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दुनिया

कैसे मिले ‘बलात्कारी’ के तमगे से निजात

"बलात्कार की समस्या" बताते हुए भारतीय छात्र का आवेदन खारिज करने की जर्मन प्रोफेसर की टिप्पणी का विवाद तो उसके माफी मांगने से थम गया. लेकिन विदेशों में भारतीय पुरुषों की 'बलात्कारी' वाली छवि बनने का प्रश्न अब भी खड़ा है.

यह सही है कि भारत में हुई बलात्कार से जुड़ी दो घटनाएं काफी चर्चा में रहीं हैं. इनमें पहला था दिसंबर 2012 में दिल्ली में चलती बस में एक युवती के साथ हुए सामूहिक बलात्कार का मामला, जिसे निर्भया कांड कहा जाता है. इसी पर आधारित है बीबीसी की ओर से बनी इंडियाज डॉटर नामक एक डाक्यूमेंट्री. उसके बाद दूसरी मामला रहा नगालैंड में बलात्कार के अभियुक्त एक अल्पसंख्यक युवक को जेल से निकाल कर सरेआम पीट-पीट कर की गई उसकी हत्या. इन दोनों मामलों के बाद देश में बढ़ते बलात्कार और उसकी वजह से खासकर विदेशों में भारत और यहां के मर्दों की बिगड़ती छवि पर बहस एक बार फिर तेज हो गई है. जर्मन प्रोफेसर की दलीलों में भी इसी की झलक मिलती है. केंद्र सरकार की पाबंदी के बावजूद इंडियाज डॉटर को बीबीसी ने दिखा दिया और उसके अलावा लाखों लोगों ने उसे इंटरनेट पर देख लिया. नगालैंड मामले में कोई डेढ़ दर्जन लोगों की गिरफ्तारी के बावजूद अब तक यह साफ नहीं हुआ है कि वह युवक सचमुच दोषी था या नहीं.

आंकड़ों की रोशनी में देखें तो साफ है कि भारत में रेप के मामले तेजी से बढ़े हैं और दिल्ली तो ‘रेप कैपिटल' यानी बलात्कार की राजधानी में बदल गई है. निर्भया कांड के बाद देशव्यापी शोर और आंदोलन के बाद सरकार ने इस सिलसिले में जो कानून बनाया था उससे भी रेप के मामले कम नहीं हुए हैं, उल्टे इनमें लगातार बढ़ोतरी दर्ज हुई है. मिसाल के तौर पर राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड्स ब्यूरो (एनसीआरबी) के ताजा आंकड़ों को ध्यान में रखें तो भारत में वर्ष 2012 के दौरान जहां बलात्कार के 24,923 मामले दर्ज हुए थे, वहीं 2013 के दौरान यह बढ़ कर 33,707 तक पहुंच गए. दिल्ली के मामले में तो यह तादाद 585 से बढ़ कर 1,441 तक पहुंच गई यानी दोगुनी से भी ज्यादा. अकेले इस साल के पहले दो महीनों के दौरान ही राजधानी में बलात्कार के तीन सौ मामले दर्ज हो चुके हैं. यह आंकड़ा उन मामलों पर आधारित है जो पुलिस तक पहुंचे. भारतीय समाज में तमाम आधुनिकताओं के बावजूद बलात्कार जैसे मामलों में ज्यादातर परिवारों का रवैया अब भी दकियानूसी ही है. इसलिए बदनामी और खानदान की इज्जत के हवाले ऐसे मामले दब या दबा दिए जाते हैं.

यह बात दीगर है कि संयुक्त राष्ट्र ने वर्ष 2010 में अपराध की प्रवृत्ति के सर्वेक्षण के आधार पर जो ‘रेप रेट' रिपोर्ट प्रकाशित की थी उसमें कई देशों का स्थान भारत से आगे था. प्रति एक लाख की आबादी पर इस ‘रेप रेट' के मामले में दक्षिण अफ्रीका, आस्ट्रेलिया और स्वाजीलैंड जैसे देश पहले तीन स्थानों पर थे. लेकिन भारत ने उस सर्वेक्षण के लिए वर्ष 2006 के आंकड़े मुहैया कराए थे. तो क्या उसके बाद तेजी से पांव पसारते इंटरनेट और पश्चिमी संस्कृति की बाढ़ ने बलात्कार के मामलों को तेजी से बढ़ा दिया है? यह शोध का विषय है. लेकिन इससे मूल सवाल का जवाब नहीं मिलता.

बलात्कार की बढ़ती घटनाओं का खासकर विदेशों में भारत की छवि पर नकारात्मक असर पड़ना तो तय है. खासकर जब अपने ही देश में लोग अपनी जवान बेटियों को उच्चशिक्षा के लिए दिल्ली भेजने से घबराने लगे हों. ऐसे में समाज के सम्मानीय अकादमिक वर्ग से आने वाली एक जर्मन प्रोफेसर की ऐसी टिप्पणी की तर्ज पर कल को दूसरे यूरोपीय देश और अमेरिका भी भारतीय युवकों को अपने शिक्षण संस्थानों में दाखिला देने या अपने देश में नौकरी देने से इंकार कर सकते हैं.

बलात्कार की समस्या और इससे देश व समाज के माथे पर लग रहे बदनुमा धब्बे को मिटाने की दिशा में ठोस प्रयास जरूरी हैं. लेकिन आखिर यह होगा कैसे? समाजशास्त्रियों की राय में इस सवाल का जवाब किसी कानून से नहीं मिल सकता. इसके लिए सामाजिक और सांस्कृतिक रूप से एक संगठित अभियान चलाना जरूरी है. इसके जरिए ही समाज को इस बारे में जागरूक बनाया जा सकता है कि महज मुट्ठी भर लोगों के इस घिनौने कृत्य से सवा सौ करोड़ की आबादी वाले देश के माथे पर कलंक का टीका लग रहा है. समाज की जागरुकता के बिना बलात्कार की बढ़ती घटनाओं को रोकना संभव नहीं है. लेकिन इसके साथ ही यह ख्याल रखना भी जरूरी है कि कहीं यह जागरुकता नगालैंड की तरह हिंसक प्रवृत्ति में ना बदल जाए. वैसी स्थिति में हालात और बेकाबू होने का खतरा है. इसलिए इस दिशा में योजनाबद्ध तरीके से सोच-समझ कर कदम उठाना जरूरी है. अगर तुरंत इसकी पहल नहीं हुई तो जर्मन प्रोफेसर की ओर से दी गई दलीलें धीरे-धीरे आम हो जाएंगी.

ब्लॉग: प्रभाकर, कोलकाता

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