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दुनिया

कितने सक्रिय हैं भारतीय जिहादी अफगानिस्तान में?

अफगान अधिकारियों का कहना है कि अमेरिका के मदर ऑफ ऑल बॉम्ब्स हमले में 13 भारतीय जेहादी भी मारे गए. दक्षिण एशिया एक्सपर्ट माइकल कुगेलमन का कहना है कि भारतीय नागरिक अफगानिस्तान में अल कायदा और आईएस में शामिल हो रहे हैं.

13 अप्रैल को अमेरिका ने पूर्वी अफगानिस्तान में आईएस के एक ठिकाने पर सबसे बड़ा गैर परमाणु बम गिराया. अफगान अधिकारियों के अनुसार इसमें आईएस के 96 लड़ाके मारे गये, जिनमें 13 भारतीय भी थे. अफगानिस्तान में आईएस ने सैकड़ों स्थानीय लोगों की भर्ती की ही है, उन्होंने पाकिस्तान, बांग्लादेश और मध्य एशिया के कट्टरपंथी भी हैं. आईएस के अफगानिस्तान ऑपरेशन में भारतीय जिहादियों के योगदान पर ज्यादा जानकारी नहीं है. वाशिंगटन के वूड्रो विल्सन सेंटर के दक्षिण एशिया एक्सपर्ट माइकल कुगेलमन का कहना है कि यह मानने की अच्छी वजहें हैं कि अफगानिस्तान में भारतीय उग्रपंथी भी हैं.

डॉयचेवेले: अफगानिस्तानमेंभारतीयउग्रपंथियोंकीगतिविधियोंकेबारेमेंज्यादामालूमनहींहै. आपकोइसकेबारेमेंक्याजानकारीहै?

माइकल कुगेलमन: मैं समझता हूं कि व्यापक सवाल यह है कि अफगानिस्तान उग्रपंथियों के लिए आकर्षक क्यों होता जा रहा है. पिछले कुछ सालों में इलाके से चरमपंथियों का बड़े पैमाने पर आना हुआ है. अफगानिस्तान का चरमपंथी नेटवर्क तालिबान और अल कायदा से कहीं अधिक व्यापक और अंतरराष्ट्रीय है. उन्हें अफगानिस्तान की जो बात लुभाती है वह इसका कानूनविहीन होना है, जो छुपने की आदर्श शर्तें देता है. ये ऐसा माहौल है जो हर प्रकार के उग्रपंथियों को अपील करता है, वे चाहे भारत के उग्रवादी हों, मध्य एशिया के जिहादी हों, या मध्यपूर्व के अरब लड़ाके हों.

Michael Kugelman (C. David Owen Hawxhurst / WWICS)

माइकल कुगेलमन

येयदिपहलानहींतोकुछेकमामलोंमेंशामिलहैजबभारतकेचरमपंथीअफगानिस्तानमेंमारेगयेहों. क्याभारतीयचरमपंथीपूरेअफगानिस्तानमेंसक्रियहैं?

इस बात को मानने के कारण हैं कि अल कायदा और खासकर इसके दक्षिण एशियाई ईकाई आकिस में भारतीय भी हैं. इस बात को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए कि आकिस के कमांडर के भारतीय होने की बात है. दावों के विपरीत अल कायदा अफगानिस्तान और आसपास के इलाके में गंभीर खतरा बना हुआ है. हाल के इतिहास को देखते हुए यह मानने की अच्छी वजहें हैं कि अफगानिस्तान में भारतीय चरमपंथी हो सकते हैं. लश्कर ए तैयबा की अफगानिस्तान में उपस्थिति थी और काफी समय से वह इंडियन मुजाहिदीन के साथ सहयोग कर रहा था जो अल कायदा से जुड़ा भारतीय आतंकवादी गुट है, जो इस बीच खत्म हो चुका है.

