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ब्लॉग

कितना सही वंदे मातरम का विरोध

भारत में राष्ट्रगीत वंदे मातरम पर फिर विवाद उठ खड़ा हुआ है. यह बहुजन समाज पार्टी के सांसद शफीकुर्रहमान बर्क के लोकसभा से उस समय उठकर चले जाने के कारण पैदा हुआ, जब 8 मई को सत्रावसान पर वंदे मातरम की धुन बजाई जा रही थी.

सदन में सभी उसके सम्मान में बिना हिले डुले खड़े थे. धुन समाप्त होने के तत्काल बाद लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार ने बर्क के बहिर्गमन पर कड़ी प्रतिक्रिया दी और उम्मीद जताई कि भविष्य में ऐसी घटना दुहराई नहीं जाएगी. लेकिन बर्क ने विभिन्न टीवी चैनलों पर अपने आचरण को सही ठहराते हुए कहा कि वंदे मातरम शरीयत के खिलाफ है, इसलिए वह इसे नहीं गाएंगे. लेकिन बर्क भूल गए कि वहां राष्ट्रगीत की केवल धुन बजाई जा रही थी, उसे गाया नहीं जा रहा था. वह यह भी भूल गए कि जिस भारतीय संविधान की शपथ लेकर वह सांसद बने हैं, उसमें वंदे मातरम को राष्ट्रगान, जन गण मन अधिनायक जय हे भारत भाग्यविधाता के समकक्ष माना गया है.

वंदे मातरम संस्कृत में रचित लंबा गीत है जिसे बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय ने लिखा तो अपने उपन्यास आनंदमठ से पहले था, लेकिन बाद में उसे उपन्यास में शामिल कर लिया. इसमें मातृभूमि की वंदना है और उसकी तुलना दुर्गा जैसी हिन्दू देवियों से की गई है. उपन्यास अत्याचारी मुस्लिम नवाब के शासन के विरुद्ध हिन्दू संन्यासियों द्वारा प्रेरित विद्रोह के कथानक पर आधारित है और 1882 में प्रकाशित हुआ था. लेकिन 1874 में बंगदर्शन में लिखते हुए चट्टोपाध्याय ने अपने दृष्टिकोण को स्पष्ट करते हुए कहा था कि बंगाल केवल हिंदुओं का नहीं, बल्कि सभी धर्मों के मानने वालों का है. इसके बाद के वर्षों में वंदे मातरम ब्रिटिश विरोधी राष्ट्रीय आंदोलन में सक्रिय सभी किस्म के राजनीतिक कार्यकर्ताओं का नारा बन गया और इसे गाते गाते अनेक देशभक्त फांसी के फंदे पर झूल गए, हजारों ने जेल में इसी के सहारे यातनाओं को सहने की शक्ति पायी और 1947 तक चले राष्ट्रीय आंदोलन के दौरान पुलिस की लाठियों के शिकार बने लाखों लोगों की जुबान पर यही गीत था.

Indien Neu Delhi

अमृतसर में हुए अखिल भारतीय मुस्लिम लीग के दूसरे अधिवेशन में 30 दिसंबर, 1908 को अपना अध्यक्षीय भाषण देते हुए सैयद अली इमाम ने वंदे मातरम का विरोध किया. लेकिन असली विरोध खिलाफत आंदोलन के विफल होने के बाद शुरू हुआ, जब 1923 में कांग्रेस के काकीनद अधिवेशन में मौलाना अहमद अली ने विष्णु दिगंबर पलुस्कर के गाए जाने का विरोध किया. धीरे धीरे विरोध बढ़ता गया और 26 अक्तूबर, 1937 को जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में कांग्रेस कार्यसमिति ने एक लंबा बयान जारी करके अपील की कि वंदे मातरम को आनंदमठ से अलग करके पढ़ा जाए और इसके केवल पहले दो छंद ही इस्तेमाल किए जाएं, जिनमें किसी देवी देवता का उल्लेख नहीं है और केवल मातृभूमि के सौंदर्य और गुणों का वर्णन करके उसकी वंदना की गई है.

