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विज्ञान

कितनी खरी हैं मूल कोषिकाएं

गर्भ से मिलने वाली मूल कोषिकाओं का चरित्र अन्य कोषिकाओं से भिन्न होता है. कहीं आसानी से वे विभाजित होती हैं और इसलिए चंद ही दिनों के अंदर उनसे भिन्न-भिन्न प्रकार की कोषिकाएं बन सकती हैं.

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इस बीच अमेरिका में उनके चरित्र के बारे में दो अध्ययन किए गए हैं. इस सिलसिले में गर्भ से मिलने वाली कोषिकाओं से बनी कोषिकाओं पर ध्यान दिया गया है. अब तक हुए परीक्षणों में उनके आनुवंशिक चरित्र पर ध्यान नहीं दिया गया था. इस बार बारीक आनुवंशिक परीक्षण किए गए हैं और वैज्ञानिकों को कई खामियां मिली हैं. मानव शरीर की कोषिकाओं में एक ही प्रकार के आनुवंशिक तत्व मिलते हैं, जिनमें तीन अरब जेनेटिक कोड सहित 20 हजार से अधिक जीन.

जब कोषिकाओं का विभाजन होता है, तो इन आनुवंशिक सूचनाओं की कार्बन कॉपी नई कोषिकाओं में होनी चाहिए. लेकिन अक्सर ऐसा नहीं होता. कैलिफोर्निया के स्क्रिप्स संस्थान की वैज्ञानिक जीन लोरिंग इन कोषिकाओं का अध्ययन कर रही हैं. उनका कहना है, "हमने दिखाया है कि ख़ासकर गर्भ से मिलने वाली मूल कोषिकाओं में अक्सर जेनेटिक रूप से डुप्लिकेट कोड मिलते हैं. और विशेष रूप से आनुवंशिक क्षेत्रों में उन्हें पाया जा सकता है, जो इन कोषिकाओं के विशिष्ट गुणों के लिए जिम्मेदार होते हैं."

कोषिकाओं के सभी आनुवंशिक तत्वों की तुलना करना संभव नहीं है. यह एक व्यापक और जटिल प्रक्रिया होगी. लेकिन कुछ ऑटोमेटिक पद्धतियों की मदद से इन वैज्ञानिकों ने अलग-अलग कोषिकाओं के आनुवंशिक तत्वों की तुलना की है. उनके बीच अंतरों का पता लगाने के लिए उन्हें अधिक ढूंढ़ना नहीं पड़ा. वैसे जीन लोरिंग को अभी तक पता नहीं चला है कि शरीर के तथाकथित वयस्क अंगों की मूल कोषिकाओं में भी ऐसी खामियां हैं या नहीं. वह कहती हैं, "इन तथाकथित वयस्क मूल कोषिकाओं के क्षेत्र में अभी तक बारीक प्रयोग नहीं किए गए हैं. हमें यह भी पता नहीं है कि ये जेनेटिक खामियां किस हद तक खतरनाक हैं. इस सिलसिले में अभी प्रयोग किए जाने हैं. तभी पता चल पाएगा कि कौन से अंतर खतरनाक हैं और किन अंतरों से कोई फर्क नहीं पड़ता."

कैंसर के रोगियों को खतरा

कुछ एक जेनेटिक खामियां कैंसर की कोषिकाओं में भी पाई गई हैं. यह उन रोगियों के लिए एक जोखिम हो सकता है, गर्भ से मिलने वाली कोषिकाओं से जिनका इलाज किया जाता है. अमेरिका में इन कोषिकाओं पर दो अध्ययन जारी हैं. रीढ़ की मज्जा के रोगियों पर अध्ययन चल रहा है, साथ ही एक खास आनुवंशिक कमजोरी के इलाज के लिए अनुसंधान किया जा रहा है. जीन लोरिंग का कहना है कि इस सिलसिले में जल्दबाजी में किसी फैसले पर नहीं पहुंचना चाहिए. दोनों अध्ययन जारी रहने चाहिए. लेकिन सुरक्षा बढ़ाने के लिए अतिरिक्त जेनेटिक टेस्ट किए जाने चाहिए. वह कहती हैं, "मेरी राय में यह जरूरी है कि नियमित रूप से जेनेटिक टेस्ट किए जाएं. कोषिकाओं के विभाजन से पहले, उसके दौरान व उसके बाद भी. लेकिन खासकर रोगियों को ऐसी कोषिकाएं देने से पहले. इस प्रकार भविष्य में इसकी गारंटी दी जा सकेगी कि रोगियों को मिलने वाली कोषिकाओं से कोई खतरा नहीं पैदा हो रहा है."

मूल कोषिकाओं पर अनुसंधान करने वाले अपने साथी वैज्ञानिकों के लिए जीन लोरिंग की सलाह है कि वे कोषिकाओं के विभाजन के दौरान ही उनकी खामियों पर नजर दें. वह कहती हैं, "दरअसल प्रयोगशाला में हमेशा ऐसी कोषिकाएं ली जाती हैं, जिनका विभाजन तेजी से हो. यह भी गर्भ से मिलने वाली कोषिकाओं की एक खूबी होती है. लेकिन कोषिका विभाजन की अन्य विधियों के जरिये शायद उनकी खामियों को टाला जा सकता है."

अध्ययनों से यह भी पता चला है कि सबसे तेजी के साथ बढ़ने वाली कोषिकाएं अक्सर सबसे अच्छी कोषिकाएं नहीं होती हैं. इलाज के लिए भविष्य में धीरे-धीरे विभाजित होने वाली या बढ़ने वाली कोषिकाओं की कद्र बढ़ेगी. वैज्ञानिकों और प्रयोगशालाओं का काम बढ़ेगा. यहां भी वह पुरानी कहावत सटीक है - जल्दी का काम शैतान का होता है.

रिपोर्ट: मिषाएल लांगे/उभ

संपादन: महेश झा

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