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दुनिया

कुंदूस पीड़ितों को मुआवजा नहीं मानवीय राहत

जर्मन रक्षा मंत्रालय ने तय किया है कि अफगानिस्तान के कुंदूस में तेल टैंकर पर हुए हमले में मारे गए और गंभीर रूप से घायल लोगों को 5,000 हजार डॉलर की राशि दी जाएगी. लंबी बातचीत और विचार के बाद यह राशि तय की गई है.

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हमले में मारे गए और घायल अफगानी नागरिकों के परिजनों को यह राशि मुआवजे के तौर पर नहीं बल्कि मानवीय राहत के तौर पर दी जाएगी. तय राशि के मुताबिक पांच हजार डॉलर यानी करीब 4 हजार यूरो प्रति परिवार दिए जाएंगे. जिसे अगर रुपये में गिना जाए तो करीब दो लाख तीस हजार प्रति परिवार की रकम आती है.

4 सितंबर 2009 को जर्मन कंमाडर के आदेश पर अफगानिस्तान के कुंदूस में एक तेल टैंकर पर हमला किया गया था. इसे तालिबानी लड़ाकों से छुड़वाने के लिए हमला किया गया था. जांच के बाद सामने आया कि इस हमले में 91 लोग मारे गए और 11 गंभीर रूप से जख्मी हुए. जर्मनी के रक्षा मंत्रालय ने विश्वास जताया है कि अगस्त तक इस बारे में फैसला निश्चित तौर पर आ जाएगा.

NO FLASH Angriff auf die Tanklaster in Kunduz

जर्मनी के रक्षा मंत्रालय के प्रवक्ता ने बताया, अब तक वकीलों के साथ बातचीत बहुत अच्छे से हुई. उन्होंने 5,000 डॉलर की राशि का स्वागत किया है. हालांकि बातचीत अभी पूरी नहीं हुई है. पीड़ितों के वकील करीम पोपल ने जर्मन सरकार से 28 हजार यूरो के हर्जाने की मांग की थी.

जर्मन पत्रिका श्टर्न की वेबसाइट के मुताबिक जर्मन रक्षा मंत्रालय ने पुष्टि की है कि पीड़ितों को प्रति परिवार पांच हजार डॉलर की राशि दी जाएगी. पीड़ितों के परिवार के लिए एक खाता खोला गया है और इस खाते में राशि जमा की जाएगी. बहुत से लोगों के खाते खोल दिए गए हैं लेकिन अब भी कुछ लोग बचे हैं जिनके परिजनों का अता पता नहीं है.

कानूनी अड़चन से बचने के लिए ये राशि मुआवजे के तौर पर नहीं बल्कि मानवीय राहत के तौर पर दी जा रही है. इसका क्या कारण है ये तो पता नहीं लेकिन एक बात साफ दिखाई देती है कि अगर जर्मन सरकार मुआवजा देती तो लगता कि उसने इस हमले के लिए अपने सैनिकों को जिम्मेदार माना है.

श्टर्न.डीई वेबसाइट पर लिखा गया है कि दोनों पक्षों ने काफी विकल्पों पर बातचीत की. जैसे कि क्या धन की जगह राहत के तौर पर वस्तुएं जैसे जानवर या घर दिए जाएं.. लेकिन फिर राशि देना ही तय किया गया. प्रति परिवार एक खाता इसलिए खोला गया है ताकि धन गलत हाथों में न चला जाए.

एक स्वतंत्र मध्यस्थ ने पीड़ितों और गांव के मुख्य लोगों से बातचीत करने के बाद जर्मनी ने ये फैसला लिया है. श्टर्न पत्रिका ने लिखा है कि इससे अफगानिस्तान का मानवाधिकार आयोग सहमत है.

रिपोर्टः एजेंसियां/आभा एम

संपादनः एस गौड़

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