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मंथन

कैमरे से मशीनों का एक्स रे

जो काम एक्स रे मशीन नहीं कर सकती वो स्पेन के एक फोटोग्राफर कैमरे से कर देते हैं. इंजीनियर से फोटोग्राफर बने माक्स दे एस्टेबान मशीनों के भीतर की पूरी दुनिया अद्भुत ढंग से सामने ले आते हैं.

माक्स दे एस्टेबान की तस्वीरें एक्स रे जैसा अहसास कराती हैं. फोटो से पता चलता है कि मशीन के भीतर क्या है और तकनीक भी कैसे बदल रही है. उदाहरण के लिए कैसेट रिकॉर्डर और सुपर-8 प्रोजेक्टर जैसी मशीनें तकनीकी बदलाव के दौरान गुम हो गईं. एस्टेबान ने बार्सिलोना में अपने फोटो स्टूडियो में तस्वीरों की नई सीरीज तैयार की है, नाम है प्रोपोज़िशन वन. एस्टेबान कहते हैं, "मैं अपने प्रोजेक्ट के जरिए बताना चाहता हूं कि तकनीक में लगातार होता बदलाव कला के लिहाज से अच्छा भी हो सकता है और बुरा भी. अगर मैं आधुनिक कैमरा इस्तेमाल न करूं तो ऐसी तस्वीरें लेना मुमकिन ही नहीं है, लेकिन दूसरी तरफ मैं ऐसी मशीनों की फोटो ले रहा हूं जो चलन से बाहर हो चुकी हैं. इससे पता चलता है कि आज के दौर में तकनीक की उम्र कितनी कम है. ये कितनी जल्दी पुरानी पड़ जाती है."

ऐसे होती है फोटोग्राफी

1970 के दशक के सुपर-8 फिल्म प्रोजेक्टर की खास तस्वीर लेने के लिए माक्स इसे खोलते हैं. फिर पुर्जों को अलग अलग कर वो उन्हें सफेद स्प्रे कलर से रंग देते हैं. कोशिश है कि हर चीज एक समान सफेद दिखे, सफेद रंग इस मशीन को एक प्रतीक सा बना देता है. मशीन का न तो असली ढांचा रहना चाहिए और ना ही असल रंग, "मैं उसका भीतरी रूप, उसकी आत्मा दिखाना चाहता हूं. इसीलिए मैं उस पर सफेद रंग चढ़ा रहा हूं."

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इसके बाद वह निकाले हुए हिस्सों को फिर जोड़ते हैं और इस दौरान हर स्टेप की तस्वीर उतारते हैं. इस तरह वह मशीनों के करीब 50 टुकड़ों को जोड़ते हैं और तस्वीरें खींचते रहते हैं. एस्टेबान बताते हैं, "मैं असल में एक इंजीनियर हूं और इससे मदद मिलती है. इंजीनियर होने की वजह से मेरे भीतर जिज्ञासा है और मैं तकनीक में बहुत दिलचस्पी रखता हूं. मैं समझना चाहता हूं कि चीजें कैसे बनाई जाती हैं और कैसे काम करती हैं. मैं मशीन के अंदर की दुनिया दिखाना चाहता हूं और मेरी तस्वीरों में आप ये देख भी सकेंगे."

कैमरे से कंप्यूटर पर

आगे का काम कंप्यूटर पर होता है. माक्स परफेक्शनिस्ट हैं. वह बेहतरीन तस्वीरें चुनते हैं. फ्रंट साइड, बैक साइड, कवर, एक एक कर वह इन तस्वीरों को सुपर इंपोज यानि एक दूसरे के ऊपर लगा देते हैं, परत दर परत. फिर वह सोचते हैं कि कौनसा तार, कौनसे नट या फिर मशीन के कौनसे पुर्जे को ज्यादा उभार कर दिखाना है.

इसके बाद थोड़ा कलर करेक्शन और प्रोजेक्टर का काम पूरा. ऐसी एक तस्वीर उकेरने में दो से तीन हफ्ते लगते हैं. एक प्रिंट की कीमत करीब 3,000 यूरो. और फिर ये तस्वीरें दुनिया भर की प्रदर्शनियों में हिस्सा बनती हैं. एस्टेबान कहते हैं, "अक्सर मेरी तस्वीरों को देखने के बाद लोग हैरान से रह जाते है. वो पूछते हैं कि मैंने ये कैसे किया. उन्हें लगता है कि मैंने या तो एक्स रे या रेडियोग्राम का सहारा लिया है या फिर स्याही और पेंसिल से स्केच बनाया है. " लोगों को हैरान करने में एस्टेबान को काफी मजा आता है.

रिपोर्ट: मारिया ग्रुनवाल्ड/ओएसजे

संपादन: ईशा भाटिया