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विज्ञान

कूड़ा जलाने की आदत को बदलना जरूरी

दुनिया भर में हर साल करीब दो अरब टन कचरा पैदा होता है. कई तरह के कानूनों के बाद भी इसका 40 फीसदी से ज्यादा जला दिया जाता है. भारत और चीन में यह आदत सबसे ज्यादा है.

जलते कूड़े का धुआं ना केवल हवा में जहर घोल रहा है, बल्कि बीमारियां भी बढ़ा रहा है. पहली बार इस सिलसिले में विस्तार से शोध हुआ है. ताजा शोध में कूड़ा जलाए जाने के कारण कार्बन डायॉक्साइड और कार्बन मोनो ऑक्साइड जैसी जहरीली गैसों के बारे में विस्तार से जानकारी दी गयी है. साथ ही पारे और हवा में मौजूद सूक्ष्म कणों के बारे में भी बताया गया है जो कई तरह की बीमारियों के लिए जिम्मेदार हैं. शोध करने वाली कॉलोरैडो की क्रिस्टीन वीडनमायर ने कहा, "इस रिसर्च को करते समय मुझे अहसास हुआ कि हमें वेस्ट मैनेजमेंट और कूड़े को जलाने के बारे में कितनी कम जानकारी है. सबसे अहम है अलग अलग तरह के टॉक्सिन के बारे में जानकारी. इस पर हमें और काम करने की जरूरत है."

वीडनमायर के अनुसार पहली बार ऐसी रिपोर्ट तैयार की गई है जिसमें सभी देशों की हवा की गुणवत्ता के बारे में बताया गया है. उनका कहना है कि इस रिपोर्ट से सरकारों को अपने पैमाने बदलने में मदद मिलेगी, "स्वास्थ्य को लेकर अधिकतर पैमाने हवा में मौजूद सूक्ष्म कणों के अनुसार बनाए गए हैं. इसमें केवल उनके आकार पर ध्यान दिया जाता है, इस बात पर नहीं कि वे किस चीज के बने हैं. अलग अलग तरह के सूक्ष्म कणों का हमारी सेहत और पर्यावरण दोनों पर ही अलग अलग तरह का असर होता है."

सूक्ष्म कण या पार्टिकुलेट मैटर वे जहरीले कण हैं जिनका आकार इतना छोटा होता है कि वे सांस के जरिए हमारे शरीर में प्रवेश कर सकते हैं और खास तौर से फेफड़ों को नुकसान पहुंचा सकते हैं. भारत और चीन में प्लास्टिक की बोतलों, इलेक्ट्रॉनिक के सामान समेत हर तरह का कचरा जला दिया जाता है. वैज्ञानिकों का कहना है कि यह वायु प्रदूषण का मुख्य कारण है.

आईबी/एजेए (एपी)

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