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मंथन

कैलाश सत्यार्थी के साथ मंथन में खास बातचीत

लिंडाऊ नोबेल लॉरिएट मीटिंग्स में हर साल विज्ञान जगत की बड़ी बड़ी हस्तियां तो आती ही हैं लेकिन इस साल के हाइलाइट रहे भारत के नोबेल शांति पुरस्कार विजेता कैलाश सत्यार्थी. पेश हैं उनसे बातचीत के कुछ अंश.

डॉयचे वेले: आपने आधे घंटे की अपनी स्पीच में बार बार इस बात का जिक्र किया कि शिक्षा का अधिकार हर किसी के पास होना चाहिए. नोबेल पुरस्कार विजेता और युवा रिसर्चरों की इसमें क्या भूमिका हो सकती है?

कैलाश सत्यार्थी: अब दुनिया की कोई भी समस्या एकांगी समस्या नहीं रह गयी है. सबका एक दूसरे से जुड़ाव हो गया है. जब से क्लाइमेट चेंज और आतंकवाद के मामले सामने आए हैं सब लोग सोचने पर मजबूर हो गए हैं कि हम अकेले इनका सामना नहीं कर सकते. भारतीय परंपरा में हम पूरी दुनिया को एक परिवार मानते हैं. इसलिए हमें एक दूसरे का ख्याल रखना चाहिए.

आज हालत यह है कि एक तरफ तो हम साइंस के बड़े बड़े शोध कर रहे हैं लेकिन दूसरी तरफ बहुत लोगों को यह जान कर हैरानी होती है कि इसी दुनिया में हर सात में से एक व्यक्ति को लिखना पढ़ना नहीं आता है. इनमें बच्चों की संख्या करोड़ों में है. मैं मानता हूं कि दुनिया में शांति और संपन्नता, विकास और सामाजिक न्याय तब तक हासिल नहीं हो सकते, जब तक हर एक व्यक्ति को शिक्षा का अधिकार ना मिल जाए.

आप जमीनी स्तर पर काम करते रहे हैं. जिन बच्चों को बंधुआ मजदूर बना कर जबरन उनसे काम कराया जाता है, उन्हें आपने छुड़वाया है, उन्हें शिक्षा दिलवाई है. यह कैसे सुनिश्चित किया जाता है कि इन बच्चों का बचपन इन्हें लौटाया जाए?

बाल मजदूरी एक बुराई है. यह सोच पैदा करने के लिए हम लोग काफी प्रयास करते हैं. गांव गांव में, राजनीतिक स्तर पर सांसदों के बीच में, अधिकारियों के बीच में प्रयास करते हैं ताकि हर स्तर पर लोगों को समझ आए कि इससे देश को और पूरी दुनिया को नुकसान हो रहा है. हमारे सभी कार्यकर्ताओं की कोशिश रहती है कि वे पिट लें लेकिन अपना हाथ ना उठाएं क्योंकि अहिंसा के माध्यम से यह करना बहुत जरूरी है. दो साथी हमारे शहीद भी हो गए, एक को पीट पीट कर मार दिया गया और एक को गोली मार दी गयी थी. मेरे ऊपर कई बार हमले हुए हैं, मेरे पूरे शरीर में घाव के निशान हैं. लेकिन अगर हम उसकी प्रतिक्रिया में हिंसक हो जाते, तो हमारा काम आगे नहीं बढ़ता.

Manthan in Lindau

मंथन में कैलाश सत्यार्थी के साथ खास बातचीत

हम कोशिश करते हैं कि अहिंसक और कानून सम्मत तरीके से बच्चों को आजादी मिले. यह सब कर के हम सुनिश्चित करते हैं कि बच्चा स्कूल जा सके. अगर पहले कभी गया है, तो दोबारा जा सके और नहीं गया है, तो पहली बार जीवन में समाज और शिक्षा की मुख्यधारा में जोड़ा जा सके. ये सारे प्रयास साथ साथ चलते हैं, सब चुनौतियां हैं लेकिन हम लोग आगे बढे हैं.

यहां लिंडाऊ में बहुत ऊंचे स्तर पर रिसर्च और इनोवेशन की बात होती है लेकिन अगर गांव देहात की बात की जाए तो विज्ञान की शिक्षा में क्या भूमिका हो सकती है?

आज भी समाज में बहुत दकियानूसी चलती है क्योंकि एक वैज्ञानिक सोच का आभाव है. सिर्फ हमारे देश में ही नहीं, पूरी दुनिया में. लोग बहुत सारे पाखंडों में जुटे रहते हैं या ऐसी चीजों पर अंधविश्वास रखते हैं जो समाज के लिए ठीक नहीं हैं, जो घोर अवैज्ञानिक हैं. कई बार लोग दवाओं का इस्तेमाल नहीं करते. कई जगह देखा गया है कि धार्मिक अंधविश्वास फैलाने वाले कहते हैं कि पोलियो की दवा लेने से औरतें बांझ हो जाएंगी. परिवार नियोजन के खिलाफ लोग बातें करते हैं क्योंकि वैज्ञानिक सोच समाज के लोगों में नहीं है. उसे बढ़ाना जरूरी है.

दूसरा, वैज्ञानिक सोच से ही लगातार बढ़ रहे आतंकवाद को रोका जा सकता है क्योंकि आतंकवाद की बुनियाद में बच्चों के मस्तिष्क को प्रदूषित करने का सारा खेल चल रहा है. उनको ऐसी चीजें सिखाई जाती हैं जिनसे उन्हें लगता है कि अगर वे आत्मघाती बन जाएंगे तो स्वर्ग में चले जाएंगे. स्वर्ग की झूठी कल्पना उनको दिखाई जाती है. इस तरह की चीजें हमारे समाज में आम हैं.

एक तरफ वैज्ञानिक शिक्षा के माध्यम से लोगों को शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ रखना और दूसरा, आतंकवाद से और लगातार बढ़ रही धर्मांधता से बचाव करना जरूरी है, क्योंकि धर्मांधता और आतंकवाद दुनिया के लिए बहुत बड़ी चुनौती हैं, जिनका मुकाबला सिर्फ वैज्ञानिक शिक्षा से ही हो सकता है.

इंटरव्यू: ईशा भाटिया

देखें: लिंडाऊ नोबेल लॉरिएट मीटिंग्स में कैलाश सत्यार्थी की पूरी स्पीच.

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