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विज्ञान

कैंसर से बचाता है मां का दूध

मां से बढ़ कर कुछ नहीं है, तो मां के दूध से बढ़ कर भी कुछ नहीं है. मां के दूध के अब तक ज्ञात गुणों में एक और गुण जुड़ने जा रहा है. वह यह कि मां के दूध से बढ़कर कैंसर की और कोई दवा नहीं है.

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मां का दूध दुधमुंहे बच्चे के लिए न केवल दैनिक आहार है, वह बीमारियों को भी बच्चे से दूर रखता है, यह बात स्वीडन में लुंद विश्वविद्यालय की कथरीना स्वानबोर्ग को भी भलीभांति पता थी. वे तो केवल यह

Mutter und Kind

जानना चाहती थीं कि मां के दूध में ऐसी कौन सी चीज़ है, जो बैक्टीरियों को मार डालती है. लेकिन अपनी खोज में उन्हें जो हाथ लगा, वह और भी सनसनीखेज़ था. वह बताती हैं, "मां के दूध में हम बैक्टीरिया मारक तत्व खोज रहे थे. मां का दूध नए प्रकार के जैविक अणुओं का सचमुच एक बहुत ही अच्छा स्रोत है. यह देखने के लिए कि बैक्टीरिया कैंसर की कोषिकाओं के साथ कैसा व्यवहार करते हैं, अपने प्रयोग के दौरान हमने कैंसर वाले ट्यूमर की कुछ कोषिकाओं को भी मां के दूध में रख दिया. हमने देखा कि मां के दूध में कोई ऐसी चीज़ भी है, जो केवल बैक्टीरियों को ही नहीं, ट्यूमर कोषिकाओं को भी मार डालती है."

कैंसर मारक तत्व

इससे पहले के कुछे वैज्ञानिक अध्ययनों में देखा गया था कि जो बच्चे मां के दूध पर पले होते हैं, उन्हें बोतल के दूध पर पले बच्चों की अपेक्षा कैंसर की बीमारी कहीं कम होती है. यानी यह बात बेतुकी नहीं है कि मां के दूध में ज़रूर कोई ऐसा पदार्थ है, जो कैंसर वाली कोषिकाओं को मार डालता है. कथरीना स्वानबोर्ग अब उसी की खोज में जुट गईं.

वह उन्हें मिला भी. उसे उन्होंने नाम दिया है हैमलेट. प्रयोगशाला में किए गए प्रयोगों में वह कैंसर के एक-दो नहीं, 40 अलग अलग प्रकारों से लड़ने में कारगर साबित हुआ है. यह बात भी कुछ कम चकित करने वाली नहीं है कि मां के दूध में निहित यह हैमलेट चुन चुन कर कैंसर वाली कोषिकाओं का ही सफ़ाया करता है, सामान्य स्वस्थ कोषिकाओं को हाथ नहीं लगाता. वह बताती हैं, "कैंसर कोषिकाओं में कुछ ऐसी ख़ास बातें होती हैं, जो उन्हें हैमलेट के आगे कमज़ोर बना देती हैं. कैंसर कोषिकाओं की इस ख़ासियत को हमने निकट से देखा. हमने पाया कि कैंसर वाली कोषिकाएं हैमलेट से कहीं आसानी से जुड़ जाती हैं और उसकी कहीं बड़ी मात्रा अपने भीतर सोख लेती हैं. भीतर पहुंच कर हैमलेट कैंसर ग्रस्त कोषिका की कई विशेषताओं को अपना निशाना बनाता है. यही शायद इस बात का कारण है कि कैंसर रोग के इतने अलग अलग प्रकार उसके आगे लाचार हो जाते हैं."

महाबली हैमलेट

प्रयोगशाला में किए गए प्रयोगों में तो यहां तक देखा गया है कि मां के दूध का महाबली हैमलेट मस्तिष्क के ट्यूमर को भी बढ़ने से रोक सकता है. उसके कोई अवांछित उपप्रभाव अभी तक देखने में नहीं आए हैं, हालांकि इस दिशा में अभी और जांच-परख करने की

Babysimulator gegen Teenie-Mütter

ज़रूरत है. इस बीच इस दवा को मनुष्यों पर भी आजमाया गया है. कथरीना स्वानबोर्रग बताती हैं, "क्लीनिकल अध्ययन में हमने सबसे पहले त्वचा के पैपीलोमा कैंसर पर उसके प्रभावों की जांच-परख की. त्वचा का यह कैंसर महिलाओं के गर्भाशय कैंसर की तरह ही पैपीलोमा वायरस के कारण होता है. इस कैंसर को ठीक करने में हमें हैमलेट से काफ़ी मदद मिली. इसके बाद हमने उन रोगियों पर उसे आजमाया, जिन्हें मूत्राशय का कैंसर था. हमने सीधे उनके मूत्राशय में हैमलेट का इंजेक्शन दिया. एक ही सप्ताह बाद हमने पाया कि उनके मूत्राशय ट्यूमर की ढेर सारी कोषिकाएं मर गयी थीं."

कथरीना स्वानबोर्ग को अब तलाश है ऐसे धनदाता प्रायोजकों की, जो हैमलेट के बड़े पैमाने पर क्लिनकल टेस्ट के लिए पैसा देने को तैयार हों. इसके लिए ज़रूरी है कि हैमलेट को हर बार मां के दूध से प्राप्त करना अनिवार्य न हो. उनका कहना है कि यह शर्त इस बीच पूरी हो गयी है. उसे प्रयोगशाला में कृत्रिम ढंग से बड़े पैमाने पर बनाया जा सकता है.

रिपोर्टः राम यादव

संपादनः महेश झा

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