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मंथन

कीड़ों से बनेंगी दवाएं

एशियाई गुबरैला, कैटरपिलर और बरिइंग बीटल जैसे कीड़ों में बहुत खूबियां हैं. ये कीड़े धरती पर सबसे सफल जीवों में गिने जाते हैं. ये कीड़े बीमारियों के लिए नई दवाएं बनाने में भी मदद कर सकते हैं.

माना जाता है कि कीड़ों का इम्यून सिस्टम बहुत अच्छा होता है. कीचड़, दलदल, कूड़े और इतनी गंदगी में रहने के बावजूद भी बैक्टीरिया, वायरस, फंगस, उन पर असर नहीं कर पाते. ऐसा इसलिए क्योंकि उनके शरीर में कुछ खास पेप्टाइड होते हैं जो इन कीटाणुओं का सामना कर लेते हैं. अगर यही पेप्टाइड इंसानों के शरीर में भी शामिल हो जाएं, तो हम भी आसानी से कीटाणुओं के हमले से बच सकेंगे. यानी कीड़ों से मदद से बीमार होने से बचा जा सकता है.

इन कीड़ों पर रिसर्चर कर रही गीसेन यूनिवर्सिटी की आंद्रेयास विलचिंस्कास बताती हैं, "कीड़े ऐसे मॉलिक्यूल बनाने की क्षमता रखते हैं जिनकी मदद से वे दुश्मनों का सामना कर सकते हैं. या ऐसे एंजाइम बना सकते हैं, जो अलग अलग तरह का खाना पचा सकते हैं. मॉलिक्यूल के मामले में इसी विविधता को हम इंसान के लिए उपयोगी बनाना चाहते हैं."

गुबरैला से मलेरिया का इलाज

एशियाई गुबरैला यूरोपीय बीटल की तरह ही पत्तों के कीड़ों को खाता है. रिसर्चरों ने पता लगाया है कि एशियाई गुबरैले क्यों दुनिया भर में फैल रहे हैं. चूंकि उसका खून दूसरे गुबरैलों के लिए जहरीला है, इसलिए इस घुसपैठिये को उसकी अपनी प्रजाति के कीड़े भी नहीं खा पाते, "आयडिया था कि घुसपैठिये गुबरैला की तुलना उसी की प्रजाति के दूसरे कीड़ों के इम्यून सिस्टम के साथ की जाए, जो उतने घुसपैठिये ना हों और शोध की इसी रणनीति के कारण हमें नतीजे मिले."

इस रिसर्च के लिए गुबरैला का खून यानी हेमोलिम्फ लिया जाता है. थोड़ी देर के चकर को गुबरैला आसानी से सह लेता है. फिर हेमोलिम्फ का नमूना एक जेल पर फैलाया जाता है. इसे चौबीस घंटे के लिए ओवन में रखा जाता है. नतीजों में देखा गया कि जहां हारमोनिन नाम का तत्व सक्रिय है, वहां बैक्टीरिया की कोई जगह नहीं. आंद्रेयास बताती हैं, "हारमोनिन का परीक्षण कर के हम यह दिखा पाए कि यह टीबी के वायरस और मलेरिया को रोकता है. अब इस तत्व का इस्तेमाल करके इंसानों के लिए टीबी या मलेरिया की दवा बनाई जा सकती है."

Futurando 64 Käferimmunsystem Vorbild für neue Antibiotika

बरिइंग बीटल अपना खाना प्रीजर्व करना जानता है.

बरिइंग बीटल के एंजाइम

बरिइंग बीटल से शोधकर्ता सीखते हैं कि वह अपना खाना कैसे प्रीजर्व करता है. अगर इसे जंगल में मरा हुआ चूहा मिल जाए, तो वह उसे ढक देता है, अपनी लार से गीला कर देता है, और इसे बाद में खाने के लिए संभाल लेता है. आंद्रेयास बताती हैं, "हम सोच रहे हैं कि कैसे उस एंजाइम का पता लगाया जाए, जिससे ये कीड़ा मरा हुआ चूहा पचाता है. यह खाद्य उद्योग और तकनीकी इस्तेमाल के लिए काफी रोचक होगा."

गैंगरीन से निपटता कैटरपिलर

इसी तरह कैटरपिलर को गैंगरीन नहीं होता. कैटरपिलर में एक एंजाइम होता है जो गैंगरीन पैदा करने वाले बैक्टीरिया को रोक देता है, "इस कैटरपिलर का एक मॉलिक्यूल प्रीक्लिनिकल रिसर्च में है. वहां अनोखे असर वाली एक नई तरह की दवा बनाने की कोशिश की जा रही है." अब इस मॉलिक्यूल की संख्या बढ़ाई जा रही है. बायोरिएक्टर में वैसे ही हालात पैदा किए जा रहे हैं जैसे बाद में औद्योगिक उत्पादन के दौरान होंगे. इसके बाद एंटीबायोटिक एजेंटों को जेल में शामिल किया जाता है. गीसेन यूनिवर्सिटी के जीव विज्ञानी मार्क जाल्सिष बताते हैं, "हम काफी आगे पहुंच गए हैं, अब हम सूअर की त्वचा पर इसका परीक्षण करेंगे. लेकिन इसमें थोड़ा समय लगेगा. इसे पहले फार्मेसी में कुछ औपचारिकताएं पूरी करनी होगी, फिर इसका इस्तेमाल हो सकेगा." इस बीच एक बड़ी फार्मासुटिकल कंपनी ने इसमें दिलचस्पी भी दिखाई है.

इस प्रतियोगिता में कोई एक विजेता नहीं. कई कीड़ों में ऐसी कई खासियत होती हैं. बस वैज्ञानिकों के पास इनका पता लगाने के लिए जरूरी धीरज होना चाहिए.

रिपोर्टः माबेल गुंडलाख/आभा मोंढे

संपादनः ईशा भाटिया

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