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दुनिया

'केवल आउटसोर्सिंग के लिए नहीं है भारत'

जर्मन शहर हनोवर में हुए अंतरराष्ट्रीय आईटी मेले सेबिट में भारत की भी कई कंपनियां पहुंची. केरल में इंफोपार्क के सीईओ ऋषिकेश नायर यहां 36 कंपनियों के साथ आए.

डॉयचे वेले: केरल पिछले 19 सालों से इस मेले में शिरकत करता रहा है. इतने समय में क्या क्या बदलाव आए हैं?

ऋषिकेश नायर: सबसे बेहतरीन प्रदर्शन रहा 2000-01 के दौरान. उस वक्त करीब आठ लाख लोगों ने सेबिट में हिस्सा लिया. इस बार करीब ढाई से तीन लाख लोग ही हैं. पिछले दो तीन साल से हाल ऐसा ही है. हालांकि यह भी कोई छोटी संख्या नहीं है.

इसकी वजह क्या हो सकती है?

एक तो यह कि इसी दौरान स्पेन में भी मोबाइल वर्ल्ड कांग्रेस चलती है. मैंने हनोवर ट्रेड फेयर के आयोजकों को यह सुझाव दिया है कि सेबिट को ऐसे समय पर ना आयोजित करें. क्योंकि इस से जनता बंट जाती है और लोग तय नहीं कर पाते कि कहां जाएं.

सेबिट में आई अधिकतर कंपनियों की शिकायत रही कि व्यापार के नजरिये से इस साल अच्छी प्रतिक्रिया नहीं मिली, इसकी क्या वजह है?

इस सवाल का पहला जवाब तो जहन में यही आता है कि इस वक्त आर्थिक मंदी चल रही है. लेकिन तर्क लगा कर अगर देखा जाए तो मंदी का दौर तो 2009-10 में भी रहा. उसके बाद बाजार उभरा. तो फिर 2012 के बाद से हमें बेहतरी दिखनी चाहिए थी. पर ऐसा तो नहीं हुआ. 2013 में भी बाजार ठंडा ही रहा और अब 2014 में भी वही हाल है. इसलिए इसका सही कारण तो मैं नहीं समझ पा रहा हूं. लेकिन एक बात तो तय है कि 1999-2000 का समय सबसे अच्छा था. उसके बाद से हम दोबारा कभी उन ऊंचाइयों को नहीं छू पाए हैं.

एक तरफ आर्थिक तंगी है तो दूसरी ओर मोबाइल और इंटरनेट के क्षेत्र में पिछले कुछ सालों में तेजी से विकास देखा गया है. इसके बावजूद बाजार उभर क्यों नहीं पा रहा है?

पहले कंपनियां अपने बजट का कम से कम 30 से 35 प्रतिशत शोध के लिए रखा करती थीं. लेकिन अब वे इस हालत में नहीं हैं. आईटी के क्षेत्र में अब भी विकास धीमा है. यह बात सही है कि तकनीक तेजी से बदल रही है. लेकिन उसका फायदा सभी कंपनियों को नहीं मिल रहा है. कुछ ही कंपनियां हैं जो इस ओर पूरा ध्यान दे पा रही हैं.

आईटी के क्षेत्र में भारत की छवि बहुत अच्छी है. विदेश में भारतीय कंपनियों को इस छवि का कितना फायदा मिल रहा है?

दुनिया भर में आउटसोर्सिंग का कुल 57 फीसदी अब भी भारत में है. यह भारत के लिए बहुत ही अच्छा है. अब तक भारत की ओर सबका ध्यान इसलिए था क्योंकि यहां श्रमिक सस्ते में मिल जाते थे. लेकिन अब ऐसा नहीं है. अब हमारे कई प्रतिस्पर्धी हैं जो भारत से आधे दामों में काम कर रहे हैं. इस बात पर ध्यान देना बहुत जरूरी है. लेकिन इसके साथ साथ भारत ने भी विकास किया है. अब हम केवल आउटसोर्सिंग के लिए ही नहीं जाने जाते. हम विदेशी कंपनियों को सहयोग दे रहे हैं और यह बहुत अहमियत रखता है.

चीन से कितना खतरा है?

चीन एक बहुत बड़ा बाजार है. पर हमारे पास फायदा यह है कि हमारे पास बहुत सारे इंजीनियर हैं. चीन को मजबूत बनाती है उसकी मूलभूत संरचना. हमारे पास अब भी उसकी कमी है. लेकिन हमारे पास कामगारों की कोई कमी नहीं, खास कर अंग्रेजी जानने वाले कुशल कामगारों की.

भारत के साथ व्यापार में कौन कौन से देश ज्यादा रुचि दिखाते हैं?

पूरी दुनिया से लोग संपर्क करते हैं. हाल ही में ईरान, तुर्की और मलेशिया की कंपनियों ने हमारे साथ काम करने में रुचि दिखाई है. यूरोप में जर्मनी के अलावा पोलैंड और बेल्जियम हैं, हालांकि फ्रांस की ओर से इस साल किसी कंपनी ने संपर्क नहीं किया है.

इंटरव्यू: ईशा भाटिया

संपादन: महेश झा

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