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दुनिया

किराये पर कोख और बच्चे की गारंटी

'टेक अवे कॉफी' के बारे में आपने सुना होगा, पर भला यह 'टेक होम बेबी' क्या है? भारत में इन दिनों कुछ वेबसाइटों पर आपको ऐसे विज्ञापन मिल जाएंगे. साथ ही बच्चे की गारंटी भी दी जा रही है.

सरोगेसी यानी किराये की कोख. भारत में इसे कानूनी मान्यता मिले एक दशक से भी ज्यादा का समय हो चुका है. पहली बार इसके बारे में तब पता चला जब 2004 में एक 47 साल की महिला ने अपनी बेटी के लिए अपनी कोख दी. गुजरात में दो जुड़वां बच्चियों ने अपनी नानी की कोख से जन्म लिया. भारत में भले ही इसे गलत ना माना जाता हो, लेकिन यूरोप के बड़े हिस्से में आज भी सरोगेसी गैरकानूनी है. जर्मनी में तो सख्ती का आलम यह है कि नागरिकों को भारत का वीजा लेने से पहले जिन नियमों को ध्यान में रखने को कहा जाता है, उनमें इसे खास जगह भी दी गयी है. विदेश मंत्रालय ने चेतावनी देते हुए वेबसाइट पर लिखा है, "यदि आप इसलिए भारत जा रहे हैं कि किराये की कोख से बच्चा ला सकें, तो याद रखें: जर्मनी में सरोगेसी पर रोक है. किराये की कोख से पैदा हुए बच्चे का जर्मनी के पासपोर्ट पर कोई हक नहीं है."

2010 में जर्मनी ने इस सख्ती का प्रमाण भी दिया जब एक दंपत्ति को भारत में पैदा हुए जुड़वां बच्चों को देश में लाने की अनुमति नहीं दी. लेकिन कई देशों के लिए भारत एक सस्ता और अच्छा विकल्प बना हुआ है. डॉक्टर शिवानी सचदेव गौड़ नई दिल्ली में अपने पति के साथ सरोगेसी सेंटर चलाती हैं. वह बताती हैं, "हमारे पास अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, आयरलैंड, स्पेन, जापान, नॉर्वे, स्वीडन, इस्राएल, अर्जन्टीना, ब्राजील, एक्वाडोर और क्यूबा से लोग आते हैं."

20 लाख के बच्चे

इनमें से एक हैं ऑस्ट्रेलिया के नेथन जिन्हें हाल ही में जुड़वां बच्चे हुए हैं. एक बेटे और एक बेटी के पिता होने की खुशी नेथन कुछ ऐसे जाहिर करते हैं, "हम हर रोज अपने बच्चों की तरफ देखते हैं और भारत का शुक्रिया अदा करते हैं." लेकिन उन्हें इस खुशी की काफी बड़ी कीमत भी चुकानी पड़ी है. 44 साल के नेथन ने डॉयचे वेले से बातचीत में बताया कि उन्हें अपने पिता बनने के लिए करीब 35 से 40 हजार डॉलर यानी करीब बीस लाख रुपये खर्च करने पड़े.

Leihmutterschaft Indien

अपनी बच्चे और दोस्त के साथ ऑस्ट्रेलिया के नेथन

नेथन समलैंगिक हैं और पिछले छह साल से अपने बॉयफ्रेंड के साथ रह रहे हैं. जब उन्होंने परिवार शुरू करने के बारे में सोचा तो इसकी कठिनाइयां समझ आईं, "ऑस्ट्रेलिया में बच्चे को गोद लेना कोई आसान काम नहीं है. यहां बच्चे ही नहीं हैं जिन्हें आप गोद ले सकें." फिर नेथन और उनके दोस्त ने सरोगेसी का रास्ता अपनाने के बारे में सोचा. लेकिन इसमें भी मुश्किलें कम नहीं थीं, "ऑस्ट्रेलिया में कानून बहुत अजीब हैं, कुछ स्पष्ट नहीं है. आप किसी को अपना बच्चा गर्भ में रखने के लिए पैसे नहीं दे सकते और अस्पतालों का खर्च तो बहुत ही ज्यादा है." नेथन के दोस्तों ने टीवी पर भारत में सरोगेसी के बारे में देखा और उन्हें वहां जाने की सलाह दी. नेथन के लिए दोस्तों की सलाह काम कर गयी.

