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दुनिया

कूटनीति ने रोका बातचीत का रास्ता

दक्षिण कोरिया ने इश्तिहारों को हटवा दिया, लाल कालीन लपेट दी और बातचीत की मेज उठा कर कोने में रख दिया. उसका अतिथि फोन का जवाब नहीं दे रहा. कोरियाई देशों की बातचीत शुरू होने से पहले ही खत्म हो गई.

दक्षिण और उत्तर कोरिया की बुधवार को होने वाली बातचीत का बहुत इंतजार था. आखिरी क्षणों में एक कूटनीतिक विवाद के कारण रद्द हुई बातचीत बता रही है कि दोनों के बीच अविश्वास कितना ज्यादा है. हालांकि मुमकिन है कि बातचीत रोक कर मोलभाव पर उतर आने के पीछे कुछ और भी वजहें हों. दक्षिण कोरिया के नए राष्ट्रपति पार्क ग्वेन हाई पर चुनाव के दौरान उत्तर कोरिया से संबंध सुधारने के वादे को पूरा करने का भारी दबाव है. उच्च स्तर की एक बैठक उत्तर कोरिया के उकसावों पर कड़ा रुख अपनाने के साथ ही उत्तर कोरिया के लिए सहायता और बातचीत जल्द से जल्द शुरू करने की राष्ट्रपति की कोशिशों पर मुहर लगा सकती थी.

बुधवार को उत्तर कोरिया ने दक्षिण कोरिया के फोन कॉल का जवाब नहीं दिया. संचार की यह व्यवस्था बैठक से पहले प्राथमिक बातचीत के लिए हाल ही में बनाई गई है. उत्तर कोरिया ने बातचीत रद्द करने के बारे में अपनी तरफ से कोई बयान नहीं दिया है.

उत्तर कोरिया दो आर्थिक परियोजनाओं को फिर शुरू करने में दिलचस्पी ले रहा है और बैठक में इसी पर बातचीत होनी थी. यह संबंधों में सुधार के शुरुआत की निशानी होती, साथ ही विदेशी निवेश और नगद का स्रोत भी. उत्तर कोरिया अपने इकलौते प्रमुख सहयोगी चीन की हालिया नीतियों से थोड़ा परेशान है. पिछले दिनों तनाव बढ़ने के बाद चीन ने उसके साथ सीमा पार कारोबार और वित्तीय लेनदेन पर शिकंजा कस दिया है.

उत्तर कोरिया के पहाड़ी रिसॉर्ट में दक्षिण कोरियाई यात्राओं को दोबारा शुरू करने और सीमावर्ती शहर काएसोंग के फैक्टरी पार्क में दोबारा काम शुरू करने पर बातचीत की जानी थी. यह फैक्ट्री पार्क उत्तर कोरियाई मजदूरों और दक्षिण कोरियाई मैनेजरों से चलता है. तनाव बढ़ने पर बंद किए जाने से पहले यहां से 2 अरब डॉलर का सालाना कारोबार होता था. दक्षिण कोरिया के जिन कारोबारियों को अपना कामकाज बंद करना पड़ा है, वो बातचीत रद्द होने से काफी दुखी हैं. महिलाओं के कपड़ों की एक कंपनी चलाने वाले कांग चांग बेओम कहते हैं, "काएसोंग परिसर मर रहा है, हमारी मशीनों में जंग लग रहा है और यह लोग कूटनीति पर बहस में जुटे हैं."

जानकारों का कहना है कि दोनों के बीच गहरे अविश्वास के बीच अगर यह बातचीत होती भी तो कितनी आगे जाती यह कहना बेहद मुश्किल है. उत्तर कोरिया की बातचीत में दिलचस्पी अकसर उसके बाद उकसावे की हरकतों में और फिर बातचीत की इच्छा के चक्र में चलती रहती है. जानकार इन हरकतों का मकसद उत्तर कोरिया की अपने लिए ज्यादा रियायत की इच्छा बताते हैं.

बुधवार की बातचीत नहीं हुई तो कार्यकर्ताओं ने सोल में रैलियां भी निकाली. उनका कहना है कि वार्ताकारों के ओहदे को लेकर बातचीत रद्द होने का मतलब है दक्षिण कोरिया इस समस्याओं के हल की दिशा में आगे नहीं बढ़ा है. शहर में एक रैली और भी निकली जिसमें उत्तर कोरिया के खिलाफ नारे लगाए गए और वहां के शासक किम जोंग उन का पुतला जलाया गया.

उम्मीद थी कि सीमित ही सही लेकिन आर्थिक मुद्दों पर बातचीत रिश्तों में नई शुरुआत लाएगी लेकिन ऐसा हो न सका. दोनों देशों के बीच इस बात लेकर विवाद हो गया कि इसमें कौन शामिल होगा. दक्षिण कोरिया के एकीकरण मंत्रालय के प्रवक्ता किम ह्युंग सुक के मुताबिक उत्तर कोरिया ने बैठक के लिए अपने अधिकारियों को सियोल भेजने से मना कर दिया. इसके पीछे उसने दक्षिण कोरिया से रियू को न भेजने को वजह बताया. उधर दक्षिण कोरिया का कहना है कि समकक्ष अधिकारी न भेजने के उत्तर कोरियाई फैसले के कारण उसने उप मंत्री को भेजना तय किया था. दक्षिण कोरिया के बुसान नेशनल यूनिवर्सिटी में पढ़ाने वाले प्रोफेसर रॉबर्ट केली का कहना है, "कोरियाई लोग वरिष्ठता क्रम का बहुत ध्यान रकते हैं. मोटे तौर पर बात यह है कि उत्तर कोरिया दक्षिण कोरिया को जरूरत से ज्यादा स्वीकृति देने की आशंकाओं से घिरा है."

एनआर/एमजे(एपी)

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