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दुनिया

कैसे मिलेगी प्रवासियों को अच्छी जिंदगी?

अच्छी जिंदगी की तलाश में यूरोप आने वाले शरणार्थियों की कहानी कई बार झकझोर देती है. जान जोखिम में डालकर ये लोग यूरोप पहुंचते हैं. कई बार इन्हें बहुत बुरे व्यवहार का सामना करना पड़ता है.

ब्रसेल्स में होने वाले सम्मेलन में जब यूरोपीय संघ के नेता मिलेंगे तो इस बार आर्थिक मुद्दा कार्यसूची में शीर्ष पर नहीं होगा. इसका ये मतलब नहीं है कि दबाव खत्म हो गया है. ईयू प्रवासियों के मोर्चे पर गंभीर समस्या झेल रहा है. हजारों प्रवासी हर साल ईयू के दरवाजे पर सुरक्षित ठिकाने की तलाश में आते हैं. ईयू के सामने इस ज्वलनशील मुद्दे पर अपना पक्ष रखने की बड़ी चुनौती है. प्रवासियों की भीड़ से जूझ रहे इटली के प्रधानमंत्री एनरिको लेटा ने चेतावनी दी है, ''हम साधारण समझौता स्वीकार नहीं करेंगे. हमारे तट इटली की परिधि में नहीं आते बल्कि यूरोप की सीमा चौकी हैं."

यूरोप के लिए अहम मुद्दा

लंबे अर्से से प्रवासी यूरोप के लिए एक संवेदनशील मुद्दा रहे हैं. बेहतर जिंदगी और सुरक्षा की तलाश में निकले लोगों का मुख्य ठिकाना यूरोप रहा है. यूरोप के दक्षिणी देशों की हमेशा से शिकायत रहती है कि उसके यहां आने वाले प्रवासियों को उत्तरी देश अपने पास नहीं रखते.

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ज्यादातर प्रवासी पहले यूरोप के दक्षिण देश जाते हैं. सबसे ताजा तनाव पैदा करने वाली घटना इसी साल 3 अक्टूबर की है, जब 500 के करीब यात्रियों को लेकर आ रही नाव इटली के दक्षिणी हिस्से में डूब गई. उस हादसे में करीब 370 लोगों की मौत हो गई. मरने वालों में ज्यादातर एरिट्रिया के रहने वाले थे. यूरोपीय नीति केंद्र के यीव्स पास्काउ सवाल करते हैं, "क्यों यूरोपीय संघ और उसके सदस्य देश लोगों की जान बचाने में विफल रहे हैं.'' अंतरराष्ट्रीय समझौतों के मुताबिक इन हिस्से में लोगों को सुरक्षा दी जानी चाहिए जो अपनी जान बचाने के लिए भाग रहे हैं. इटली के अधिकारियों का कहना है कि उन्हें ईयू से ज्यादा एकता की जरूरत है.

क्या बन पाएगी बात

लेटा ने कहा है कि सम्मेलन में वो चार मुद्दों पर चर्चा करेंगे. उनका कहना है कि प्रवास का मुद्दा यूरोप का सवाल है. लेटा के मुताबिक ईयू सीमा पर फ्रंटेक्स एजेंसी को लेकर तेजी दिखाना और यूरोस्टार कम्युनिकेशन नेटवर्क का स्थापना करना अहम है. लंबे समय से ईयू से मांग होती रही है कि वो कानूनी प्रवास गलियारों का गठन करें ताकि क्रूर मानव तस्करों का कारोबार बंद हो सके. इसके साथ ही ये भी मांग होती रही है कि तथाकथित डब्लिन कानून में बदलाव किए जाएं. डब्लिन कानून के मुताबिक शरण चाहने वालों को उस देश में ही अर्जी देनी पड़ती है जिसमें में वे पहले पहुंचते हैं.

बहुत ज्यादा बदलाव की संभावना इसलिए नहीं नजर आ रही है क्योंकि जर्मनी के गृह मंत्री हंस-पेटर फ्रीडरिष ने हाल ही में इटली के उन दावों को खारिज कर दिया जिसमें कहा गया कि इटली में जरूरत से ज्यादा प्रवासी हैं. फ्रीडरिष के मुताबिक दस लाख इटली नागरिक पर 260 प्रवासी हैं तो जर्मनी में दस लाख नागरिकों पर 946 प्रवासी हैं. इटली के प्रवास को लेकर आंकड़ों की आलोचना भी हुई है. इटली में स्वागत कक्ष भीड़ से लबालब होते हैं. प्रवासियों को अनौपचारिक रूप से दूसरे ईयू देशों में ठिकाना तलाशने की सलाह दी जाती है.

इटली के उप प्रधानमंत्री और गृह मंत्री एंजेलिनो अलफानो ने बुधवार को एक रेडियों इंटरव्यू में विवादित बयान दे डाला. अलफानो ने इंटरव्यू में कहा, "हम हर किसी का स्वागत नहीं कर सकते. हमें इटली के नागरिकों के भविष्य के बारे में सोचना है.'' हालांकि ईयू पर दबाव बनाने वालों में इटली अकेला देश नहीं है. लेटा के मुताबिक वो फ्रांस, ग्रीस, माल्टा और स्पेन के साथ मिलकर सम्मेलन में सामान्य स्थिति बनाने की कोशिश कर रहे हैं. हालांकि सम्मेलन में प्रवासियों का मुद्दा छाए रहने की उम्मीद है लेकिन अमेरिकी जासूसी के मुद्दे पर भी चर्चा मुमकिन है. दो दिवसीय सम्मेलन में डिजिटल मुद्दे पर भी बात होगी. इसके अलावा विज्ञान के क्षेत्र में नई खोज पर जोर देने की कोशिश की जाएगी. यूरोप में बेरोजगार नौजवानों पर भी बातचीत हो सकती है.

एए/एनआर (डीपीए)

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