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मंथन

किताबों की छपाई को क्यों कहते हैं प्रिंटिंग प्रेस?

मंथन का खास एपिसोड, इस बार दुनिया के सबसे बड़े पुस्तक मेले से. फ्रैंकफर्ट बुक फेयर में शिरकत करने के साथ इस बार जानेंगे किताबों व प्रिटिंग के इतिहास को, साथ देखेंगे झलक किताबों के भविष्य की.

वीडियो देखें 00:25

किताबों के पीछे का विज्ञान

एक बड़ी आम धारणा है कि पुराने जमाने में राजाओं और संभ्रांत लोगों ने ज्ञान को खुद तक समेट कर रखा. लेकिन अगर आप किताबों और छपाई के इतिहास को देखेंगे तो पता चलेगा कि पांच-छह सौ साल पहले तक किताबों को जनमानस तक पहुंचाने का कोई साधन ही नहीं था. कुछ ही लोग हाथ से किताब लिखते थे और एक किताब को पूरा करने में ही कई साल लग जाते थे. लेकिन तभी 15वीं सदी में जर्मनी में एक क्रांति हुई. योहानेस गुटेनबर्ग ने पहली बार मैकेनिकल प्रिंटिंग प्रेस बनाई. मंथन में जानिए कैसे गुटेनबर्ग ने अपनी मशीन से पहली बार किताब छापी. साथ ही आपको मिलेगा इस सवाल का जवाब कि यह प्रिंटिंग प्रेस क्यों कहलाई.

Johannes Gutenberg

अपनी मशीन के साथ गुटेनबर्ग

किताबों की हिफाजत

"कृपया ठंडे और सूखे में रखिए." ये खाद्य सामग्री को सुरक्षित रखने की सलाह लगती है, लेकिन किताबों के लिए भी सही है. डुसेलडॉर्फ की यूनिवर्सिटी लाइब्रेरी में किताबों को 18 डिग्री सेल्सियस और 55 फीसदी नमी में रखा जाता है. किताबों को लंबे समय तक सुरक्षित रखने की आदर्श स्थिति. साथ ही डुसेलडॉर्फ लाइब्रेरी में किताबों को बचाने के लिए उसे डिजिटलाइज कर पाठकों को उपलब्ध कराया जा रहा है.

किताबों को सहेजकर रखना आसान नहीं. खासकर अगर पुस्तकालयों में आग लग जाए और किताबें जल जाएं, तो किताबों को फिर से दुरुस्त करने वालों के सामने बड़ी चुनौती होती है. किताबों को आग ही नहीं, बुझाने के लिए इस्तेमाल हुआ पानी भी नुकसान पहुंचाता है. लेकिन अगर जल्द कदम उठाए जाएं तो किताबों को बचाया जा सकता है. मंथन में जानिए कि किताबों के डॉक्टर कैसे जल चुकी किताबों को फिर से दुरुस्त कर देते हैं.

सेल्फ पब्लिशिंग का चलन

बाजार में इलेक्ट्रॉनिक किताबें लोकप्रिय हो रही हैं. इसने उन लेखकों के लिए भी दरवाजे खोल दिए हैं जिन्हें प्रकाशक नहीं मिलते. खुद प्रकाशन करने वाले लेखकों की संख्या बढ़ रही है और वे कामयाब भी हो रहे हैं. कार्यक्रम में बात करेंगे नई दिल्ली की ऋचा झा से जो लेखक हैं और बिना किसी प्रकाशक की मदद लिए अपनी किताबें छाप रही हैं. डेढ़ साल पहले सेल्फ पब्लिशिंग में उतरी ऋचा अब तक आठ किताबें छाप चुकी हैं. वे ऐसी सोच रखने वालों को कई टिप्स भी देती हैं. ऋचा झा के साथ साथ मिलवाएंगे आपको जर्मनी की एक मशहूर सेल्फ पब्लिशर से भी, जिनकी किताबें जर्मनी की बेस्ट सेलर लिस्ट में पहुंच चुकी हैं.

किताबों की दुनिया की इन दिलचस्प बातों के लिए देखना ना भूलें मंथन शनिवार सुबह बजे डीडी नेशनल पर.

ओएसजे/आईबी

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