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जर्मन चुनाव

किसे वोट देंगे मुसलमान

यूपी के कारोबारी नदीमुल हसन भारत के करीब 18 करोड़ मुस्लिम वोटरों में से एक. देश में चुनाव आते ही मुसलमान वोटों की नजर से देखे जाने लगते हैं. बीजेपी सहित सभी पार्टियों ने मुसलमानों के लिए कुछ नया करने का एलान किया है.

हसन भी मानते हैं कि मुसलमानों को सिर्फ वोट बैंक के रूप में देखा जाता है, "मुसलमानों के लिए भारत की आजादी से आज तक किसी ने कुछ नहीं किया है. हर कोई एक जैसे वादे करता है. मुझे जरा भी हैरानी नहीं होगी अगर नई सरकार भी सत्ता में आने के बाद यह भूल जाए कि मुसलमान भी भारत का हिस्सा है."

भारत में मुसलमान अल्पसंख्यक जरूर हैं लेकिन उनका हिस्सा बहुत बड़ा है. करीब 14 फीसदी. इससे उनकी भागीदारी अल्पसंख्यकों से कहीं ज्यादा हो जाती है. अनुमान है कि लोकसभा की 20 फीसदी सीटों के नतीजे मुस्लिम वोटर तय करते हैं.

राजनीतिक पार्टियां मुसलमानों से धर्म के नाम पर वोट जरूर मांगती हैं लेकिन वादों को भूलने में उन्हें जरा भी वक्त नहीं लगता. भारतीय मुसलमानों की सामाजिक, आर्थिक और शैक्षिक हालात का जायजा लेने वाली सच्चर कमेटी की रिपोर्ट ने 2006 में बताया कि "भारत में मुसलमानों की हालत अनुसूचित जाति जनजाति के लोगों से भी बुरी है" और देश की नौकरशाही में उनकी भागीदारी ढाई फीसदी भी नहीं.

इसके बाद कमेटी की कई सिफारिशें लागू हुईं और उनके कामकाज की रिपोर्ट के लिए जेएनयू के प्रोफेसर अमिताभ कुंडू की अध्यक्षता में दूसरी कमेटी बनी. कुंडू ने डॉयचे वेले को बताया, "मुसलमानों को उम्मीद थी कि उनके हित में कुछ बेहतर होगा. लेकिन मेरे ख्याल से पिछले पांच छह सालों में वर्तमान सरकार के प्रदर्शन से उन्हें निराशा हुई होगी."

सरकार पर 10 साल से काबिज कांग्रेस आम तौर पर मुसलमानों की पहली पसंद हुआ करती थी. लेकिन रिपोर्ट बताती है कि उसने भी मुस्लिमों के लिए कुछ नहीं किया और ऊपर से भ्रष्टाचार के मुद्दे पर आम भारतीय उससे त्रस्त है. सवाल उठता है कि ऐसे में भारत का मुसलमान विकल्प के तौर पर किसे देखता है.

सबसे मजबूत विकल्प विकास का वादा करने वाले बीजेपी के नरेंद्र मोदी हैं, लेकिन उनके दामन पर गुजरात दंगों का दाग है और उन्हें भारत का आम मुसलमान नहीं चाहता. चुनाव समीक्षक संजय कुमार कहते हैं कि मुसमलानों के लिए बीजेपी की छवि ऐसी है कि उसे हर हाल में हराया जाए, "जब मुसलमान वोट डालने जाते हैं तो उनकी प्राथमिकता उसे वोट देने की होती है जो उस निर्वाचन क्षेत्र में बीजेपी को हरा सके."

1992 में बाबरी मस्जिद ढहाए जाने की घटना और 2002 के गुजरात दंगे भारत के मुसलमानों को बीजेपी के खिलाफ खड़ा करते हैं. बाबरी मस्जिद गिराए जाने के बाद पूरे भारत में सांप्रदायिक दंगे हुए थे, जबकि गुजरात दंगों में हजारों लोगों की जान गई थी, जिनमें से ज्यादातर मुसलमान थे.

उत्तर प्रदेश में भारत के सबसे ज्यादा मुसलमान रहते हैं लेकिन बीजेपी ने वहां से एक भी मुस्लिम को अपना प्रत्याशी नहीं बनाया है. फिर भी पार्टी के मुस्लिम चेहरे मुख्तार अब्बास नकवी कहते हैं कि मुसलमानों के बीच उनकी पार्टी "की छवि बिगाड़ने की साजिश" लंबे वक्त से रची गई है, वह छवि बहुत सोच समझ कर रणनीति के तहत बनाई गई थी.

उनके मुताबिक, "हमने इसे बदलने की भी कोशिश की हालांकि हमें जितनी कोशिश करनी चाहिए थी उतनी कोशिश हम नहीं कर पाए. पिछले तीन सालों में हमने एक बड़े स्तर पर मुहिम चलाई कि समाज के सभी तबकों में, खास कर मुसलमानों में, बीजेपी को लेकर जो अवधारणा है उसमें बदलाव आए और वे हमारे साथ जुड़ें. इसका नतीजा यह हुआ कि बीजेपी के प्रति मुसलमानों की सोच बहुत बड़े स्तर पर सकारात्मक हुई है."

हाल के मुजफ्फरनगर दंगों के बाद मुसलमानों के राजनीतिक समीकरण और बदले हैं. भारत में सबसे ज्यादा सांसद देने वाले प्रदेश यूपी के मुसलमान सत्ताधीन समाजवादी पार्टी से भी नाराज हैं और उसे बीएसपी, कांग्रेस, बीजेपी और नई नवेली आम आदमी पार्टी के बीच अपना फैसला करना है. यह दुर्भाग्य है कि मुसलमानों के ध्रुवीकरण में दंगों की प्रमुख भूमिका होती है. संजय कुमार के शब्दों में, "मुसलमानों के लिए अपनी हिफाजत अहम मुद्दा बन गया है."

रिपोर्टः समरा फातिमा

संपादनः अनवर जे अशरफ

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