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दुनिया

कैसे पायें कट्टरपंथी छवि से छुटकारा

ब्रिटिश पाकिस्तानी इस बात के सामने आने के बाद डरे हुए हैं कि लंदन हमले में शामिल एक संदिग्ध उन्हीं के समुदाय का है. उन्हें यह बात भी परेशान कर रही है कि वे किस तरह खुद से जुड़ी कट्टरपंथी छवि को दूर करें.

पुलिस ने लंदन में हुए हमले में शामिल तीन संग्दिग्धों की पहचान की है, जिसमें एक की पहचान खुर्रम बी के रूप में हुई है. संदिग्ध पाकिस्तानी मूल का ब्रिटिश नागरिक बताया जा रहा है. दूसरे संदिग्ध की पहचान राशिद आर के रूप में की गई है जिसके मोरक्को लीबियाई मूल का होने की बात है. इसके अलावा तीसरा संदिग्ध योसेफ जी है, जिसने खुद को मोरक्को-इतालवी बताया था.

ब्रिटेन में रह रहे पाकिस्तानी प्रवासी इस बात से बेहद डरे हुए और सदमे में हैं कि वहां हुए एक और हमले में किसी दोषी की पहचान पाकिस्तानी के रूप में हुई है. एक तरफ उन्हें इस बात की चिंता है कि हमले में खुर्रम बी के शामिल होने के बाद उन्हें भी सवालिया निगाहों से देखा जाएगा, दूसरी तरफ उनके सामने यह सच्चाई भी है कि बहुत से पाकिस्तानियों ने कट्टर इस्लाम का रास्ता अपना लिया है.

कैसे बनी ये छवि

ब्रिटेन में कट्टरपंथी इस्लाम 1970 के दशक से किसी न किसी रूप में मौजूद रहा है, लेकिन 11 सितंबर 2001 में अमेरिका पर हुए के हमले के बाद ये ताकतवर होने लगा. 2005 में लंदन में हुए हमले के बाद सारी दुनिया का ध्यान कट्टर इस्लाम पर गया. ये ध्यान देने वाली बात है कि 2005 के हमलावरों में तीन पाकिस्तानी शरणार्थियों की ब्रिटेन में पैदा हुए संतान थे.

एक ब्रिटिश पाकिस्तानी हसन नईम ने डॉयचे वेले को बताया कि ब्रिटेन के कई लोग कट्टरपंथी इस्लामिक उपदेशक अंजेम चौधरी की वजह से पाकिस्तानियों को चरमपंथियों से जोड़कर देखते हैं. अंजेम चौधरी को ब्रिटेन में आईएसआईएस के समर्थन करने के आरोप में पांच साल की सजा सुनाई गयी थी.

लंदन में रह रहे पाकिस्तान के एक विकास मामलों के विशेषज्ञ अमारा कंवल ने डॉयचे वेले से कहा कि ब्रिटेन में रह रहे मुसलमान ब्रिटिश समाज में नहीं घुलमिल रहे हैं. "मेरी राय में सारे तो नहीं, लेकिन कुछ लोग उसी समाज को नुकसान पहुंचा रहे हैं, जहां वे रह रहे हैं. और यह बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण है."

भयानक कट्टरता

पश्चिमी देशों में रह रहे पाकिस्तानी इस्लामी कट्टरपंथ का विरोध करते हैं और वे खुर्रम बी और अंजेम चौधरी जैसे लोगों से बेहद नाराज हैं जो उनके देश और उनके धर्म का नाम खराब कर रहे हैं. हालांकि उन्हें इस आलोचना को नकारने में भी मुश्किल हो रही है कि उनमें से ज्यादातर लोग पश्चिमी देशों के मूल्यों और संस्कृति को स्वीकार करने को राजी नहीं है. 

इस्लामी कट्टरपंथ पर कई किताबें लिख चुके अमेरिका में रहने वाले लेखक आरिफ जमाल ने डॉयचे वेले से कहा कि ज्यादातर मुस्लिम परिवार पश्चिमी देशों में आसानी से घुलमिल नहीं पाते. "उन्हें पश्चिमी संस्कृति और इस्लाम में बहुत अंतरविरोध नजर आता है. और यहीं से कट्टरता की शुरुआत होती है."

लंदन के फैज कल्चरल फाउंडेशन के वामपंथी सदस्य असीम अली शाह का कहना है कि लंदन हमलों का इस्तेमाल ब्रिटिश समाज में गलत धारणा, डर या विभाजन पैदा करने के लिए नहीं करना चाहिए, मुस्लिम समुदाय और पाकिस्तानी जिसका अविभाज्य हिस्सा हैं.

गंभीरता की कमी

असीम अली शाह के अनुसार सरकार को ब्रिटेन में कट्टरपंथ के प्रसार के लिए मुस्लिम समुदाय को दोष देने की जगह अपनी नीतियों का पुनरमूल्यांकन करना चाहिए. उन्होंने कहा कि ब्रिटिश सरकार ने कट्टरपंथ के मूल कारणों से निबटने में लापरवाही बरती है. वे सऊदी अरब को हथियार बेचते रहे हैं, जो इस्लामी कट्टरपंथ का सबसे बड़ा प्रोमोटर है.

"पाकिस्तानी समुदाय के ज्यादातर लोग रूढ़िवादी हैं. और इनका सऊदी अरब के पैसों से चलने वाले धार्मिक स्कूलों और मस्जिदों ने फायदा उठाया है. कट्टरपंथी उपदेशक इन मस्जिदों का इस्तेमाल इस्लाम की कट्टरपंथी

सलाफी विचारधारा के प्रचार में कर रहे हैं." शाह का कहना है कि सरकार को आतंकवाद से निपटने के लिए अपनी रणनीति की समीक्षा भी करनी चाहिए.

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