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विज्ञान

कूबड़ निकालता बच्चों का भारी बस्ता

तमाम चिंताओं और चेतावनियों के बावजूद स्कूली बच्चों को भारी भरकम बस्ते से आजादी नहीं मिल पायी है. इस बोझ के चलते बच्चों को कई शारीरिक समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है.

बस्ते का बोझ स्कूली छात्रों के स्वास्थ्य पर खराब असर डालने के कारण हमेशा चर्चा में रहता है. नियमित क्षमता से अधिक बोझिल बस्ता ढोने वाले बच्चों में तमाम तरह की शारीरिक बीमारियां बढ़ रही हैं. इसके प्रमाण लगातार सामने आ रहे हैं. इसके बावजूद बच्चों की पीठ पर बस्ते का बोझ कम होने का नाम नहीं ले रहा है. कारोबारी संस्था एसोचैम के सर्वे के अनुसार बस्ते का भारी बोझ ढोने वाले 68 फीसदी बच्चों को पीठ दर्द की शिकायत हो सकती है.

ये बोझ कूबड़ निकाल सकता है

एसोचैम की स्वास्थ्य देखभाल समिति के तहत कराये गए सर्वेक्षण में पाया गया कि सात से तेरह वर्ष की आयु वर्ग के 88 प्रतिशत छात्र ऐसे हैं, जो अपनी पीठ पर अपने वजन का लगभग आधा भार ढोते हैं. इस भार में आर्ट किट, स्केट्स, तैराकी से संबंधित सामान, ताइक्वांडो के उपकरण, क्रिकेट एवं अन्य खेलों की किट शामिल होते हैं. इस भारी बोझ से उनकी रीढ़ की हड्डी को गंभीर नुकसान पहुँच सकता है. इसके अलावा पीठ संबंधी कई अन्य गंभीर समस्याओं का सामना भी इन बच्चों को करना पड़ सकता है.

मुंबई सहित देश भर के 10 शहरों में 7 से 13 साल की उम्र के स्कूली बच्चों पर हुए एसोचैम के सर्वे से पता चला है कि भारी भरकम बस्ता ढोने वाले 68 फीसदी बच्चों को पीठ दर्द की शिकायत है और बस्ते का बोझ इसी तरह बना रहा तो आगे चलकर उनका कूबड़ यानी पीठ का ऊपरी हिस्सा बाहर की ओर उभर सकता है.

उत्तर प्रदेश के स्वास्थ्य महानिदेशक डॉक्टर सत्यमित्र ने डॉयचे वेले से कहा कि बस्ते के बोझ से बच्चों का ही नहीं बल्कि देश का भविष्य भी प्रभावित हो सकता है इसलिए इस पर ध्यान देना जरूरी है. उनके अनुसार, पीठ पर भारी बोझ बच्चों में स्लिप डिस्क, स्पॉन्डलाइटिस, स्कॉलियोसिस और तनाव जैसी गंभीर समस्याएं पैदा कर सकता है.

बच्चे भी चाहते हैं भारी बोझ से आजादी

महाराष्ट्र के छोटे से कस्बे चंद्रपुर के एक स्कूल में सातवीं कक्षा के दो बच्चों ने बस्ते के भारी बोझ से मुक्ति नहीं मिलने पर भूख हड़ताल की चेतावनी दी है. इन बच्चों ने कहा है कि कॉपी-किताबों से भरे सात-आठ किलोग्राम के भारी बस्ते को स्कूल की तीसरी मंजिल तक लाने-ले जाने में उन्हें काफी तकलीफ होती है. यह खबर अखबारों की सुर्खियाँ बटोरने में तो कामयाब रहा लेकिन शिक्षा के नीति निर्माताओं ने अब तक ऐसा कोई कदम नहीं उठाया है जिससे बच्चों को राहत महसूस हो.

बस्ते के विकल्प की तलाश

2012 में दिल्ली उच्च न्यायालय ने भी सुझाव दिया था कि बस्ते का वजन बच्चे के वजन के दस प्रतिशत से अधिक नहीं होना चाहिए. इस साल के शुरू में मुंबई हाई कोर्ट ने इस संबंध में एक समिति की सिफारिश पर बस्ते का वजन कम करने का निर्देश दिया था और स्कूलों की इस मामले में जवाबदेही तय की गई थी. कोर्ट के आदेश के बाद महाराष्ट्र सरकार ने राज्य के सभी स्कूलों में बस्ते के बोझ पर नियंत्रण लगाने की बात कही थी लेकिन इसके बावजूद बस्ते के विकल्प की तलाश अब तक नहीं हो पायी है.

छत्तीसगढ़ के सरकारी स्कूल में प्राचार्य डॉ. अरविन्द तिवारी का कहना है कि बच्चों को बस्ते के बोझ से मुक्त कराया जा सकता है. ‘लाइब्रेरी युक्त क्लास रूम' सबसे सटीक उपाय है. बच्चों को घर से बस्ता लाने की जरूरत ही नहीं, सब कुछ लाइब्रेरी में मौजूद रहेगा. प्रोजेक्टर एवं अन्य इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स भी बच्चों को बस्तों से आजादी दिलवा सकते हैं. इस विधि को अपनाने से बच्चों में पढ़ाई के प्रति रुचि भी बढ़ेगी. सेंट्रल एडवाइजरी बोर्ड ऑफ एजुकेशन के अनुसार भी दूसरी कक्षा के बच्चों के बस्ते तो स्कूल में ही रहने चाहिए. वहीं सीबीएसई और केंद्रीय विद्यालय संगठन बस्ते का बोझ कम करने संबंध में अपने सुझाव स्कूलों को दे चुके हैं.

बच्चों को बस्ते के बोझ से उस दिन आजादी मिल जाएगी जिस दिन नीति निर्माताओं, स्कूल प्रबंधन और उनके अभिभावकों को यह समझ आ जाये कि बस्ते का बोझ केवल शारीरिक समस्याएं ही पैदा नहीं करता, बल्कि यह बच्चे के मानसिक विकास को भी अवरुद्ध करता है.

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