कोख का पर्यटन

नेथन डॉक्टर गौड़ के सरोगेसी सेंटर इंडिया (एससीआई) से संपर्क करने वाले सैकड़ों लोगों में से एक हैं. सेंटर चलाने वाले डॉक्टर विशाल दत्त गौड़ बताते हैं, "हमारे पास हर महीने 400 से 500 आवेदन आते हैं." 2008 से डॉक्टर गौड़ करीब 500 जोड़ों को बच्चे दिलवा चुके हैं. उनके सेंटर के पास अधिकतर आवेदन इंटरनेट के जरिए आते हैं. पर कई लोगों को मेडिकल टूरिज्म कंपनियां भी यहां लाती हैं. फिल्म स्लम डॉग मिलियनेयर के बाद भारत में स्लम टूरिज्म की बाढ़ आ गयी थी. अब बारी मेडिकल टूरिज्म की है.

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एससीआई के डॉक्टर विशाल दत्त गौड़ और डॉक्टर शिवानी सचदेव गौड़

एससीआई ने अपनी वेबसाइट पर ग्राहकों को लुभाने के लिए "सरोगेसी पैकेज" के बारे में लिखा है. इसमें "पांच सितारा सुविधाएं" उपलब्ध हैं, हवाई अड्डे से लाने ले जाने के लिए गाड़ी का बंदोबस्त है, दिन रात एक निजी टैक्सी की सुविधा है, रहने के लिए बेहतरीन जगह है और लोगों को घूमाने और खरीदारी करने के लिए भी ले जाया जाता है. डॉक्टर गौड़ बताते हैं कि यह पैकेज 12.5 लाख रुपये से शुरू होता है. इसमें से अपनी कोख किराये पर देने वाली महिला को कितना पैसा मिलेगा यह किसी और पेशे की ही तरह उनके तजुर्बे पर निर्भर करता है. डॉक्टर गौड़ बताते हैं, "जो औरतें अभी शुरु कर रही हैं उन्हें तीन लाख रुपये मिलते हैं." यानी पैकेज की रकम में एक चौथाई से भी कम.

गरीबी में सहारा

नेथन भी यह बात मानते हैं कि अधिकतर महिलाएं अपने परिवार की आर्थिक स्थिति के कारण ऐसा करने पर मजबूर होती हैं, "मेरे ख्याल से सबसे बड़ी वजह तो पैसा ही है. उनके लिए यह एक बड़ा मौका होता है कि वे अपना घर बना सकें या बच्चों को अच्छी शिक्षा मुहैया करा सकें. मैं यह नहीं सोच सकता कि वह केवल दया भाव से एक समलैंगिक जोड़े की मदद करना चाहती थी."

बीना देवी के लिए यह महीने की आय जैसा है. 29 साल की बीना 7वें महीने में गर्भवती हैं. पिछले सात महीनों से उन्हें हर महीने 12,500 रुपये मिल रहे हैं. साथ ही रहने की जगह भी दी गयी है. एक कमरे के मकान में वह अपने पति और दो बच्चों के साथ रहती हैं. पति दर्जी है और कुल मिला कर वे किसी तरह घर का खर्च निकालते हैं. इस काम के लिए बीना खास तौर से उत्तर प्रदेश से दिल्ली आईं. लेकिन दो महीने बाद उन्हें फिर अपने गांव लौट जाना होगा. वह पढी लिखी नहीं हैं. इतना जानती हैं कि बच्चा हो जाने के बाद काफी पैसा मिलेगा, पर कितना, "कॉन्ट्रैक्ट में कुछ लिखा है, मुझे याद नहीं."

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अपनी कोख किराये पर देती माएं

कुछ भी नहीं पता

बीना जिनका बच्चा अपनी कोख में पाल रही हैं उनसे केवल एक ही बार मिली हैं, तब जब करार पर दस्तखत किए थे. वे लोग कौन थे इस बारे में भी वह बस इतना ही जानती है कि "वे अंग्रेज थे, अंग्रेजी में बात कर रहे थे. जाते समय थैंक्यू बोला, बस मुझे तो इतना ही समझ आया". भारत में विदेशी आ कर किराये की कोख तो ढूंढ सकते हैं, लेकिन उस महिला से संपर्क नहीं रख सकते, प्रसव से पहले तो बिलकुल भी नहीं और बाद में रखने वाले भी कम ही होते हैं.

नेथन का कहना है कि वह भारत लौटेंगे ताकि अपने बच्चों को दिखा सकें कि उनका जन्म किस देश में हुआ. वह कहते हैं कि वह जब भी भारत आएंगे बच्चों को उनकी मां से मिलवाना चाहेंगे. पर क्या हर मां भी ऐसा ही चाहती हैं? बीना की बातों से ऐसा नहीं लगता, "यह मेरा है ही नहीं, मैंने कभी इसे अपना नहीं माना, तो इसे देते हुए मुझे क्या दिक्कत होगी." बीना तैयार है, उस विदेशी जोड़े से एक बार और मिलने के लिए और नौ महीने तक अपनी कोख में रखे बच्चे को हमेशा के लिए खुद से दूर कर देने के लिए.

रिपोर्ट: ईशा भाटिया

संपादन: महेश झा

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