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ताना बाना

कुत्तों को कुत्तों की तरह ही जीने दें

अध्योयनों के मुताबिक अमेरिका में 31 प्रतिशात लोग मोटापे का शिकार हैं. अब विशेषज्ञ इस बात पर भी ज़ोर दे रहे हैं कि आदमी ही नहीं, जानवर भी अमेरिका में मोटापे का शिकार हैं.

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कुत्तों को बहुत ज़्यादा प्यार करना भी ग़लत

2006 में ही सैंटर फॉर डिज़ीज़ कॉंट्रोल के एक अध्ययन से यह पता चला कि अमेरिका में 23 से 41 प्रतिशत पालतू कुत्ते मोटापे से जूझ रहे हैं. विशेषज्ञ मानते हैं कि इसका एक बडा कारण यह है कि कुत्तों के मालिक मानते हैं कि कुत्तों को ज़्यादा खाना खिलाना उन्हें भरपूर प्यार देने का प्रतीक है. साथ ही उन्हे यह भी नहीं पता है कि मोटापे की वजह से कुत्तों को भी आदमियों जैसी बिमारियां हो सकती हैं. उदाहरण के लिए, हृदय रोग, कौंसर, डायबिटीज़ और शरीर भारी हो जाने की वजह से जल्द ही थकान आ जाना. अंत में इसका अंजाम यही होता है कि कुत्ते जल्द ही मर जाते हैं. यह भी माना जाता है कि कुत्ते आजकल कई बार घंटों तक घरों में अकेले बंद रहते हैं. ऐसा पहले नहीं था. जीवनशैली में परिवर्तन और पूरा दिन काम करने की वजह से उनके मालिक उन्हें अब ज़्यादा घुमाने फिराने नहीं ले जाते.

इसलिए अब अमेरिका में कुत्तों के लिए भी फिटनेस सैंटर बहुत ही लोकप्रीय हो रहे हैं. बडे पार्कों में कुत्तों को 5 किलोमीटर तक दौड़ाया जाता है. दौड़ते समय उन्हें बाधाओं को पार करना होता है. इससे मालिक और कुत्ते, दोनो को फायदा होता है. साथ ही उन्हे खास डायट पर रखा जाता है.

खाने में शुगर और फैट की मिलावट

वैसे, कुत्तों, बिल्लियों और दूसरे पालतू जानवरों में मोटापा अमेरिका में ही नहीं, ब्रिटेन और यूरोप के अन्य देशों में भी, उदाहरण के लिए, फ्रांस और जर्मनी में भी देखने को मिल रहा है. ऐर्नी वॉर्ड पशु चिकित्सक हैं. उनका मानना है कि पिछले वर्षों में पशु आहार बानाने वाली कंपनियां भी खाने में ज़्यादा शुगर और फैट मिलाने लगी हैं, हालांकि विज्ञापनों में यही दिखाने की कोशिश की जा रही है कि खाने में ज़्यादा विटामिन और प्रोटीन मिलाए गए हैं और वह इसलिए भी काफी महंगा होता जा रहा है. दुनियाभर में ज़्यादातर अमेरिकी कंपनीयां ही पशु आहार बनाती हैं. इसलिए वॉर्ड जैसे पशु चिकित्सकों का मानना है कि अमेरिका में जल्द ही इस मुद्दे को लेकर सोच बदलने की ज़रूरत है. नहीं तो इसका अंजाम यह होगा कि पालतू कुत्तों की ज़िंदगी बहुत जल्द ही बहुत ही दहनीय हो जाएगी. वॉर्ड और दूसरे विशेषज्ञों का कहना है कि कुत्तों को कुत्तों की तरह ही जीने देने में सब का भला है.

रिपोर्ट: प्रिया एसेलबॉर्न

संपादन: राम यादव

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