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ब्लॉग

कैसे मिटे पाकिस्तान से पोलियो

पाकिस्तान में पोलियो के जड़ से खत्म न होने की कई वजहें हैं. केवल तालिबान और कट्टरपंथियों के माथे इसका ठीकरा नहीं फोड़ा जा सकता.

पाकिस्तान में बढ़ते पोलियो के मामले न केवल पाकिस्तान सरकार के लिए चिंता का विषय हैं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय के लिए भी. यही वजह है कि ग्लोबल पोलियो इरैडिकेशन इनिशिएटिव (जीपीईआई) की टीम इन दिनों लंदन में पाकिस्तान पर चर्चा कर रही है. 1988 में शुरू हुए जीपीईआई के पोलियो अभियान के बाद से दुनिया भर से पोलियो को 99 फीसदी खत्म किया जा चुका है. एक प्रतिशत की कसर बची है नाइजीरिया, अफगानिस्तान और पाकिस्तान में.

इस साल दर्ज हुए कुल मामलों में करीब 84 फीसदी पाकिस्तान के हैं. अधिकतर अफगानिस्तान की सीमा से लगे खैबर पख्तूनख्वाह और कबायली इलाके वजीरिस्तान के मामले हैं. इसकी वजह पाकिस्तान सरकार सालों से यह बताती रही है कि इलाके में तालिबान का दबदबा है और लोगों में डर और गलत धारणाएं फैलाई गयी हैं. लेकिन सवाल यह उठता है कि इनसे निपटने के लिए सरकार ने किस तरह के कदम उठाए हैं.

अविश्वास का माहौल

पोलियो अभियान से जुड़े कई लोगों की तालिबान ने हत्या कर दी है. ऐसे में लोगों में अब अभियान से जुड़ने को ले कर डर है. लेकिन सरकार की ओर से इन लोगों को भविष्य में सुरक्षा मुहैया कराने के लिए कोई आश्वासन नहीं दिया गया है. जिन इलाकों में पोलियो बूथ लगाए जाते हैं, वहां बिजली की कटौती एक बड़ी समस्या है. इस कारण टीकों को सही तापमान में सुरक्षित नहीं रखा जा सकता. पुराने पड़ चुके खराब टीके बच्चों को दिए जाने की खबर के बाद से लोगों में अविश्वास का माहौल और भी ज्यादा है.

एक तो पहले ही पाकिस्तान में पोलियो की खुराक को ले कर गलतफहमियां हैं. कोई कहता है कि इससे पुरुष नामर्द बन सकते हैं, तो किसी का मानना है कि यह महिलाओं को बांझ बनाने की साजिश है. ऐसी भी अफवाहें हैं कि खुराक में गर्भ निरोधक दवा है और यह भी कि इससे बच्चे कमजोर पड़ जाते हैं. कुल मिला कर अफवाह उड़ाने वालों ने दवा को एक ऐसा रंग दे दिया है कि पश्चिमी देशों, खासकर अमेरिका ने मुसलमानों का खात्मा करने के लिए एक जादुई घुट्टी बना दी है. यही वजह है कि कट्टरपंथी इसे इस्लाम के खिलाफ मानते हैं. पर सवाल कट्टरपंथियों की सोच पर नहीं, बल्कि सरकार की जवाबदेही पर उठता है. देश में ऐसी अफवाहों पर लगाम कसने के कोई अभियान नहीं देखे जा रहे.

लोगों में अविश्वास का एक बड़ा कारण डॉक्टर शकील अफरीदी का अमेरिका के साथ मिला होना भी है. अमेरिका ने ओसामा बिन लादेन को पकड़ने के लिए फर्जी पोलियो अभियान का सहारा लिया. ऐसे में यह कहना भी गलत नहीं होगा कि लोगों में शक के माहौल के लिए अमेरिका भी जिम्मेदार है. भले ही अमेरिका ने इसकी जिम्मेदारी ली हो और दोबारा इस तरह की नीति ना अपनाने का आश्वासन भी दिया हो लेकिन इसका असर होता नहीं दिख रहा.

लोगों तक पहुंचना जरूरी

ऐसा नहीं कि पाकिस्तान में हर व्यक्ति पोलियो की खुराक के खिलाफ है. पेशावर, कराची और कबायली इलाकों को छोड़ कर बाकी का देश पोलियो मुक्त है. देश में कई मौलवी सार्वजनिक रूप से पोलियो अभियान का समर्थन कर चुके हैं. ऐसे में सरकार की जिम्मेदारी बनती है कि ऐसे धार्मिक और कबायली नेताओं के साथ मिल कर रणनीतियां तैयार करे और आम लोगों तक पहुंचे. पाकिस्तान में हुए एक सर्वे के अनुसार कबायली इलाकों में करीब आधे लोगों को पोलियो के खतरों के बारे में जानकारी नहीं थी. नागरिकों के बीच जागरूकता फैलाना अहम है. ऐसा भी नहीं कि जागरूकता अभियान चलाने के लिए पैसे की कमी है. डब्ल्यूएचओ जैसे संगठनों से मिल रही राशि से लोगों के बीच पहुंचा जा सकता है. जरूरत है जमीनी स्तर पर उनसे जुड़ने की.

साथ ही भारत जैसे पड़ोसी देशों का भी फर्ज बनता है कि अपने अनुभवों से मदद करे. यह केवल नैतिक रूप से ही जरूरी नहीं है, बल्कि भारत के हक में भी है. क्योंकि इस बात का भी खतरा बना हुआ है कि सीमापार से पोलियो का वायरस एक बार फिर देश में प्रवेश कर सकता है. इसी को ध्यान में रखते हुए डब्ल्यूएचओ ने पाकिस्तान से बाहर जा रहे लोगों पर प्रतिबंध लगा दिया है. विदेश में जाने के लिए अब केवल वीजा की ही नहीं, नागरिकों को पोलियो की खुराक के सर्टिफिकेट की भी जरूरत पड़ती है.

पोलियो कोई ऐसी बीमारी नहीं जिसे जड़ से खत्म ना किया जा सके. लेकिन ऐसा तभी हो सकता है, जब लोगों का समर्थन प्राप्त हो. स्वास्थ्य कर्मियों की सुरक्षा, लोगों के बीच जागरूकता, योजनाओं पर बेहतर अमल और अंतरराष्ट्रीय सहयोग से ऐसा मुमकिन है.

ब्लॉग: ईशा भाटिया

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