उनके पास न मां बाप हैं न ही कोई और व्यक्ति.

यह कितनी बड़ी चुनौती है कि वो लड़कियां जो आदिवासी आवासीय जैसे विद्यालयों में पहुंच भी गई हैं वो कैसे अपना भविष्य बनाएं और उनके पास प्रोत्साहन की वजहें क्या हों.

मध्यप्रदेश की आवासीय विद्यालय की एक टीचर ने बहुत झुंझलाते हुए कहा था, "सरकार इतना पैसा खर्च कर रही है. इतनी बड़ी बिल्डिंग हैं कि लोग देखते रह जाते हैं. लेकिन बच्चों में जैसे पढ़ने की कोई इच्छा ही नहीं है. चाहते ही नहीं हैं पढ़ना. हर साल पूरी क्लास में से मुश्किल से एक बच्चा अच्छा रिजल्ट लेकर आता है".

सवाल यह है, "वो कैसे अच्छा रिजल्ट लाएं?"

-शोभा शमी

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