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मंथन

कैसे भरेगा नौ अरब लोगों का पेट

दुनिया की बढ़ती आबादी का पेट भरने के लिए ज्यादा अनाज की जरूरत है. पैदावार बढ़ाने के साथ ही पर्यावरण का ख्याल रखना भी जरूरी है. ऐसा तभी हो सकता है जब ज्यादा उपयोगी फसलें लगाई जाएं.

ज्यादा पैदावार वाली फसलें तैयार करने के लिए अब उच्च तकनीक का सहारा लिया जा रहा है. तकनीक की मदद से सेहतमंद या मुश्किल हालात झेल सकने वाली प्रजातियों की खोज की जा सकती है. बॉन यूनिवर्सिटी के इंस्टीट्यूट ऑफ क्रॉप साइंसेज के कृषि वैज्ञानिक प्रोफेसर हाइनर गोल्डबाख को लगता है कि 2050 तक दुनिया की आबादी बढ़कर नौ अरब हो जाएगी. इतनी आबादी का पेट भरने के लिए हर साल पैदावार औसतन डेढ़ फीसदी बढ़ानी होगी.

कैसे बढ़े पैदावार

इस चुनौती से निपटने के लिए कई स्तरों पर प्रयोग हो रहे हैं. प्रोफेसर गोल्डबाख ने इंजीनियरों, आईटी विशेषज्ञों और कृषि विज्ञानियों की एक टीम बनाई है. टीम का मकसद है ऐसा सेंसर विकसित करना जो फसल की पैदावार को तेज कर सके. यह काफी फायदेमंद है, "सेंसर फसल की पैदावार में कुछ इस तरह से मदद करते हैं कि वे बहुत तेजी से इस बात का पता लगा लेते हैं कि फसल की हालत क्या है. किसान खुद भी ऐसा कर सकते हैं, लेकिन एक दो घंटे बाद वे थक जाएंगे और गलती होने की संभावना भी बहुत है. सेंसर बिना थके घंटों तक यह काम कर सकते हैं और इससे बहुत मदद मिलती है."

पत्तियों पर बीमारी जल्द पकड़ने के लिए वैज्ञानिक एक हाइपरस्पेक्ट्रा कैमरा इस्तेमाल कर रहे हैं. यह स्कैनर की तरह काम करता है और पत्ती के रंध्रों से टकराकर रोशनी वापस भेजता है. 210 अलग अलग वेवलेंथ का डाटा जमा कर स्पेट्रल पत्ते का फिंगरप्रिट तैयार कर लेता है, जिस पर बारीकी से काम किया जा सकता है. बॉन यूनिवर्सिटी की आने काटरीन मालाइन कंप्यूटर पर इन नमूनों को जांचती हैं, "यहां स्क्रीन की दाहिनी तरफ आप हाइपरस्पेक्ट्रल रिजल्ट वाली तस्वीर देख सकते हैं. रंगों को उलट कर जब देखा जाता है, तो पता चलता है कि ये पीला हिस्सा सेहतमंद है. नीले और हरे हिस्से अलग से दिख रहे हैं जिससे पता चल रहा है कि पत्ता के कौन सा हिस्सा बीमार है."

हाई टेक होती खेती

सॉफ्टवेयर पत्ते में लगी अलग अलग किस्म की बीमारियों को खुद ही तेजी से पकड़ लेता है. भविष्य में इसे सीधे खेतों में ही इस्तेमाल किया जा सकता है. प्रोफेसर गोल्डबाख के मुताबिक इस तरह की तकनीक के जरिए भविष्य में पौधों के प्रजनन तंत्र को भी तेज किया जा सकेगा, "कुछ पौधों में यह प्रक्रिया होने में 10 से 12 साल लगते हैं, अगर हम इसे दो साल में ही कर पाएं तो ये बड़ी सफलता होगी."

बायोलॉजिस्ट बिरगिट फ्रिके अपने हाइपरस्पेक्ट्रा सेंसर से सीधे फसल को देखती हैं. इससे उन्हें चुकंदर के पौधों के मेटाबॉलिज्म और सेहत के आंकड़े मिलते हैं. तकनीक के पीछे छुपा सिद्धांत सरल है. पत्तों पर सूरज की रोशनी पड़ती है और परावर्तित होती है, मापने की तकनीक इसी पर आधारित है. जब पौधा बीमार होता है तो उसका मेटाबॉलिज्म गड़बड़ा जाता है और उसका प्रकाश परावर्तित करने का ढंग भी बदल जाता है. इसी बदलाव को सेंसर पकड़ लेता है.

सेहतमंद पौधे में बीमारी से लड़ने की क्षमता बढ़ाई जा सकती है. इस तकनीक का फायदा धान जैसी फसलों तक भी पहुंचाया जा सकता है.

फसल की 3डी मैपिंग

पौधे कितने बड़े हुए, पूरी फसल कैसे बढ़ रही है, इसका पता टेरेस्ट्रियल लेजर स्कैनर लगाता है. उपकरण खेत की 3डी तस्वीर तैयार करता है. इससे काफी कुछ पता चलता है. कोलोन यूनिवर्सिटी के जियोग्राफिक्स इंस्टीट्यूट की नोरा टिली इस तकनीक का फायदा बताती हैं, "शुरुआत में जब बुआई होती है तो पौधे बहुत ही छोटे होते हैं. उस वक्त तो वो हमें ठीक से दिखते भी नहीं हैं. उसी दौरान हम एक बार आकर पूरे खेत को स्कैन कर लेते हैं. इससे हमें खेत का एक डिजिटल मॉडल मिल जाता है. इसके बाद हम हर दो हफ्ते में स्कैन करते हैं. फिर जब हम शुरुआती मॉडल से ताजा स्कैन की तुलना करते हैं तो हमें समझ आ जाता है कि कितनी फसल हुई है.

वैज्ञानिक चाहते हैं कि खेत के कोनों में चार मापने वाले उपकरण लगाए जाएं. इनकी मदद से पौधे और पूरी फसल के बारे में बेहतर जानकारी मिलती रहेगी. हाई टेक खेती की मदद से पैदावार बढ़ाई जा सकेगी. तभी लगातार बढ़ती आबादी का पेट पाला जा सकेगा.

मार्टिन रीबे/ओएसजे

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