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विज्ञान

कृत्रिम जीवन के दावे में कितना दम

क्रेग वेंटर की खोजें सनसनी फैलाने के जितना समर्थ रही हैं, उतना दुनिया का भला करने के नहीं. एककोषीय बैक्टीरिया के निर्माण द्वारा कृत्रिम जीवन की रचना कर लेने का उनका नया दावा भी बड़बोलापन अधिक लगता है, कोई बड़ा काम कम.

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क्रेग वेंटर : ऊंची दूकान, फीके पकवान

वेंटर ने दस साल पहले मानवीय जीनोम को विकोडित कर अपने नाम का सिक्का जमाया था. उस समय मनुष्य को रोगमुक्त और चिरजीवी बनाने की जो आशाएं तब उन्होंने जगायी थीं, उन से हम आज भी उतना ही दूर हैं, जितना पहले कभी थे.

गत 20 मई को वेंटर ने फिर एक धमाका कियाः "हम पहली बार किसी सिंथेटिक कोषिका के निर्माण की घोषणा करते हैं. हमने कंप्यूटर में डिजिटल कोड के अध्ययन द्वारा उसका निर्माण किया है. हमने क्रोमोसोम की डीएनए- लिपि को रसायनों द्वारा लिखा. क्रोमोसोम दस लाख अक्षरों जितना लंबा है. अक्षरों का अंतिम संयोजन हमने यीस्ट बैक्टीरिया में किया, ब्रेड और बीयर बनाने में जिस के नाम से लोग परिचित हैं. वह डीएनए जोड़ने की क्षमता भी रखता है. जैसे ही डीएनए कोषिका में पहुँचता है, वह नये प्रोटीन बनाना शुरू कर देता है और कोषिका को एक नयी बैक्टीरिया प्रजाति में बदल देता है. यह पूरी तरह कृत्रिम कोषिका है, उसकी अरबों बार नकलें तैयार की गयी हैं. कोषिका के भीतर का एकमात्र डीएनए हमारा बनाया कृत्रिम डीएनए है. धरती पर यह पहली ऐसी प्रजाति है, जिसका मां-बाप कंप्यूटर है."

पूरी तरह कृत्रिम नहीं

यह तो था वेंटर का अपना दावा. जर्मनी में ब्राउनश्वाइग के आणविक (मॉलिक्युलर) जीववैज्ञानिक प्रो. हेल्मुट ब्लौएकर क्रेग वेंटर को निजी तौर पर जानते-पहचानते हैं. वेंटर की उपलब्धि को वे दिलचस्प बताते हैं, पर इससे अधिक महत्व नहीं देतेः "इसे सिंथेटिक सेल (कृत्रिम कोषिका) कहना कतई सही नहीं है. यहां एक पहले से ज्ञात जीनोम का रासायनिक संश्लेषण हुआ है और उसे मूल कोषिका से मिलती जुलती एक दूसरी कोषिका के भीतर डाला गया है. मेरे लिए सिंथेटिक सेल का अर्थ है कि न केवल कोषिका के जीनोम को रासायनिक विधि से रचा गया है, बल्कि वह पूरी तरह से कृत्रिम है."

जैसा कि क्रेग वेंटर ने स्वयं बताया, उन की टीम ने वास्तव में रासायनिक विधि से निर्मित एक जीनोम को यीस्ट के जाने-पहचाने एककोषीय प्राकृतिक बैक्टीरिया में प्रतिरोपित किया.

वेंटर का बड़ा नाम है. जीन तकनीक के अनेक पेटेंट उनके नाम हैं. जीन तकनीक से ही वे करोड़ों डॉलर की कमाई करते हैं. इसलिए स्वाभाविक है कि अपने मुंह मिंया मिठ्ठू बनना भी उनकी व्यापारिक रणनीति का हिस्सा है. कहते हैं: "यह एक ऐसा सशक्त औज़ार है, जो जीवविज्ञान में हमें ठीक वह क्षमता प्रदान करता है जिसकी हमें ज़रूरत है.... हम एक ऐसे युग में प्रवेश कर रहे हैं, जहां हमारी कल्पनाशक्ति ही हमारी सीमा होगी."

न तो नयी, न क्रांतिकारी

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वेंटर का बनाया बैक्टीरिया

वेंटर अपनी उपलब्धि के चिकित्सा विज्ञान और पर्यावरण रक्षा के लिए केवल ऐसे उपयोगों के नाम गिनाते हैं, जो सबको मनभावन लगते हैं. एक शब्द नहीं कहते कि कृत्रिम जीनोमों वाले जीवाणुओं का नये प्रकार के चेचक या फ्लू के रोगाणुओं का निर्माण करने में भी उपयोग हो सकता है. वे युद्धप्रेमी सरकारों और आतंकवादियों का काम और आसान बना सकते हैं. यही नहीं, जैसाकि प्रो. ब्लौएकर बताते हैं, क्रेग वेंटर की उपलब्धि न तो बिल्कुल नयी है और न क्रांतिकारीः"उन का काम न तो कार्यविधि की दृष्टि से और न ही तकनीकी दृष्टि से कोई सनसनी है. वे जिस भविष्य की भविष्यवाणी करते हैं, वह भी क्रांतिकारी नहीं है. हां, दिलचस्प ज़रूर है. कृत्रिम जीन तो सन साठ वाले दशक से ही उपलब्ध हैं. उदाहरण के लिए, जिस टीम में मैं काम कर रहा था, उसने प्रोटीन को कोडबद्ध करने वाला पहला जीन बनाया था. बाद में इस तकनीक का और भी विकास हुआ. इसलिए वह कोई सनसनी नहीं है."

भगवान की बराबरी का दंभ

वेंटर ने एक बैक्टीरिया क्या बना लिया अपने आप को भगवान के बराबर समझने लगे हैं. नीतिशास्त्र और नैतिकता की बात करते हैं: "मैं कहूँगा कि विज्ञान में यह पहली बार है कि इस तरह की किसी परियोजना पर अमल से पहले उस की जैव-नैतिकता की जम कर समीक्षा हुई है."

भेड़ों के बीच भेड़िया

वेंटर के बारे में प्रसिद्ध है कि उनके हर शब्द से बड़बोलापन टपकता है. जर्मनी के आणविक जीववैज्ञानिक प्रो. ब्लौएकर इससे भी आगे जा कर कहते हैं: "कुछ लोग तो उन्हें विज्ञान की भेड़ों के बीच भेड़िया भी कहते हैं. नैतिकता वाली बहस की ज़बानी मांग सभी करते हैं. मैंने वेंटर के शोधपत्रों में कभी नहीं पढ़ा कि उनकी किसी खोज से क्या ख़तरे पैदा हो सकते हैं.... हमें इस तथ्य के साथ जीना पड़ेगा कि वैज्ञानिक भी कई बार बकवास करते हैं."

जर्मनी में भी रासायनिक विधि से कृत्रिम जीवन का निर्माण हुआ है, बोख़ुम की एक प्रयोगशला में. किसी बैक्टीरिया का नहीं, ऐसी कोषिकाओं का, जो कंप्यूटर चिप में जान डाल सकें.

रिपोर्ट- राम यादव

संपादन- महेश झा

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