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दुनिया

किराये की कोखः शोषण या आजाद फैसला

दुनिया भर में भारतीय महिलाएं सबसे ज्यादा किराये पर कोख देती हैं, लेकिन थाईलैंड के गैमी बेबी जैसी घटना भारत में नहीं होगी क्योंकि सरोगेट मदर्स को कुछ भी कहने का अधिकार नहीं.

गुजरात के आणंद के आकांक्षा इन्फर्टिलिटी क्लीनिक में दीवारों पर लगी सस्ती तस्वीरें थोड़ा रंग ला रही हैं. इन तस्वीरों में दुनिया भर के बच्चों के फोटो हैं, दक्षिण कोरिया, न्यूजीलैंड, जापान, अमेरिका और यूरोपीय देश. लेकिन ये सारे बच्चे यहीं आणंद के इस क्लीनिक में पैदा हुए हैं, जिन्हें यहां आसपास रहने वाली औरतों ने अपने गर्भाशय में किसी और के लिए पाला. भारत में सरोगेट मदर का व्यवसाय काफी व्यापक और बड़ा हो चुका है और आणंद इसका मुख्य केंद्र बन चुका है.

इस सबका कारण है आकांक्षा की निदेशक नयना पटेल. उन्होंने अपनी बेटी के बच्चों को अपनी कोख में पाला. तब से भारत में ये व्यवसाय दिन दूनी और रात चौगुनी तरक्की कर रहा है. संयुक्त राष्ट्र के सहयोग वाली एक स्टडी के मुताबिक भारत में तीन हजार से ऐसे क्लीनिक हैं.

अधिकतर सरोगेट मदर्स को अपने बच्चों की पढ़ाई के लिए पैसे चाहिए होते हैं. कुछ को घर बनाना होता है या कुछ को कर्ज उतारना होता है. पटेल का मानना है कि सरोगेट मदर्स बहुत मजबूत महिलाएं होती हैं जो अपने लिए खुद फैसला करती हैं और एक ऐसे परिवार की मदद करती हैं जिनके पास बच्चा नहीं है या पत्नी किसी कारण गर्भ धारण नहीं कर पा रही. वह कहती हैं, "वह दंपत्ति की मदद करके महान काम कर रही हैं. गर्भाशय किराये पर देने वाली महिलाओं को हमारे इस क्लीनिक में ही रहना होता है. उन्हें वहां विशेष खाना दिया जाता है, नियमित दवाएं और उन्हें सलाह भी दी जाती है." कार्यकर्ता सेजल पटेल बताती हैं कि सभी फैसले कॉन्ट्रैक्ट देने वाले यानि बच्चा चाहने वाले दंपत्ति करते हैं. वही सरोगेट मदर चुनते भी हैं. वही तय करते हैं कि क्या ये महिला बच्चे को बाद में देख सकती है या नहीं या फिर फोटो भेजे जाएंगे. पटेल कहती हैं, "अगर कुछ मुश्किल हो जाती है तो गर्भपात करवा दिया जाता है."

27 साल की सरोगेट मदर अर्पिता क्रिस्टियन बताती हैं कि उन्हें पहले ही साफ कर दिया जाता है कि वह सिर्फ कोख किराये पर दे रही हैं, और कुछ नहीं. उस बारे में सोचना ही नहीं है कि बच्चा किसका है. अर्पिता एक अमेरिकी दंपत्ति के लिए बच्चा पाल रही हैं. वह कहती हैं, "हमें पूरी उम्मीद है कि हमसे जो मांगा जा रहा है वो हम पूरा कर सकेंगे."

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गैमी बेबी जैसा मामला भारत में होगा ही नहीं क्योंकि यहां सरोगेट मदर्स को कुछ कहने का अधिकार ही नहीं है.

जी स्मार्ट नाम के गैर सरकारी संगठन के लिए काम करने वाले एजे हरिहरन के मुताबिक अर्पिता को क्लिनीक सिर्फ 6,000 रुपये दे रहा है. हरिहरन का संगठन विशेष तौर पर चेन्नई में सरोगेट मदर्स के अधिकारों के लिए काम करता है. वह बताते हैं, "कई क्लीनिक दलाल की मदद से काम करते हैं, जैसे ऑटोरिक्शा चलाने वाला या फिर कोई और. जो पहले तो खूब पैसे का वादा करते हैं फिर आधा पैसा खुद रख लेते हैं." मनोवैज्ञानिक मदद और मेडिकल सुविधाएं भी अक्सर नहीं मिलतीं. अधिकतर भारतीय महिलाएं पूरा कॉन्ट्रैक्ट पढ़ती भी नहीं हैं या कहें कि उन्हें पढ़ना लिखना आता ही नहीं है. अधिकतर मामलों में गर्भ के तीसरे महीने महिला समझौते पर साइन करती है. बच्चे में कुछ गड़बड़ी होने पर बिना पूछे गर्भपात करवा दिया जाता है.

पूछे जाने पर अधिकतर महिलाओं ने यही कहा कि बच्चा भले ही अपाहिज हो लेकिन वह उसे पैदा करना चाहेंगी. कुल मिला कर इस बारे में आजाद फैसले की दलील एक भ्रम सी लगती है.

एएम/ओएसजे(डीपीए)

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