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विज्ञान

कैसे करें डाटा की जासूसी

खुफिया एजेंसियां डाटा पर नजर कैसे रखती हैं. अगर तकनीक का पता चल जाए तो यह बहुत मुश्किल काम नहीं है.

दुनिया के लगभग सारे देश यह मानकर चलते हैं कि उनकी विदेशी खुफिया एजेंसी बाहरी फोन लाइनों पर निगरानी रखती हैं. इंटरनेट नेटवर्क कंपनियों की लाइनें अगर एक देश के सरहद पार करती हैं तो उन्हें अपनी सरकारों को फाइबर ग्लास केबल की जांच करने की अनुमति देनी होती है. लेकिन सरकारें इसका गलत फायदा उठाती हैं.

बिजली से डाटा

फाइबर ग्लास केबल से डाटा इस तरह निकाला जा सकता है जिससे कि लोगों को पता भी न चले लेकिन यह काम आसान नहीं. इसके लिए फाइबर ग्लास केबल की बनावट का पता होना जरूरी है. साधारण ट्रांसमिशन के लिए लगाए जाने वाले फाइबर ग्लास केबल में 144 फाइबर ग्लास के रेशे होते हैं. समुद्र या नदी के नीचे से जाने वाले केबल में फाइबर ग्लास के केवल आठ रेशे होते हैं.

फाइबर ग्लास के जरिए डाटा इस तरह ट्रांसफर होता है. पहले इस डाटा को लेजर के जरिए बिजली की छोटी छोटी किरणों में बदला जाता है. यह किरणें शून्य और एक अंक को दर्शाती हैं जिससे डिजिटल डाटा बनता है. फाइबर ग्लास वायर के अंत में एक फोटो डायोड होता है जो इन किरणों से दोबारा डाटा बनाता है. फाइबर ग्लास से हर सेकेंड में करीब 10 अरब किरणें जाती हैं. यानी एक वायर से हर सेकेंड 1.2 गीगाबाइट डाटा जा सकता है. इतना सारा डाटा चार से पांच सीडी में समा सकता है.

कमजोरी का फायदा

लेकिन लंबे रास्ते तय करके डाटा भी कमजोर हो जाता है. बर्लिन में फ्राउनहोफर इंस्टीट्यूट के क्लाउस डीटर लांगर कहते हैं कि हर 80 किलोमीटर पर दोबारा डाटा को और तीव्र किया जाता है. यह काम एक रीजनरेटर की मदद से होता है. नदी या समुद्र के नीचे वाले केबल में भी रिजनरेटर होते हैं. तांबे की तारों के जरिए इनमें बिजली की आपूर्ति होती है.

इन्हीं रिजनरेटरों में कमजोरियों का फायदा उठातीं हैं सरकारें और वह सारे लोग जो डाटा पर निगरानी या उसकी चोरी करना चाहते हैं. रिजनरेटर में फाइबर ग्लास की तारें अलग अलग रखी जाती हैं क्योंकि हर तार से जा रहे डाटा को मजबूत करना पड़ता है.

लेकिन अगर इंटरनेट सेवा उपलब्ध कराने वाली कंपनी इस तरह डाटा की चोरी का पता लगा लें तो वह जान सकते हैं कि डाटा किस जगह पर अचानक कमजोर या गायब हो जाता है.

क्या तलाश रहे हैं

लेकिन डाटा चोरी कर रहे जासूस के लिए भी काम आसान नहीं. इतने सारे डाटा में उसे संदिग्ध जानकारी को छानना भी होगा. सबसे अच्छा होता है जब वह ऐसा तुरंत करे. क्योंकि अगर एक फाइबर ग्लास केवल अपने 50 प्रतिशत की क्षमता तक काम कर रहा है तो एक घंटे में एक टेराबाइट डाटा जमा हो जाएगा. फ्राउनहोफर वैज्ञानिक लांगर बताते हैं कि खुफिया एजेंसियां एक घंटे के अंदर एक टेराबाइट डाटा को छानने की कोशिश करती हैं.

इसके अलावा डाटा को डिकोड भी करना होता है. इसके लिए इन्हें कहीं और सेव करना पड़ता है. साथ ही खुफिया एजेंसियों को पक्का करना होगा कि वह सही तरह का डाटा बचा कर रख रहे हैं. वैज्ञानिक लांगर मानते हैं कि खुफिया एजेंसियां सारे केबल पर नहीं बल्कि एक इंटरनेट सेवा कंपनी पर ध्यान देते हैं. लांगर का मानना है कि ईमेल, टेलीफोन और इस तरह की चीजों को ढूंढने में ज्यादा फायदा है.

समुद्र के नीचे जासूस

फाइबर केबल में से डाटा निकालना तभी फायदेमंद हैं जब डाटा निकालने वाली एजेंसियों के पास बड़े सर्वर हों जो डाटा पर काम भी तुरंत कर सकें. हाल ही में अमेरिकी पनडुब्बी यूएसएस जिमी कार्टर के बारे में कहा जा रहा है कि उसे समुद्र के नीचे

इंटरनेट केबलों से डाटा निकालने के काम में लगाया जा रहा है. लेकिन वैज्ञानिक लांगर कहते हैं कि ऐसा सोचना बहुत काल्पनिक है. हालांकि केऑस कंप्यूटर क्लब के पेटर फ्रांक कहते हैं कि जिमी कार्टर पनडुब्बी का इस्तेमाल ऐसे कामों में किया जा सकता है और अमेरिकी सरकार ने इस दावे को अब तक खारिज नहीं किया.

फ्रांक का मानना है कि पनडुब्बी समुद्र के नीचे केबल से डाटा छान सकती है और वापस इन्हें जमीन पर एक खास स्टेशन भेज सकती है. पनडुब्बी एक मशीन समुद्र के नीचे भी छोड़ सकती है जो डाटा बचा कर रख सके.

फ्रांक कहते हैं कि अगर देश इस तरह के तरीकों का इस्तेमाल करते हैं तो यह संभावना भी बढ़ जाती है कि एक देश की खुफिया एजेंसियां केवल अपने जमीन और पानी पर ही नहीं, बल्कि कई और देशों की जानकारी की चोरी कर उसे जांच रही है.

रिपोर्टः फाबियान श्मिट/एमजी

संपादनः आभा मोंढे

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