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दुनिया

कुंठा के कुचक्र में भारतीय युवतियां

सविता शर्मा जब 12 साल की हुई, तो उसकी मां ने बताया कि जल्द ही उसके शरीर की गंदगी खून बन कर निकलेगी. दूसरी युवतियों की तरह उसे भी अलग थलग करने की तैयारी की जाने लगी.

सविता को भी कहा गया कि उसे सब कुछ चुपचाप सहना है और इस बारे में किसी भी पुरुष से कुछ नहीं कहना है. इसके बाद तो सविता के लिए नए नए नियम बनने लगेः घर के सामान मत छुओ, पूजा में मत आओ, मंदिर में मत जाओ, तुलसी के पौधे को मत छुओ नहीं तो वे जल जाएंगे और अचार को हाथ मत लगाओ, नहीं तो वे खराब हो जाएंगे.

अब 24 साल की हो चुकी सविता बताती हैं कि उन्हें ऐसा लगता था कि वह अपने जीवन में नर्क देख रही हैं. बहुत दिनों बाद उन्होंने इंटरनेट पर मासिक चक्र के बारे में पढ़ना शुरू किया. उन्होंने कुछ जानकार दोस्तों से बात की और पता चला कि यह तो शरीर की बहुत ही स्वाभाविक प्रतिक्रिया है. अब वह दिल्ली के पास एक आईटी कंपनी में काम करती हैं और उन नियमों के चक्कर को तोड़ चुकी हैं, जो उनके घर वालों ने 12 साल पहले बताए थे. हालांकि उनका कहना है कि साथ में काम करने वाली कई औरतें अभी भी इन नियमों का पालन करती हैं.

इंटरनेट से जागरूकता

अदिति गुप्ता ने अपने पति तुहिन पॉल के साथ मिल कर मेन्स्ट्रूपेडिया डॉट कॉम नाम की वेबसाइट बनाई है. उनका मानना है कि भारतीय समाज में इसे लेकर बहुत कम बदलाव हुए हैं. 29 साल की गुप्ता पूर्वी भारत के एक छोटे से शहर में रहती हैं और उनके साथ भी बचपन की याद जुड़ी है. उन्हें बार बार खून का स्राव रोकने के लिए कपड़ों का सहारा लेना पड़ता, "प्रजनन का अध्याय भारत में 14-15 साल के बच्चों को पढ़ाया जाता है, जबकि ज्यादातर बच्चियों को 12-13 साल की उम्र में पहली बार मासिक धर्म का सामना करना पड़ता है."

Eurythmie und Bihu-Tanz

जागरूकता की कमी

ग्रामीण भारत में तो स्थिति और भी खराब है. ज्यादातर बच्चियों को मासिक चक्र के दौरान अलग थलग कर दिया जाता है. उन्हें रसोई में जाने की इजाजत नहीं मिलती, बाहर खेलने की भी नहीं और यहां तक कि शादी शुदा औरतें अपने पति के साथ सो भी नहीं पाती हैं.

गुप्ता का कहना है कि उन्हें वेबसाइट बनानी पड़ी क्योंकि लोग इस बारे में अब भी खुल कर बात नहीं कर पाते हैं. उधर, चेन्नई में लैंगिक समानता का संघर्ष कर रहीं टीजी गीता का कहना है, "दिक्कत यह है कि इस तरह की वर्जनाओं को धार्मिक मामलों से जोड़ दिया जाता है और ये ज्यादा मुश्किल हो जाती हैं." कई युवतियां अपने बड़ों की देखा देखी नियमों का पालन करती हैं. गीता का कहना है, "जिस तरह से मां और टीचर बच्चियों को मासिक धर्म के बारे में बताती हैं, उन्हें लगता है कि यह कोई गलत चीज है." उनका कहना है, "अभी भी आप कई भारतीय मंदिरों के बाहर नोटिस देखेंगेः कैमरा, जूते और मासिक धर्म वाली महिलाओं का प्रवेश वर्जित."

बीमारी का खतरा

सही जानकारी नहीं होने की वजह से कई बच्चियां इंफेक्शन का शिकार हो जाती हैं. उनमें तनाव भी बढ़ जाता है. गुप्ता कहती हैं, "अब जमाना बदल गया है और वर्जनाएं टूटनी चाहिए." हाल में 1105 महिलाओं का सर्वे किया गया, जिनमें से 13-49 आयु वर्ग की 59 प्रतिशत महिलाओं ने कहा कि वे मासिक धर्म के दौरान अचार नहीं छूती हैं. करीब 65 फीसदी महिलाएं मासिक के चौथे दिन बाल धोती हैं और 52 प्रतिशत घर के बाहर नहीं निकलती हैं.

नई दिल्ली के मौलाना आजाद मेडिकल कॉलेज की डॉक्टर सुनीला गर्ग कहती हैं, "जिन मिथकों से कोई हर्ज नहीं, उन्हें तो नजरअंदाज भी किया जा सकता है. लेकिन सेहत को लेकर ध्यान देने की जरूरत है." मासिक धर्म को लेकर बदल रही मानसिकता का लड़कियों की पढ़ाई पर भी असर पड़ सकता है. भारत में इस उम्र में पहुंचते ही 23 फीसदी बच्चियां स्कूल छोड़ देती हैं. पिछले साल की सरकारी रिपोर्ट का कहना है, "स्कूलों में इसके लिए जरूरी सुविधाएं नहीं हैं. टॉयलेट में पानी की कमी है और बच्चियों के लिए सैनेटरी नैपकिन बदलने की पर्याप्त जगह नहीं है."

एजेए/एमजी (डीपीए)

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