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विज्ञान

कीड़े मकोड़ों की कमी से हिंसा

धरती पर मनुष्यों की संख्या पिछले 40 सालों में दुगुनी हुई है, लेकिन कीड़े, केंचुए और झींगों जैसे कड़ी खाल के जानवर कम हो गए हैं. ऐसा होने से क्या पर्यावरण पर फर्क पड़ेगा.

साइंस पत्रिका ने गायब होने वाले जानवरों पर एक खास शोध किया. इसमें वैज्ञानिक दावा करते हैं कि पृथ्वी पर बड़े और छोटे जानवरों और कीड़े मकोड़ों के गायब होने से दुनिया में हिंसा और अशांति फैली है.

ऐसा कैसे? शोधकर्ता कहते हैं कि अकशेरुकी यानि बिना रीढ़ की हड्डी वाले जानवर पर्यावरण में एक अहम भूमिका निभाते हैं. यह फसलों के परागण में मदद करते हैं, हानिकारक कीड़ों को खाते हैं और मिट्टी को उपजाऊ बनाते हैं. ताजा आंकड़ों के मुताबिक रीढ़ की हड्डी वाले जानवरों में से 322 नस्लें विलुप्त हो चुकी हैं और बाकी नस्लों में 25 प्रतिशत कमी हुई है.

रिपोर्ट के लेखक बेन कोलेन ने कहा, "हमें हैरानी हुई जब हमने देखा कि बिना रीढ़ की हड्डी के जानवरों में भी उतना ही घाटा हुआ है जितना बड़े जानवरों में. हम पहले सोचते थे कि अकशेरुकी जानवर ज्यादा तगड़े होते हैं." रिसर्चर कहते हैं कि इनकी संख्या कम होने की दो वजहें हैं, इनके प्राकृतिक माहौल का खत्म होना और मौसम में बदलाव.

इनकी संख्या कम होने से मनुष्यों को भी बड़ा नुकसान हो रहा है. इसकी वजह से हिंसा और अपराध बढ़े हैं और हो सकता है कि बाल मजदूरी के पीछे वजह भी कीड़ों का विलुप्त होना हो. यह इसलिए क्योंकि खाद्य पदार्थों में कमी आई है, लोगों की नौकरियां खत्म हो रही हैं और लोग तस्करी और अपराध का सहारा ले रहे हैं.

बर्कली में कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक कहते हैं कि जानवरों का विलुप्त होना सामाजिक हिंसा का अहम कारण है. अब तक हम सोचते आए हैं कि बढ़ते विकास और सामाजिक बदलाव से जंगलों में कमी आ रही है और जानवरों को नुकसान हो रहा है.

रिसर्च में लिखा है, "लाखों लोग जंगली मीट पर निर्भर हैं. अपनी आय के लिए या अपने खुद के खाने के लिए. यह संसाधन कम हो रहे हैं." मिसाल के तौर पर सोमालिया में समुद्री लुटेरे इसलिए इतना आगे बढ़ रहे हैं क्योंकि वहां मछुआरों के अधिकारों को कम कर दिया गया है. सोमालिया के मछुआरों और कई लाखों मछुआरों के लिए मछली और जंगली जानवर आय का एक मात्र जरिया हैं. इस वजह से हाथी दांत तस्करी और गेंडे के सींग की तस्करी बढ़ी है.

शोध में लिखा है, "हम केवल नस्लों को नहीं खो रहे, बल्कि हम बच्चों को खो रहे हैं, समुदायों को तोड़ रहे हैं और अपराध को बढ़ावा दे रहे हैं. इसलिए वन संरक्षण और भी जरूरी हो गया है."

एमजी/एएम(एएफपी)

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