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डीडब्ल्यू अड्डा

कृष्णा कुरैशी की बात नहीं बनी

जर्मन मीडिया में इस हफ़्ते भी भारत और पाकिस्तान के विदेश मंत्रियों के बीच बातचीत पर टिप्पणियां की गईं. बर्लिन के दैनिक नोएस डॉएचलांड का कहना है कि अपेक्षाएं बहुत थीं, लेकिन नतीजे मामूली रहे.

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समाचार पत्र में आगे कहा गया है कि दिल्ली और इस्लामाबाद, दोनों जगह स्पष्ट रूप से निराशा देखी जा सकती थी. क्या पाकिस्तानी विदेश मंत्री कुरैशी से भारतीय विदेश मंत्री कृष्णा की मुलाकात सचमुच स्थाई शांति वार्ता की ओर एक क़दम था? अभी देखना बाकी है कि कश्मीर विवाद, आतंकवादी गतिविधियां, नदियों के पानी का बंटवारा जैसी बहुत सारी समस्याओं से कैसे निपटा जाएगा.

बैठक से पहले और उसके बाद दोनों विदेश मंत्री पत्रकारों से खुलकर बात करते रहे. उन्होंने एक दूसरे पर आरोप लगाया कि वे नमनीय नहीं हैं व असली सवाल की चर्चा के लिए तैयार नहीं हैं. काफ़ी सदिच्छा के आधार पर ही कहा जा सकता है कि कृष्णा की पाकिस्तान यात्रा तनाव शिथिलता और विश्वास बढ़ाने के लिए एक योगदान था. नतीजे के तौर पर कुरैशी की यह बात दोहराई जा सकती है कि राजनीतिज्ञ निराशा से भी आशा पैदा कर सकते हैं.

अमेरिकी विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन पाकिस्तान गई थीं. वहां उन्होंने नए सिरे से मदद का आश्वासन दिया, लेकिन पाकिस्तान में अमेरिका की छवि बेहद बिगड़ी हुई है. नोए त्स्युरिषर त्साइटुंग का कहना है कि इस्लामाबाद और पेइचिंग के बीच परमाणु सौदे की वजह से भी आलोचना से भरी आवाज़ें सुनाई दीं. समाचार पत्र का कहना है -

सोमवार को विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन ने पाकिस्तान की यात्रा के दौरान साढ़े सात अरब डालर की मदद की घोषणा की. अगले पांच सालों में मूलभूत संरचनाओं के निर्माण के लिए यह राशि खर्च की जाएगी. क्लिंटन की साल भर पहले की यात्रा की तरह इस बार भी पाकिस्तान में अमेरिका की छवि सुधारने के सवाल पर काफ़ी ज़ोर दिया जा रहा था. अमेरिका की छवि शायद ही कभी इतनी खराब रही हो. एक मत सर्वेक्षण में पाया गया कि सिर्फ़ 17 फ़ीसदी लोग अमेरिका के बारे में सकारात्मक ढंग से सोचते हैं. दूसरी ओर, अमेरिका को पाकिस्तान में परमाणु रिएक्टर बनाने की पेइचिंग की योजनाओं पर चिंता है. विशेषज्ञों के अनुसार इससे परमाणु सामग्री की आपूर्ति करने वाले देशों के समूह द्वारा तय किए गए मापदंडों का उल्लंघन होता है, जिनके ज़रिए परमाणु सामग्री व तकनीक के बेरोकटोक विस्तार को रोका जाना है.

आर्थिक समाचार पत्र फ़ाइनेंशियल टाइम्स डॉएचलांड में रिपोर्ट दी गई है कि भारत की एक अरब 20 करोड़ की आबादी में से कम से कम आधे लोगों को अब परिचय पत्र नंबर मिलेगा. इसके ज़रिए देश में व्याप्त प्रशासनिक अव्यवस्था दूर की जानी है. लेकिन नागरिक अधिकार संघर्षकर्ता सरकार के बढ़ते हस्तक्षेप के ख़िलाफ़ चेतावनी दे रहे हैं.

समाचार पत्र में कहा गया है कि यह नंबर भारत को बदल देगा. अगस्त के मध्य से नई दिल्ली की सरकार नागरिकों को परिचय पत्र नंबर बांटेगी, जिसे बदला नहीं जा सकेगा. अब तक भारत में अपनी पहचान साबित करना आसान नहीं था. इसकी वजह से वे बैंक खाता नहीं खोल पाते थे, मोबाइल फ़ोन नहीं ले पाते थे, सरकारी मदद भी नहीं पा सकते थे. राज्यमंत्री की ओर से इन तर्कों के आधार पर लोगों को कायल बनाया जा रहा है कि इसके कितने फ़ायदे हैं. परिचय पत्र नंबर से मिनटों में पहचान की पुष्टि हो सकेगी. लेकिन इन आंकड़ों को जमा करने के ख़िलाफ़ नागरिक अधिकार संघर्षकर्ता उठ खड़े हुए हैं. उन्हें डर है कि हमेशा चौकसी करने वाली सरकार बन रही है. अब भी पुलिस और सुरक्षा बलों को लगभग असीमित अधिकार मिले हुए हैं, ताकि वे नागरिकों के बारे में हर जानकारी हासिल कर सकें.

बर्लिन के वामपंथी दैनिक नोएस डॉएचलांड में पर्यावरण रक्षा के लिए सक्रिय वाराणसी के वीरभद्र मिश्र के बारे में रिपोर्ट दी गई है. कहा गया है कि वे 25 सालों से गंगा को स्वच्छ बनाने के लिए संघर्ष किए जा रहे हैं. उन्होंने स्वच्छता के लिए एक जैव परियोजना तैयार की है, जिस पर अब ध्यान दिया जाने लगा है.

समाचार पत्र के साथ साक्षात्कार में वीरभद्र मिश्र कहते हैं कि गंगा अब बीमार हो चुकी है. विश्वविद्यालय के विशेषज्ञों की मदद से उनका प्रतिष्ठान पता लगाने की कोशिश कर रहा है कि उसमें क्या-क्या भरा हुआ है. गंगाजल में सायनाइड, आर्सेनिक, सीसा, जस्ता, पारा और कॉलेरा व टाइफ़ायड के विषाणु पाए गए हैं. इसके अलावा मलमूत्र और लाशें तो हैं ही. हर रोज़ इसमें 1.2 अरब लीटर सीवर का पानी डाला जाता है. पर्यावरण और ऊर्जा बचाने वाली और उनके जैव परियोजना पर अब धीरे-धीरे ध्यान दिया जा रहा है. लोगों को समझना पड़ेगा कि अगर नदी की मौत होती है, तो यह इंसानों की भी मौत होगी. उन्हें उम्मीद है कि कभी न कभी गंगा मैया की जय का नारा सार्थक होगा.

और अंत में नेपाल. नोए त्स्युरिषर त्साइटुंग का कहना है कि वहां देश के व्यापक हिस्सों में महिलाओं और दलितों के साथ भारी भेदभाव किया जाता है. वहां Centre for Agro-Ecology and Development पिछले 19 सालों से ख़ास कर इन वर्गों पर ध्यान दे रहा है. संस्था के प्रयासों से सन 2006 के बाद से प्रसव के दौरान महिलाओं की मृत्यु दर प्रति लाख 539 से घटाकर 281 तक लाई जा सकी है.

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