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ब्लॉग

कैदियों के सुधार में योग का सहारा

दुनिया भर में कैदियों को सजा काटने के बाद समाज की मुख्‍य धारा में लाने के लिए तमाम सुधारात्‍मक कदम उठाए जाते हैं. भारत में सजा कम करने का प्रलोभन देकर कैदियों के सुधार में योग का सहारा लेने की अनूठी पहल की गई है.

समय और समाज की बदलती लय को देखते हुए इस पहल की कानून के लिहाज से समीक्षा का लब्‍बोलुआव इसके सकारात्‍मक और नकारात्‍मक पहलुओं को उजागर करती है. एक तरफ दंड के सुधारात्‍मक पहलू को देखते हुए इस पहल की बेहतरी से इंकार नहीं किया जा सकता है वहीं भारतीय व्‍यवस्‍था में व्‍याप्‍त भ्रष्‍टाचार इसकी कामयाबी पर संदेह पैदा करने पर मजबूर भी करती है.

पहल और मकसद

योग के लगातार बढते विश्‍वव्‍यापी महत्‍व को देखते हुए महाराष्‍ट्र की जेलों में कैदियों को सजा कम कराने का विकल्‍प मुहैया कराने के लिए यह पहल शुरू की गई है. इसके लिए राज्‍य के जेल महकमे ने इस योजना को लागू करने के निर्देश जारी कर दिए हैं. इसके तहत कैदी योग सीखकर लिखित और शारीरिक परीक्षा पास कर लेते हैं तो उनकी तीन महीने तक की सजा माफ कर दी जाएगी. इसका मकसद कैदियों के उग्र व्‍यवहार को संतुलित एवं संयमित कर उन्‍हें जेल से रिहा होने से पहले समाज की मुख्‍य धारा में शामिल होने लायक बनाना है.

राज्‍य की प्रमुख जेल यरवदा सहित अन्‍य जेलों में इस बाबत लि‍‍खित परीक्षा शुरू हो गई है जबकि योग के प्रदर्शन हेतु प्रायोगिक परीक्षा अगले साल जनवरी में होगी.

कागजों पर भले ही इस योजना का मकसद कैदियों को मानसिक तनाव से मुक्ति दिलाने के लिए सजा कम कराने के नाम पर योग से जोड़ना हो लेकिन इसके सियासी मायने भी हैं. यह जगजाहिर है कि भारत में कोई फैसला राजनीति से इतर नहीं हो सकता है. यहां भी इस आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता है. दरअसर महाराष्‍ट्र की भाजपा सरकार ने इस साल जून में मोदी सरकार की पहल पर मनाए गए अंतरराष्‍ट्रीय योग दिवस को नए आयाम देने के लिए कैदियों की जल्‍द रिहाई और उनके मानसिक संतुलन को योग से जोड़ते हुए इस योजना का आगाज किया है.

कानूनी पक्ष

जहां तक योग को जेल और कैदियों की रिहाई से जोड़ने के पीछे कानून के बल का सवाल है तो इसमें कोई शक नहीं है कि राज्‍य सरकार इस तरह का फैसला करने के लिए सक्षम है. दरअसल कैदियों के स्‍वभाव में बदलाव के लिए जेलों में चलाए जा रहे मनोवैज्ञानिक कार्यक्रमों में योग की पहले से ही अहम भूमिका रही है. साथ ही जेलों में कैदियों को कम से कम समय तक रखने के सुप्रीम कोर्ट के तमाम फैसलों के मद्देनजर योग में पारंगत होना कैदियों की सजा कम करने का बेहतर आधार हो सकता है.

दंड प्रक्रिया स‍ंहिता और जेल मेन्‍युअल के तमाम नियम राज्‍य सरकारों को ऐसे फैसले करने की छूट देते हैं.

नई दिल्ली में देश की सबसे प्रमुख तिहाड़ जेल में कैदी कल्‍याण के लिए सक्रिय सामाजिक संगठन ''प्रयास'' की शोध रिपोर्ट के मुताबिक योग कक्षाओं में नियमित तौर पर भाग लेने वाले कैदियों के व्‍यवहार में सामान्‍य कैदियों की तुलना में खासा बदलाव आया है. साथ ही मानसिक स्थिरता के इस दौर में कैदियों ने अपनी नैसर्गिक प्रतिभा निखारने में भी कामयाबी हासिल की है. इसमें संगीत, कला और खेल के क्षेत्र में कैदियों ने अपनी प्रतिभा को न सिर्फ पहचाना बल्कि निखारा भी. इसका मौजूं उदाहरण निर्भया रेप केस का नाबालिग कैदी है जिसने बाल सुधार गृह में अपनी कला प्रतिभा को ऐसा निखारा कि उसकी कलाकृतियों की चर्चा मीडिया की सुर्खियों में भी रही.

सवाल और संदेह

भारत में भ्रष्‍टाचार की उच्‍च दर को देखते हुए इस पहल की कामयाबी और दुरुपयोग होने पर संदेह के सवाल उठाए जा सकते हैं. कैदियों के आचरण पर नजर रखने वाले जेल अधीक्षकों के लिए योग को जल्‍द रिहाई का आधार बनाने जैसे फैसले कमाई की सौगात बन कर आते हैं. तिहाड़ और यरवदा जैसी अहम जेलों में कैदियों तक अपराध के सभी साजो सामान पहुंचने का सिलसिला अब तक नहीं थमना इस योजना की साख पर भी संदेह पैदा करता है.

ऐसे में राज्‍यों के जेल महकमों को अगर योग के महत्‍व पर इतना भरोसा है तो फिर राज्‍य सरकारों को इस पहल को स्‍कूल के स्‍तर पर सघन व्‍यापक अभियान की तरह शुरू कर देना चाहिए जिससे प्रतिभावान बच्‍चों की नैसर्गिक प्रतिभा अपराध की तरफ मुडने के बजाय सही दिशा में ले जाई जा सके. इस तरह के प्रयासों से अपराध की रोकथाम भी हो सकेगी और सामाजिक विसंगतियों के कारण अपराधी बनने की दिशा और दशा में बदलाव आ सकेगा.

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