25 अगस्त, 1948 को नेहरू ने संविधान सभा में स्पष्ट किया कि वंदे मातरम का राष्ट्रगीत के रूप में अद्वितीय स्थान बरकरार रहेगा. 24 जनवरी, 1950 को संविधान सभा के अध्यक्ष राजेंद्र प्रसाद ने संविधान सभा में कहा कि वंदे मातरम को जन गण मन के समकक्ष दर्जा प्राप्त होगा. यहा स्पष्ट करना जरूरी होगा कि 14 अगस्त, 1947 को जब संविधान सभा की कार्यवाही सुचेता कृपलानी द्वारा गाए गए राष्ट्रगीत वंदे मातरम से शुरू हुई, उस समय वहां कांग्रेस के मौलाना अबुल कलाम आजाद जैसे नेता तो थे ही, मुस्लिम लीग के चौधरी खलीकुज्जमां जैसे नेता भी मौजूद थे. चौधरी खलीकुज्जमां बाद में पाकिस्तान चले गए थे.

वंदे मातरम में मातृभूमि की पूजा या आराधना नहीं की गई है, जैसा कि उसके बारे में मुस्लिम सांप्रदायिक प्रचार है. इस प्रचार के कारण हिन्दू सांप्रदायिक तत्व स्कूलों में इस गीत का गाना अनिवार्य बनाने पर अनावश्यक जोर देते हैं और तनाव को और बढ़ाते हैं. वंदे का अर्थ सम्मान प्रकट करना, नमन करना और सलाम करते समय झुकना है. करोड़ों मुसलमान सूफी संतों की दरगाहों पर जाकर सिर झुकाते हैं. मध्यकाल में मुस्लिम शासकों के दरबारों में कोर्निश की जाती थी. मौलाना अबुल कलाम आजाद जैसे इस्लाम के जाने माने विद्वान वंदे मातरम के पहले दो छंदों को गाए जाने में किसी प्रकार का इस्लाम विरोध नहीं देखते थे. अखिल भारतीय मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के महासचिव मौलाना सैयद निजामुद्दीन ने 2006 में वंदे मातरम के गाए जाने के खिलाफ फतवा जारी करने से इनकार कर दिया था.

इस्लाम के गौरवशाली दिनों में इज्तिहाद यानी बदले हुए समय की आवश्यकताओं के अनुरूप धार्मिक नियमों की पुनर्व्याख्या का चलन था. दिल्ली के सुल्तान मुहम्मद बिन तुगलक के सलाहकार और मध्यकाल के प्रसिद्ध इतिहासकार जियाउद्दीन बर्नी ने सुल्तान को मशविरा दिया कि वह राज्य के संचालन के लिए कानून बनाते समय आवश्यकता के अनुसार शरीयत के बाहर भी जा सकते हैं.

लेकिन जहां तक वंदे मातरम का सवाल है, इसके पहले दो छंदों के गाने या गीत की धुन बजाने और इस्लाम की बुनियादी मान्यताओं के बीच किसी भी प्रकार का विरोध नहीं है. लेकिन बार बार इस राष्ट्रगीत पर विवाद राजनीतिक रोटियां सेंकने के लिए उठाया जाता है और संभव है कि भविष्य में भी उठाया जाता रहेगा. इसे उठाने वाले लोग व्यापक मुस्लिम समुदाय तक यह संदेश पहुंचाना चाहते हैं कि उसके धार्मिक हितों के वे ही सच्चे संरक्षक हैं. इस विवाद का संबंध शुद्ध रूप से चुनावी राजनीति से है, वास्तविक इस्लाम या शरीयत से नहीं.

ब्लॉगः कुलदीप कुमार

संपादनः अनवर जे अशरफ

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