भारतभारतकेप्रधानमंत्रीनरेंद्रमोदीकीहिंदूराष्ट्रवादीनीतियांकुछभारतीयमुसलमानोंकोअफगानिस्तानमेंचरमपंथीगुटोंकीओरधकेलरहीहैं?

यह सही है कि भारतीय मुसलमानों ने भेदभाव की नई और बढ़ती चुनौतियों का सामना किया है, लेकिन इसमें संदेह है कि इसका उन्हें रैडिकल बनाने वाला असर हुआ है और उनमें से कुछ ने आईएस ज्वाइन कर लिया है. मेरी राय में इसकी संभावना बहुत कम है कि रैडिकल बने युवा भारतीय मुसलमान बड़ी संख्या में आईएस की ओर आकर्षित हो रहे हैं.. हालांकि इस संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता कि यदि मौजूदा हालात बने रहे तो ये छोटे स्तर पर संभव होगा. सारी चुनौतियों और समस्याओं के बावजूद भारतीय मुसलमानों के साथ उससे बेहतर सलूक हो रहा है जैसा बहुत से देशों में धार्मिक अल्पसंख्यकों के साथ होता है.

अफगानरक्षामंत्रालयनेइसबातकीभीपुष्टिकीहैकिअमेरिकीहमलेमेंमरनेवालोंमेंपाकिस्तानी, बांग्लादेशीऔरफिलीपीनीनागरिकभीथे. क्याअफगानिस्तानआईएसमेंशामिलहोनेवालेजिहादियोंमेंलोकप्रियहोगयाहै?

पिछले सालों में जब हम ग्लोबल आतंकवाद की मंजिल के बारे में सोचते थे तो पाकिस्तान का नाम सबसे ऊपर होता था. लेकिन पाकिस्तान सेना द्वारा कबायली इलाकों में की कई आतंकवाद विरोधी कार्रवाईयों ने स्थिति बदल दी है. एक तो आतंकवाद विरोधी ऑपरेशंस के चलते पाकिस्तान स्थित आतंकवादी सीमा पार कर अफगानिस्तान चले गये हैं. दूसरे इन ऑपरेशंस की वजह से इलाके और इलाके से बाहर के आतंकवादी अफगानिस्तान को आकर्षक मुकाम समझने लगे हैं क्योंकि वहां कानून और व्यवस्था की स्थिति बहुत ही खराब है. इस्लामी चरमपंथी अफगानिस्तान को पाकिस्तान से बेहतर जगह के रूप में देखने लगे हैं क्योंकि वह ज्यादा आकर्षक है और वहां सुरक्षित पनाह बनाना ज्यादा आसान है.

अफगानिस्तानमेंआईएसकाक्याभविष्यहै?

मैं समझता हूं कि अफगानिस्तान में आईएस का सितारा नीचे जा रहा है. कुछ साल पहले उसका विकास हो रहा है, उस समय वह पूरी दुनिया में हमले कर रहा था और मध्यपूर्व के खिलाफत पर उसका कड़ा शिकंजा था. लेकिन पिछले साल आईएस ने मध्यपूर्व में अपनी काफी जमीन खो दी है और अमेरिका ने अफगानिस्तान के साथ मिलकर उसकी संगठनात्मक ढांचे और ताकत को कमजोर कर दिया है. खासकर पूर्वी अफगानिस्तान में अपनी बर्बर नीतियों के साथ आईएस दोस्त बनाने में नाकाम रहा है, जिससे कि स्थानीय समुदायों में तालिबान नरमपंथी लगने लगा है. मैं नहीं कहता कि अफगानिस्तान में आईएस आखिरी सांसें ले रहा है, लेकिन वह जीवन के लिए संघर्ष कर रहा है. तालिबान हमेशा से वहां सबसे बड़ा खतरा रहा है और जैसे जैसे आईएस कमजोर होगा तालिबान की ताकत और बढ़ेगी.

माइकलकुगेलमनवीशिंगटनकेवूड्रोविल्सनसेंटरमेंसीनियरएसोसिएटहैं.

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