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दुनिया

कितनी तैयार अफगान सेना

अब्दुल मलिक और उसके साथी अफगान सैनिक दक्षिण के मुश्किल इलाके से गुजर रहे थे, जब उनके कारवां पर हमला हुआ. उस वक्त मलिक कार से बाहर थे. बच गए, पर साथी के सिर पर चोट आई है.

मदद तुरंत आ जाती है. अमेरिकी हेलिकॉप्टर उन्हें वहां से निकालते हैं और कंधार के अस्पताल पहुंचाते हैं. इस इलाके में सबसे बड़ा अस्पताल कंधार में ही है. मलिक को घुटने के नीचे पैर गंवाना पड़ता है. अगर फौरन मदद न मिलती, तो शायद जान गंवानी पड़ती. उसके तीनों साथी मारे गए. मलिक का कहना है, "मैं देख रहा था कि हमले में उसका दिमाग निकल कर जमीन पर गिर गया."

अमेरिकी सेना अगले साल देश छोड़ रही है और उससे पहले अफगान सैनिकों को अपने दम पर काम करने की ट्रेनिंग दी जा रही है. पिछले 12 साल में यह पहला मौका है, जब अफगानिस्तान के 90 फीसदी हिस्से में सुरक्षा की जिम्मेदारी खुद अफगानिस्तान की सेना के जिम्मे आ रही है.

लेकिन अभी भी वे हवाई मदद के लिए बुरी तरह अंतरराष्ट्रीय सेना पर निर्भर हैं. घायलों को अस्पताल पहुंचाने या मौके पर फंसे फौजियों तक मदद पहुंचाने में वायु सेना जरूरी है.

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अफगानिस्तान की सुरक्षा की जिम्मेदारी

सिर्फ सलाह मिलेगी

आने वाले दिनों में नाटो और अमेरिकी सेना वहां सिर्फ मांगने पर सलाह देगी. इसके बाद पता चलेगा कि उन्हें ट्रेनिंग की कितनी जरूरत है. समझा जाता है कि अगले साल के बाद नाटो और अमेरिका के सिर्फ 8000 से 10,000 सैनिक बचेंगे, जिनमें से ज्यादातर ट्रेनर होंगे. नाटो से हजारों सैनिकों की मांग की गई थी लेकिन अब तक सिर्फ जर्मनी ने 800 सैनिक देने की बात मानी है.

अमेरिकी सेना का मानना है कि करीब साढ़े तीन लाख अफगान सैनिकों को बहुत तेजी से सीखने की जरूरत है. पूर्व के नंगरहार प्रांत में अमेरिका की फर्स्ट ब्रिगेड कॉमबैट टीम तैनात है. वह अफगान राष्ट्रीय सेना को सलाह दे रही है. लेफ्टिनेंट कर्नल मैथ्यू स्टेडर ने कहा कि अफगान सेना को खुफिया जानकारी, निगरानी और दूसरे ऑपरेशन के लिए सलाह की जरूरत है.

स्टेडर का कहना है, "मुझे लगता है कि वे अच्छा कर रहे हैं. लेकिन अमेरिकियों से अलग तरह से काम कर रहे हैं." अफगान सेना अपनी रसद और ईंधन तथा पानी की सप्लाई कर सकते हैं. लेकिन उन्हें योजना बनाने, लॉजिस्टिक और दूसरी चीजों में दिक्कत हो रही है. स्टेडर का कहना है कि वह जिस ब्रिगेड को देख रहे हैं, उसे कम से कम एक साल और ट्रेनिंग की जरूरत है. उसके बाद ही वह स्वतंत्र रूप से काम कर पाएगा.

उन्होंने कहा, "कई सालों में हमने अफगानों को मदद पर निर्भर बना दिया, अब सलाहकार के तौर पर हमें उसे फिर से काम में लाना है." नाटो और अमेरिकी सेना पिछले 12 साल से अफगानिस्तान में तैनात है. उससे पहले कई सालों तक देश में तालिबान का दबदबा रहा था. यानी संगठित सेना बरसों से देश में नहीं है.

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विदेशी सेना देगी ट्रेनिंग और सलाह

डर का माहौल

हालांकि अफगानिस्तान को अब भी उम्मीद है. अपने किलेबंद दफ्तर में बैठे जनरल अब्दुल राजिक दक्षिणी कंधार प्रांत के पुलिस प्रमुख हैं. यह अफगानिस्तान में सबसे खतरनाक नौकरियों में एक है. फिर भी उनका कहना है कि वह उस दिन का इंतजार कर रहे हैं, जब विदेशी सेनाएं देश छोड़ कर जाएंगी, "नाटो का जाना हमारे लिए अच्छी चीज है क्योंकि तब हमारी धरती और हमारा शासन हमारे हाथों में लौटेगा."

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