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ब्लॉग

केजरीवाल की गिरफ्तारी ने छेड़ी बहस

भारत में डेढ़ सदी पहले बने अंग्रेजों के कानून आज भी चलन में हैं. अरविंद केजरीवाल को जेल भेजे जाने के बाद जमानत से जुड़े एक छोटे से कानून के टूटने पर बहस तेज हो गई है कि आखिर कब तक इन बेतुके प्रावधानों को ढोना पड़ेगा.

भारत को अंग्रेजों से आजादी मिलने के बाद निजाम तो तमाम बदले लेकिन हुकूमत उन्हीं खौफनाक कानूनों की आज भी बरकरार है जो ब्रिटिश राज को कायम करने में मदद करने के लिए गुलामी के दौर में बनाए गए थे. इसकी बानगी दो तरह के मामलों में आए दिन देखने को मिलती है. वाहन दुर्घटनाओं से जुड़े हिट एंड रन केस और हत्या जैसे गंभीर अपराधों को छोड़कर सामान्य किस्म के आपराधिक मामलों में तुरंत जमानत मिल जाना. हाईप्रोफाइल सलमान खान और संजीव नंदा हों या कोई अन्य सक्षम व्यक्ति को सड़क हादसे के अंजाम देने के तुरंत बाद पुलिस द्वारा थाने से ही उदारता पूर्वक जमानत दे दी जाती है या 24 घंटे के भीतर अदालत द्वारा छोड़ दिया जाता है. भले ही दुर्घटना में किसी की मौत ही क्यों न हो गई हो.

सड़क दुर्घटना और अगंभीर किस्म के आपराधिक मामलों में जमानत की उदार शर्तों के साथ ही इस कानून को आज भी ढोने की बाध्यता बरकरार है. अगर कोई व्यक्ति पुलिस को अपने व्यवहार से संतुष्ट कर दे कि वह जांच में पूरा सहयोग करेगा तो पुलिस उसे छोड़ सकती है. कानून की भाषा में इसे अंडरटेकिंग कहते हैं. इसका उपयोग अक्सर धरना प्रदर्शन आदि में हिस्सा लेने वालों को आईपीसी की धारा 144 के उल्लंघन के मामलों में किया जाता है. गंभीर किस्म के सड़क हादसों या अन्य सामान्य आपराधिक मामलों में आरोपी को अदालत में पेशी के बाद दो तरह के बॉन्ड पर्सनल एवं सिक्योरिटी बॉन्ड पर जमानत मिल जाती है. सीआरपीसी के मुताबिक यह अदालत पर निर्भर करता है कि वह आरोपी को किसी एक बॉन्ड पर छोड़ती है या दोनों की गारंटी लेती है.

क्या है अंतर दोनों बॉन्ड में

दरअसल हाल ही में दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को मानहानि के एक मामले में सिक्योरिटी बॉन्ड नहीं देने पर जेल भेज दिया गया. इसके साथ ही जमानत के खौफनाक प्रावधानों पर बहस शुरु हो गई है. आम तौर पर अदालत दोनों बेल बॉन्ड सिक्योरिटी बॉन्ड और पर्सनल बॉन्ड पर आरोपी को छोड़ती है. दोनों बॉन्ड में कुछ शर्तें निहित होती हैं. पर्सनल बॉन्ड को सामान्य भाषा में मुचलका और सिक्योरिटी बॉन्ड को जमानत कहते हैं जिसमें एक निश्चित राशि का जिक्र होता है जिसका मकसद यह है कि जमानत की शर्तों का उल्लंघन होने पर आरोपी से उक्त राशि वसूली जा सके. यह सामान्य प्रक्रिया का नियम है.

केजरीवाल ने मुचलका देने से इंकार नहीं किया है वह सिर्फ जमानत राशि का बॉन्ड भरने से इंकार कर रहे हैं. कानून के जानकार उनकी इस जिद को गलत नहीं मानते हैं क्योंकि सामान्य आपराधिक मामलों में इसकी कोई जरुरत भी नहीं है. जबकि उसी अदालत ने केजरीवाल के अन्य साथियों को धारा 144 के उल्लंघन के आरोप में सिर्फ मुचलके पर रिहा किया भी है. इसी दलील के साथ उनके वकील प्रशांत भूषण ने हाईकोर्ट में केजरीवाल की हिरासत को चुनौती दी है. अगर अदालत का फैसला उनके पक्ष में आता है तो यह उन लाखों करोड़ों पक्षकारों के लिए नजीर साबित हो सकता है जो बॉन्ड न भर पाने की बेबसी के कारण जेलों में पड़े हैं.

Flash-Galerie Salman Khan

इन प्रावधानों की जड़

सामान्य आपराधिक मामलों को जमानती अपराध बनाने के पीछे अंग्रेजों की अपनी सुविधा निहित थी. कानूनविद अरविंद जैन इससे जुड़े रोचक तथ्य बताते हैं कि ब्रिटिशकाल में गाड़ियां सिर्फ अंग्रेजों या उनकी गुलामी स्वीकार कर चुके रियासतों के जागीरदारों के पास होती थीं. उनके हाथों सड़क हादसों के शिकार भारतीय नागरिक होते थे, ऐसे में इन बड़े लोगों की सहूलियत के लिए घटनास्थल, पुलिस थाना या फिर अदालत से जमानत देने के प्रावधान दंड संहिता में शामिल किए गए. इसी तरह अन्य सामान्य अपराधों में भी जमानत के यही प्रावधान हैं. इसी सोच के चलते मानहानि को भी जमानती अपराधों की श्रेणी में रखा गया था. क्योंकि मानहानि कुलीन लोगों की ही होती है. इस सोच से प्रेरित प्रावधान आज भी बदस्तूर इस्तेमाल में लाए जा रहे हैं.

केजरीवाल का मामला सामने आने के बाद अब यह बहस भी तेज हो गई है कि मानहानि को आपराधिक श्रेणी से बाहर किया जाए. इसे संयोग ही कहेंगे कि गत शुक्रवार को विधि आयोग ने इस मुद्दे को उठाते हुए एक सुझाव पत्र जारी कर सरकारी और गैरसरकारी स्तर पर सुझाव मांगे हैं कि क्यों न मानहानि को गैरआपराधिक कृत्य माना जाये. यह सही है कि आयोग ने पत्रकारों की सहूलियत को देखते हुए यह मामला उठाया है लेकिन इसके व्यापक आयाम को देखते हुए इसे आयोग के अध्यक्ष जस्टिस एपी शाह ने मानहानि को फौजदारी के बजाए सिविल मामलों की श्रेणी में रखने की वकालत की है.

देर आए दुरुस्त आए, डेढ़ सौ साल बाद ही सही, कम से कम कानून की नजर में सबके बराबर होने की संवैधानिक मंशा को पूरा करने के लिए कानूनों की इन बंदिशों को तोड़ना ही होगा. हालांकि प्रक्रिया जटिल और लंबी होने के कारण इन विसंगतियों से तत्काल राहत मिलने की उम्मीद करना बेमानी होगा लेकिन बदलाव की बयार में तेज हुई इस कवायद से नाउम्मीद भी नहीं होना चाहिए.

ब्लॉग: निर्मल यादव

संपादन: महेश झा

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