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मंथन

कुदरत की छाती पर खेल आयोजन

फुटबॉल वर्ल्ड कप में अब बस कुछ ही दिनों की देरी है और उसके बाद ये खेल पूरी दुनिया को अपनी आगोश में ले लेगा. लेकिन खेलों की इस चकाचौंध के पीछे पर्यावरण पर भारी पडे़गी. वैज्ञानिक चाहते हैं कि खेल आयोजन भी इको फ्रेंडली बने.

फुटबॉल वर्ल्ड कप हो या लीग के मुकाबले, खेल अपने साथ रोमांच और उत्साह लाता है. स्टेडियम भर जाते हैं और बाहर भी फैन नजर आते हैं. सर्दियों में फुटबॉल सीजन थमने के बाद वैज्ञानिक पर्यावरण पर इसके असर का पता लगाते हैं. वे जानना चाहते हैं कि फुटबॉल वर्ल्ड कप या ओलंपिक जैसे बड़े खेल आयोजन CO2 उत्सर्जन में कैसी भूमिका निभाते हैं. नतीजे चौंकाने वाले हैं.

सस्टेनेबिलटी डायलॉग एंड कैटालिसिस इंस्टीट्यूट के स्वेन्ड उल्मर को लगता है कि जैसा हाल 2010 वर्ल्ड कप में दक्षिण अफ्रीका का हुआ, वैसा ही इस साल ब्राजील का होगा. उन्होंने जर्मनी में हुए 2006 के फुटबॉल वर्ल्ड कप में पहली बार ये पता लगाया कि बड़े खेल आयोजन अपने पीछे कितनी कार्बन डाय ऑक्साइड छोड़ते हैं. उल्मर कहते हैं, "हां, हैरानी भरा ही सही, लेकिन ये एक सा है. डरबन में CO2 उत्सर्जन 26 लाख टन के बराबर रहा, इससे वही होगा जो ग्रीन हाउस गैसों से होता है. ब्राजील में अनुमान है कि यह 27 से 29 लाख टन होगा."

कैसे होता है नुकसान
ब्राजील बीते कुछ साल से दिन रात वर्ल्ड कप की तैयारियों में जुटा है. इस दौरान भारी मात्रा में ग्रीनहाउस गैसें निकल रही हैं. स्टेडियम निर्माण तो पर्यावरण को होने वाले नुकसान की छोटी सी कड़ी भर है. सबसे ज्यादा ग्रीन हाउस गैसें तो दर्शकों के स्टेडियम तक पहुंचने में निकलती है. अनुमान है इन गर्मियों में दुनिया भर से करीब 6 लाख फैन ब्राजील पहुंचेगे. 40 लाख लोग दूसरे शहरों में मैच देखने के लिए उड़ान भरेंगे.

मानाउस से रियो डे जनेरो जाने में ही विमान को चार घंटे लगते हैं, इसकी कीमत पर्यावरण चुकाएगा. उल्मर कहते हैं, "अगर आप इसे बांटकर इस ढंग से देखें कि जितने लोग वहां फ्लाइट के जरिए मैच देखने जाएंगे निश्चित तौर पर बड़ी संख्या में जहरीली गैस निकलेगी, क्योंकि विमान तो कैरोसिन से ही उड़ेगा. इसके बाद स्टेडियम और दूसरी चीजों की बारी आती है. मैं यह भी कहूंगा कि यहां टिकाऊपन का भी कंसेप्ट है."

इको फ्रेंडली खेल

फुटबॉल संघ का कंसेप्ट है कि वर्ल्ड कप के हर स्टेडियम में अक्षय ऊर्जा के लिए सोलर पैनल लगाए जाएं. साझेदार स्टेडियम में फील्ड मैनमेंट पर भी ध्यान दे रहे हैं, काम बहुत सारा है. वर्ल्ड कप में निकली वाली कार्बन डाय ऑक्साइड अंतरिक्ष में 6,000 रॉकेट छोड़े जाने के बराबर है. वैसे तो एक ऐसे विशाल देश, जिसका ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन 29 लाख टन हो, ये मात्रा बहुत कम है, लेकिन नुकसान तो है ही.

वैज्ञानिक लगातार इस बात की चेतावनी दे रहे हैं कि ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को फौरन कम करना शुरू करना होगा. ऐसे में खेल आयोजनों पर भी ध्यान देना होगा, "जाहिर है कि वो भी हमारी जिंदगी का हिस्सा हैं. जब हम ये देख रहे हैं कि जलवायु परिवर्तन के लिए ग्रीनहाउस गैसें जिम्मेदार हैं तो इसके हर कारण को देखना होगा, खेलों को भी ताकि हम सीओटू उत्सर्जन को घटा सकें."

शुरुआत ब्राजील से हो चुकी है, इससे हर किसी को सीख लेनी होगी. वैज्ञानिक चाहते हैं कि भविष्य में खेल आयोजक इको फ्रेंडली रास्ते अपनाएं ताकि रोमांच अपने पीछे कम से कम कार्बन पदचिह्न छोड़े.

रिपोर्ट: रिजकी नुग्राहा/ओएसजे

संपादन: आभा मोंढे