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मनोरंजन

कुचीपुड़ी को नया आयाम दे रही हैं पद्मजा

जी पद्मजा रेड्डी कुचीपुड़ी नृत्य की जानी-मानी कलाकार हैं. वह कुचीपुड़ी को आधुनिक रूप देने की कोशिश कर रही हैं और युवा लोगों को आकर्षित करने के लिए दो स्कूल भी चला रही हैं.

हैदराबाद में रहने वाली जी पद्मजा रेड्डी वह देश-विदेश के महत्वपूर्ण नृत्य समारोहों में भाग ले चुकी हैं और इस वर्ष फरवरी में हुए खजुराहो नृत्य महोत्सव में भी हिस्सा लिया. उन्हें 2005 में श्री कृष्ण देवराय विश्वविद्यालय की ओर से डॉक्टरेट की मानद उपाधि प्रदान की गई थी. इसके अगले ही साल उन्हें आंध्र प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री वाईएसआर रेड्डी ने कलारत्न के सम्मान से अलंकृत किया. उन्हें अनेक दूसरे पुरस्कार भी प्राप्त हुए हैं. प्रस्तुत है डीडब्ल्यू के साथ हुई उनकी बातचीत के कुछ अंश:

कुचीपुड़ी क्या प्रारम्भ से ही शास्त्रीय नृत्य शैली मानी जाती है? कुछ लोगों का कहना है कि यह मूलतः लोकनृत्य की ही एक शैली है जिसे काफी बाद में शास्त्रीय रूप दिया गया.

नहीं, ऐसा नहीं है. यह तो शुरू से ही शास्त्रीय नृत्य शैली रही है जिसे दो हजार साल पहले सिद्धेन्द्र योगी ने कुचीपुड़ी गांव में शुरू किया था. यह अलग बात है कि यह बहुत अधिक प्रसिद्ध और लोकप्रिय शैली नहीं रही है. कुचीपुड़ी कृष्णा जिले का एक छोटा-सा गांव है.

कुचीपुड़ी क्या अन्य नृत्यशैलियों से पूर्णतः भिन्न है या किसी अन्य शैली और इसके बीच कुछ समानताएं भी हैं?

यह भरतनाट्यम से काफी कुछ मिलती है. लेकिन इसमें ग्रेस ज्यादा है. भरतनाट्यम में पदसंचालन काफी स्ट्रॉन्ग होता है, लेकिन कुचीपुड़ी में यह बहुत सौंदर्यपूर्ण और रस में लिपटा हुआ है. भरतनाट्यम अधिक लोकप्रिय और प्रसिद्ध है इसलिए उसके बारे में तो सब जानते हैं, लेकिन कुचीपुड़ी के बारे में इतनी अधिक जानकारी नहीं है. अब बढ़ रही है और इसमें राजा-राधा रेड्डी जैसे बड़े कलाकारों की भी महत्वपूर्ण भूमिका है.

आपकी करियर की शुरुआत कैसे और कब हुई? क्या आपका परिवार संगीत और नृत्य की दुनिया से संबंधित है?

नहीं, मेरे पिता तो डॉक्टर हैं और पति होटल व्यवसाय में हैं. हमारे हैदराबाद और अन्य स्थानों पर कई होटल हैं. दरअसल मैं बचपन में अपने दादा-दादी के पास अपने पुश्तैनी गांव पामरु में रहती थी. यह भी कृष्णा जिले में ही है और कुचीपुड़ी से लगा हुआ है. मेरे दादा शौकिया तेलुगू गीत गाया करते थे. जब मैं दो-ढाई साल की थी, तभी से मुझे नृत्य की शिक्षा देने कुचीपुड़ी से गुरु आया करते थे. पांचवी कक्षा तक यह क्रम चला. फिर मैं हैदराबाद आ गई और यहां मैंने प्रसिद्ध गुरु वेंपति चिन्न सत्यम और शोभा नायडू से शिक्षा ग्रहण की. बाद में शोभा नायडू के साथ प्रोग्राम भी किए.

अब तो आप भी सिखाती हैं.

जी हां, मैंने हैदराबाद में प्रणव नृत्य संस्थान खोला है और उसमें इस समय 400 विद्यार्थी हैं. दिलचस्प बात यह है कि यह संस्थान हैदराबाद से पहले मैंने अमेरिका में फ्लोरिडा में शुरू किया था. दरअसल मेरा बेटा प्रणव टेनिस खिलाड़ी है और फ्लोरिडा में इसकी सबसे अच्छी कोचिंग होती है. उसे लेकर मैं वहां गई और तीन साल तक रही. हमने एक मकान किराये पर लिया था. मैंने उसी में यह संस्थान खोल लिया और इसका नाम बेटे के नाम पर ही रख दिया. यह संस्थान अभी भी चल रहा है. वहां के स्कूल-कालेज जब छुट्टियों में तीन महीने के लिए बंद हो जाते हैं, तब मैं वहां चली जाती हूं और सिखाती हूं. वहां कुचीपुड़ी में लोगों की दिलचस्पी यहां से भी अधिक है. अलग-अलग बैचों में सुबह से शाम तक 600 तक छात्र सीखने आते हैं. फ्लोरिडा से वापस आने के बाद मैंने यही संस्थान हैदराबाद में भी खोल लिया और यह खूब अच्छी तरह चल रहा है.

एक कलाकार के रूप में आपकी क्या पाने की चाह है? कुचीपुड़ी में आप क्या हासिल करना चाहती हैं?

जाहिर है कि एक रचनाशील कलाकार के रूप में मैं इस नृत्यशैली के पारंपरिक रूप और छवि को बनाए रखते हुए इसमें नए प्रयोग करना चाहती हूं ताकि यह आज के समय की जरूरतों को भी अभिव्यक्त कर सके और समकालीन नृत्य बन सके. प्राचीन समय से ही रामायण और महाभारत की कथाएं, राधा-कृष्ण की लीला, और अन्य पौराणिक गाथाएं कुचीपुड़ी में प्रस्तुत की जाती रही हैं. हम सिर्फ उन्हीं को दुहराते रहें तो दर्शकों की दिलचस्पी कैसे बनी रहेगी. इसलिए मैंने नए विषय भी लिए हैं मसलन एड्स की समस्या, बालिकाओं की समस्या, प्रकृति संरक्षण आदि. इन पर मैंने नृत्यनाटिकाएं यानि बैले तैयार किए.

इन्हें दर्शकों ने किस रूप में लिया? कैसी प्रतिक्रिया मिली आपको?

दर्शकों ने बहुत सराहा. बालिकाओं पर मैंने जो बैले तैयार किया था, उसी को देखकर उस समय के मुख्यमंत्री वाईएसआर रेड्डी ने मुझे कलारत्न पुरस्कार दिया था. यही नहीं, आप सुनकर हैरान होंगे कि उन्होंने अपनी पार्टी के सभी विधायकों को निर्देश दिया कि वे यह बैले सीखें. तो मैंने विधायकों को कुचीपुड़ी का यह बैले सिखाया!

इंटरव्यू: कुलदीप कुमार

संपादन: महेश झा